जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: January 1, 2026

1-विरासत

एक महीना हो गया उसे गुजरे हुए !

सुबह से शाम तक सम्वेदनाएँ  प्रकट करनेवालों का तांता लगा रहता है, अभी भी।

“कोई मशहूर आदमी रहा होगा ?”

“सच बताऊँ। ऐसा नहीं हैं। भाई, उसे तो मोहल्ले वाले भी ठीक से नहीं जानते थे। फिर आने वालों में से तीन-चौथाई ने तो उसकी शक्ल भी नहीं देखी होगी कभी। उसका अस्तित्व तो मृत्यु के उपरान्त ही अपनी उपादेयता सिद्ध कर पाया कि वह एक अच्छा समाज सेवक भी था। जानते हो अपने पीछे समाज के लिए क्या कुछ छोड़ गया है।”

‘‘नहीं जानते हो न!’’

‘‘सुनो। एक अदद अधेड़ अन्धी बीबी और दो जवान बेसहारा बेटियाँ।’’

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2-स्व विवेक

मेहता दम्पती के विवाह की वर्षगाँठ थी। निमंत्रण पत्र पर स्पष्टतः मुद्रित था ‘कृपया उपहार न लाएँ।’ पर सुदीप का कहना था कि यूँ एकदम खाली हाथ भी किसी के यहाँ जाना ठीक नहीं लगता, इसलिए उसने फूलों का एक ‘बुके’ ला ही दिया था।

वह सोच रही थी जब इतनी ‘साफगोई ‘से मना किया गया है तो फिर ख़्वामखाँ फूलों के इस गुच्छे जैसी चीज पर सौ-डेढ सौ रुपये खर्च करने से क्या फायदा। बहरहाल जब सुदीप ले ही आया तो अब इस उपहार को अपने साथ ले जाना भी लाजिमी था।

मिसेज मेहता कई बार देख चुकने के बावजूद  उसे अनदेखा कर गई  तो वह खिन्न हो उठी – आखिर बुलाकर इस तरह ‘अवॉइड’ क्यों किया जा रहा है। वह सोच ही रही थी कि अनायास ही दोनों की निगाहें टकरा गई>न। इस बार वे कन्नी नहीं काट सकीं “ओह ! यू! मालिनी !.. टू लेट।” -घड़ी पर निगाहें मारते हुए मिसेज मेहता ने हल्की सी गर्मजोशी दिखलायी। होंठों पर एक अदद नकली- सी दिखायी देने वाली मुस्कराहट की चिप्पी चिपकाए उन्होंने बुके थाम लिया और उपेक्षापूर्ण ढंग से सेन्टर टेबिल के एक ओर उछाल दिया।

फूलों के बुके से बँधी उसकी दृष्टि सहसा उधर चली गई। उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गई हो जैसे। एकाएक वह खुद को हंसों के बीच फँसे कौए- सा महसूसने लगी थी।

लिखना-छपाना तो सब दिखावा है। उसे भी अपने ‘कॉमनसेंस’ से काम लेना चाहिए  न। वह पछता रही थी सचमुच ।

बाईं ओर कोने में उपहारों का भारी भरकम ढेर लगा था।

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3-दिल

बूढ़ा बरगद कब से यूँ ही खड़ा था। उसकी उम्र बताने वाला गाँव भर में कोई नहीं बचा था। अनगिनत बसन्तों और पतझड़ों को भोगकर वह विरक्त-सा संन्यासी की भाँति केवल खड़ा था। उसकी छाया में न जाने कितने भले-बुरे काम हो गए , उसके देखते-देखते। उसके छिदे हुए वक्ष पर वे कहानियाँ मानो उत्कीर्ण हों पर वह उनसे भी विरक्त था। तना फट चला था और उसके मध्य एक खोह सी… उसका दिल किसी ने निकाल लिया था !

