1-बौछार
“मम्मा, एक भी टॉय पसंद नहीं आ रहा है, दूसरी दुकान में चलिए।” नन्हें विभु को दुकान मे रखे अनेक खिलौनों में से कोई खिलौना पसंद नहीं आ रहा था।
“ये देखो मेरे बच्चा! ये डायनासोर, ये रिमोटकार” माँ ने बेटे को पुचकारते हुए कहा।
“नहीं, उधर चलिए, सामने वाली दुकान पर” सामने की ओर इशारा कर पैर पटकते हुए विभु दुकान से बाहर निकल आया। सड़क पर बूँदाबाँदी शुरू हो गई थी। माँ, बेटा सड़क पार करने ही वाले थे कि ‘होsss, हो sssचल गया,चल गया’ की आवाज़ों के साथ तालियाँ बजाते कुछ बच्चे बाजू की सँकरी गली से निकलकर सड़क पर आ गए।
एक छोटा बच्चा गाड़ी के पुराने फटे- घिसे टायर में अपने छोटे- से शरीर को घुसाकर सड़क पर गोल-गोल घूमता जा रहा था। उसके साथी उसे देखकर उछलते-कूदते, उसके साथ- साथ चलते खुश हो रहे थे। अचानक बच्चे ने टायर घुमाया और पलट गया। अब वह अपने पैरों से सड़क पर ज़ोर देकर टायर को तेज़ी से घुमाने लगा। साथी बच्चे और ज़ोर से तालियाँ बजाने लगे।
“वॉव, मम्मा, ये चाहिए… मुझे भी ये चाहिए।” बच्चे ने ज़िद पकड़ ली।
“ओ नो… वेरी चीप एन्ड डर्टी! इस गंदी सड़क पर गंदे पानी में घिसा- फटा टायर चलाओगे! छि, छि!” विभु की माँ ने घिन से नाक – भौं सिकोड़ी। माँ का हाथ छोड़ पल भर में विभु उस टायर वाले लड़के के पास जा पहुँचा, लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला
“मैं भी चलाऊँ?”
“हाँ, लो” कहते हुए उसने टायर विभु के हाथ में थमा दिया। टायर पकड़ते ही विभु के चेहरे पर खुशियों की बौछार होने लगी। वह टायर पकड़कर सड़क के पानी में छपाके लगाने लगा।
विभु की माँ उसे गुस्से से देखा। विभु टायर हाथ में पकड़कर मारे खुशी के उछलने लगा। यह दृश्य देखकर विभु की माँ का गुस्सा काफूर हो गया।
2-दृढ़ निश्चय –
वह लगातार सिगरेट के कश खींच रहा था। एक सिगरेट खत्म होते ही दूसरी जलाता, होठों में दबाता, धुएँ के छल्लों में गुम हो रहा था। नौकरी में बढ़ रहे काम के बोझ, दबाव से अवसाद में घिरता जा रहा था। सोफे पर निढाल, अधलेटा बैठा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का विज्ञापन पढ़ रहा था। विज्ञापन उसकी शैक्षिक योग्यता के अनुकूल था। पढ़ते- पढ़ते वह अंतिम पंक्ति तक जा पहुँचा।
अंतिम पंक्ति में लिखा था- ‘स्मोकर्स नीड नॉट टू अप्लाईl’
पंक्ति पढ़ते ही उसने सिगरेट को ऐश ट्रे में दबाकर बुझा दी। सिगरेट के धुएँ के छल्ले धीरे-धीरे हवा में विलीन हो रहे थे, लैपटॉप पर उसकी उँगलियों ने गति पकड़ ली थी।
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3-मृगतृष्णा
“मेरी जिद, आदतें, हरकतें, उफ्फ! मम्मी, तुमने मुझे उस वक्त क्यों नहीं डाँटा! पापा, आपने मुझे दो-चार थप्पड़ क्यों नहीं जड़े!” बुदबुदाता, नम होती आँखों को पोंछता,अवि अतीत में खो गया।
“पापा, मुझे यू. एस. जाना है, वहाँ एम. एस. करने के बाद मैं वहीं नौकरी करूँगा। खूब पैसा कमाऊंगा और वहीं सैटल हो जाऊँगा।”
“अवि, मेरी इतनी कमाई नहीं है बेटा, तू कुछ साल यहाँ नौकरी करके पैसा जोड़ ले,थोड़ा मेरा,थोड़ा तेरा मिलकर पैसा जुड़ जायेगा।”
“नहीं, मैं जी. आर. ई. देना चाहता हूँ, मुझे इस बैकवर्ड कंट्री में नहीं रहना है। आप बैंक से लोन लेकर मेरी फीस जमा कर दीजिए।”
पिताजी ने उसे समझाने का प्रयास किया लेकिन अंततः उसकी ज़िद के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े। सारी जमा पूँजी, घर बेचकर उसे यू. एस. भेजा।
औसत दिमाग वाला अवि वहाँ की पढ़ाई का बोझ ढो नहीं पाया। परिणामस्वरूप उसे अपने देश वापस आना पड़ा।
विमानतल पर पिताजी को देखते ही वह रो पड़ा-“पापा …मुझे..”