वह यूँ ही खड़ा था पर उसकी सुप्त भावनाएँ, अर्द्धसुप्त सी केन्द्रित हो गई , अपनी छाँह में बैठे एक नवदम्पती पर। उस उन्मत्त युवक की अपनी सद्य परिणीता ग्राम्य बाला के साथ उन्मुक्त अठखेलियाँ उसे नहीं सुहा रही थी। तिस पर शाखा पर बैठा कबूतर युगल भी उन्हें हवा दे रहा था।

बूढे बरगद का दिल नहीं था, पर दिमाग था। और दिमाग में उठने वाली प्रतिक्रियाएँ  उसे —-

आक्रोशित हो उसने कई दफा अपनी जटाएँ  झकझोर कर कबूतरों को उड़ाने की चेष्टा भी की पर वे मत्त प्रेमी भी उसकी चेष्टाओं के प्रति उदासीन प्रायः थे। कबूतरी कुदक-कुदक कर डाल बदल लेती…

और उनकी अठखेलियाँ उसे चिढ़ाती रहीं। वह चाहने लगा था कि उसके सारे पत्ते गिर जायें और नीचे बैठे नव-विवाहितों सहित उन्मुक्त कबूतर युगल भी उससे दूर चला जाये।… वह विरक्त था क्यूँ कि उसके पास दिल नहीं था।

तभी अकस्मात ही छबीली कबूतरी ने डैने फड़फड़ाए और फुदक कर उसकी खोह में जा छिपी। और उसके साथ ही…

क्या हुआ कि बूढा बरगद भी चाहने लगा कि उसकी छाया घनी हो जाये और दुनिया भर के सारे जोड़े उसकी छाँह तले आ जमे, कबूतर युगल भी यूँ ही गुटर गूँ करता रहे।

अब बूढ़े बरगद का दिल धड़कने लगा था।

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4-प्रतिचोट

स्वेटर उतारते-उतारते उसकी निगाहें सेन्टर टेबिल पर पडे. टी-सेट पर अटक गई । “तुम्हारी सहेलियाँ आयी थीं ?” – स्वेटर को सोफे की ओर उछालते हुए उसने यूँ ही पूछ लिया था।

“नहीं तो। आपके ही ऑफिस के कुछ दोस्त थे। बहुत इन्तजार किया बेचारों ने। पूछ रहे थे आप दिल्ली चलेंगे कि…” पत्नी ने बताया।

“ऑफिस के !” – वह चौंक उठा, “कौन- कौन थे?”

“एक रूंगटा जी को तो मैं जानती हूँ।” पत्नी ने बताया — “उनके साथ दो और लोग थे। नाम तो मैंने पूछा नहीं, एक तो हरी जर्सी पहने थे। दूसरे के चौकड़ी वाला कोट था।”

“शर्मा और पाराशर…” — वह बुदबुदाया- “स्साले रूंगटा की साजिश है यह सब। इसीलिए तो मलहोत्रा के घर जाते वक्त ये तीनों जरूरी काम बताकर खिसक लिये थे। — एक अज्ञात आशंका उसके मन में उभरी।

“तुम्हें किसी ने कुछ कहा तो नहीं। मेरा मतलब कोई ऐसी बात… मजाक…!” — वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या और कैसे पूछे।

“गोरे-गोरे हाथों से चाय तो पीने को मिलेगी ही…” मलहोत्रा के यहाँ जाते वक्त कहा उसका अपना ही वाक्य हलक में कहीं गड़ रहा था।

वह विस्मित-सी उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव पढ़े जा रही थी।

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5-पति

‘एलिजा, उठो, उधर केबिन में जाओ।’ शैलमाँ ने चार नम्बर केबिन की ओर संकेत करते हुए कहा।

चुपचाप बैठी रही एलिजा ।

शैलमां का कहा कुछ सुना ही ना जैसे। शैलमां न दो-एक क्षण उसका चेहरा ध्यान से देखा। फिर अपनी मुट्ठी में भींचे नोटों को एकबारगी फिर से गिनते हुए किंचित मीठे, हौले स्वर में बोली, “एलिजा ! जा बेटी जा, ग्राहक बैठा है उधर तेरा। उठ जल्दी कर।”

कुछ देर उसी तरह सिर झुकाए बैठी रही एलिजा। फिर अपनी पीठ पर शैलमां के हल्के- हल्के हाथ के स्पर्शों को महसूस कर पलकों की कोरों से छलछला आए पानी को पोंछती सी उठी। वॉश बेसिन से अँजुरी भर पानी लेकर मुँह धोया, टॉवल से पोंछने के साथ ही चेहरे पर पाउडर का हल्का सा पफ देकर, ब्रश से बालों को सँवार लिया। कपड़ों की सिलवटें सोखती वह यंत्रवत् केबिन में प्रविष्ट हो गई ।

शैलमां कुछ देर तक एकाग्र सी उसे जाते देखती रही फिर सोफे पर अधलेटी सी एक दूसरी लडकी की ओर मुखातिब होते हुए बोली, “पम्मी क्या हो गया है आजकल एलिजा को, बहुत जल्दी थक जाती है, अभी तो यह तीसरा… इधर इसकी डिमाण्ड बढ़ रही है और… अभी से यह हाल !” – शैलमां के माथे की रेखाएँ  कुछ गहरी हो गई ।

“बात यह नहीं है शैलमां, एलिजा थकी नहीं, टूटती जा रही है। अभी-अभी जो ग्राहक गया था न इससे पहले, जानती हो वह कौन था?”

इधर-उधर देखते हुए पम्मी ने फुसफुसाकर राज की बात कही–. “एलिजा का पति ! जब ये उसके साथ थी तब तो इधर-उधर की छोकरियों के चक्कर में इसे मारपीट कर घर से निकाल दिया। अब चार-पाँच सौ का जुगाड़ बैठाकर हर दूसरे-तीसरे दिन यहाँ आ जाता है। कुत्ता !” – पम्मी ने घृणा से वहीं फर्श पर थूक दिया।

शैलमां कुछ देर तक अवाक् सी पम्मी को देखती रही, फिर केबिन के बन्द दरवाजे को… “अब उस हरामी को यहाँ पैर भी नहीं रखने दूंगी।” उसने मन ही मन तय कर लिया था।

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6-एण्टी करप्शन

होटल के सभी कोनों पर रात गदरा गई  थी। देशी-विदेशी भी ‘सर्व’ की जा रही थी। एक कोने में जरा-सी फुसफुसाहट हुई।

वह आबकारी इन्सपेक्टर था। कह रहा था- “यार कोई माल-वाल हो तो…।”

मैनेजर कनखियों से इधर-उधर देखते हुए कुनकुनाया, “सर मिल तो सकता था; पर आजकल एण्टीकरप्शन में नए आफिसर आए हैं। थोड़े दिन देखना पड़ेगा…”

दोनों का मुँह एक बारगी उतर-सा गया। थोडी ही दूर दूसरी सीट पर बैठा बुलडॉग दूसरा पैग खाली करते हुए गुर्राया, “देखना क्या है। एरेंज करो न। एन्टीकरप्शन तो यहाँ बैठा है।”

इन्सपेक्टर और मैनेजर के चेहरे खिल गए -वे ही नए ऑफिसर थे।

…कुछ देर बाद ही वहाँ गंगा बही और बहती गंगा में बहुतों ने हाथ धो लिए।

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7-तिनके की ओट

बरसों से बाथरूम का दरवाजा नहीं था, लेकिन सभी की आँखों पर लाज का एक पर्दा जरूर रहा करता था। उधर से गुजरने से पहले बिल्डिंग का हर कोई आदमी यह तय कर लिया करता था कि बॉथरूम से पानी की आवाज तो नहीं आ रही है, कोई नहा तो नहीं रहा है।

सभी महिलाएँ अपनी धोती-साड़ी के पर्दे टाँग कर नहा लिया करती थी; पर नई बहू के लिए यह मुमकिन नहीं था। कह-सुनकर उसने दरवाजा लगवा ही लिया।

उस दिन वह निश्चिन्त हो नहा रही थी कि दरवाजे की झिर्रियों से झाँकती दो आँखें उसे अपना जिस्म टटोलती-सी महसूस होने लगी। मुश्किल यह थी कि वह नहीं जान सकती थी कि यह ताका-झाँकी कौन बेशर्म कर रहा है।

उसने अपने पति से शिकायत की तो उसने हँसकर टाल दिया, “तुम्हें वहम रहा होगा। यहाँ कोई ऐसा नहीं है। और हो भी तो अब कोई दरवाजा हटाया तो जा नहीं सकता। अजीब सनक है। कभी लगाओ, कभी हटाओ।”

वह चुप हो नहीं बैठी। उसने तय कर लिया कि इस ताकाझाँकी करने वाले का पता लगा कर ही रहेगी। और एक दिन ऐन सुबह वह छत पर जा चढ़ी, बॉथरूम पर निगाहें रखने। वह देखती रही एक-एक करके बिल्डिंग की औरते बॉथरूम में जा रही थी और कुछ अन्तराल से किसी न किसी बहाने उधर से गुजरता हर कोई मर्द दरवाजे की झिर्रियों में निगाहें मार जाता था।

वह किसी को कैसे बताती कि उसका पति भी उन्हीं लोगों में से एक था। लकड़ी के इस पर्दे ने सबको बेपर्दा कर दिया था।

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