“दूसरे देश जाना, पढ़ना, धन-वैभव की तृष्णा! जोश और मस्ती में लिये गये भ्रम भरे निर्णय होते हैं बेटा! ये केवल मृगतृष्णा है!जहाँ बूँद भर पानी के लिए भी ज़िंदगी भर की तृष्णा ही रहेगी। केवल तृष्णा!”
पिता के साथ टैक्सी में बैठा अवि घर की ओर लौट रहा था। भीषण गर्मी में दूर सड़क पर पिघलती पानी की लकीर दिख रही थी। वह अपने किए पर पछता रहा था!
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4-गहरे स्वर
“तुम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हो?”लड़के की माँ ने उन दोनों से पूछा।
“हाँ”
“फिर शादी कर लो।”
“नहीं…माँ, अभी शादी नहीं करनी है।”बेटे ने माँ से झुंझलाकर कहा।
“आखिर क्यों नहीं करनी?” माँ को भी गुस्सा आ गया।
“हम दोनों किसी बंधन में बंधना नहीं चाहते। लिव इन में रहना चाहते हैं, इसमें बुराई क्या है!” बेटा बिना संकोच के बोल गया।
“क्या sss!” बेटे के आधुनिक विचार सुन माँ को काठ मार गया था। अपने आप को सम्हालकर लड़की से बोली-
“सुनो बेटी, इन अनैतिक विचारों को तुम लोग मत अपनाओ। पाश्चात्य देशों में मैंने देखा है, ये उन देशों की, उनकी संस्कृति है जो हमारे देश के युवाओं को गुमराह कर रही है। उनकी और हमारी संस्कृति में ज़मीन आसमान का अंतर है। हमारे सामाजिक नियम, व्यवहार के विरुद्ध ऐसे कदम उठाना भारी पड़ेगा! तुम इसे समझाओ। यदि कल को कुछ हो गया तो समाज तुम पर ऊंगली उठाएगा!”
“ऐसे कैसे उँगली उठायेगा! हम दोनों की रज़ामंदी है इसलिये… और फिर हम साथ – साथ रह रहे हैं! नाउ अ डेज इट इज वेरी कॉमन आंटी। अपनी ज़िंदगी के डिसीज़न हम लेंगे।” लड़की ढ़िटाई से बोली।
“ना बेटी ना, जब कुछ ऊँच- नीच होगी तब यह समाज न तुम्हारी रज़ामंदी समझेगा न ये मर्दज़ात! तुम्हारे सारे डिसीजंस धरे के धरे रह जाएँगे!” वह लड़की के काँधे पर हाथ रखकर, बेटे को घूरते हुए बोली।
“इस रिश्ते को कुछ नाम दो बेटी, बात को समझो!”
लड़की चौंकी, ठिठकी! विस्फारित नेत्रों से लड़के की माँ को देखने लगी। कुछ सोचकर उसने लड़के की ओर देखते हुए कहा-“माँ, हम दोनों जल्दी ही कोर्ट मैरेज करेंगे। आपकी मौज़ूदगी में!”
लड़के की माँ की आवाज़ में आ रहे ‘औरत’ के गहरे स्वर को लड़की भली-भांति समझ गई थी!
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5-रेत के दाने
“बेटा, इस बार जन्मदिन पर तुम्हें क्या चाहिए?” पिता ने अपने लाड़ले से प्यार से पूछा।
“कुछ नहीं…”
“यह कैसे हो सकता है? कुछ तो चाहिए जो तुम मुझसे छुपा रहे हो। बोलो। शानदार तोहफा दूँगा।”
“रहने दीजिए पिताजी, आप नहीं दे पाएँगे।”
“क्या! मैं नहीं दे पाऊँगा?”
अपने बंगले की ओर देखते हुए बोले-“यह सब तुम्हारा है। जो माँगोगे दे सकता हूँ…ये पैसा, इज्जत…सब कुछ तुम लोगों के लिए है। बताओ, क्या खरीदना है?”
बेटे ने कहा-“खरीदना नहीं है, जन्मदिन आपके साथ मनाना चाहता हूँ पिताजी, क्या आप मुझे अपना वक़्त दे पाएँगे?”
पिता की मुट्ठी से रेत के दानों के मानिंद दौलत, शोहरत पल भर में फिसलकर ज़मीन पर बिखर गई थी। वे खुली हथेलियों को ताक रहे थे।
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