राजेन्द्र पुरोहित
1-आईना
वर्ष 2064
विश्व के सभी बड़े राजनेता बैठक में उपस्थित हैं और वैज्ञानिक भी।
“हाँ तो, क्या नाम बताया आपने? गौरैया मतलब इंडियन स्पैरो न? उसकी स्पीशीज़ ही समाप्त हो गई, तो क्या करें भाई? एक चिड़िया के लिए मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट बंद तो नहीं कर सकते न?”
“सर, हमारे देश में लोग बहुत माँग करते हैं! कहते हैं- शांति और समृद्धि की प्रतीक है।”
“ओह! आपका देश बहुत बैकवर्ड है। ऐसा कीजिए न- कृत्रिम बुद्धिमत्ता से एक चिड़िया बनवा दीजिए थ्री-डी में। बच्चे देख लेंगें।”
इतने में एक उद्योगपति खड़े हो गए, “सर, हम एक चिड़िया बना देंगे डीएनए गुणसूत्र से। लेकिन शर्त यह है कि मैं उसे अपनी कंपनी के म्यूजियम में रखूँगा। देखने का टिकट सौ डॉलर लगेगा – और पूरा पैसा मेरी कंपनी में जाएगा।”
एक साम्यवादी देश का डिक्टेटर खड़ा हुआ, “यह क्या देश है आपका? सख्ती बरतिए! मना कीजिए सबको कि कोई चिड़िया नहीं मिलेगी। न माने तो गोली चलवा दीजिए। ऐसे धाँय!”
गोली के धमाके से हॉल गूंज उठा।
विनोद घबराकर उठ बैठा।
उफ्फ, कितना खतरनाक सपना था!
“क्या हुआ?” पत्नी सामने खड़ी थी।
“कुछ नहीं, बस एक सपना..”
“अच्छा छोड़ो, यह सामान लो और दुकान वाले को मोबाइल पर नोट करवा दो।”
“नहीं सुनीता, नहीं। मोबाइल विकिरण इन पक्षियों के लिए बहुत घातक होता है। ऐसा कर, थैला दे दे। मैं लेकर ही आ जाता हूँ।”
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2-भात-भराई
“आप साइबर एक्सपर्ट हैं ना?”
“जी कहिए, कोई काम है आपको?”
“हाँ, एक रॉन्ग नंबर फोन आया था, जिसका नाम-पता न तो टू- कॉलर से पता लग रहा है और न ही व्हाट्सएप पर….”
“ओह! अच्छा हुआ आप मेरे पास आ गए। आजकल इसकी आड़ में अपराध बढ़ता जा रहा है। हाँ तो बताइए, क्या कहा गया आपसे?”
“जी, आवाज़ किसी ग्रामीण लड़की की थी। उसने मुझे अपना बीकानेर वाला मामा समझ लिया। उसकी शादी है अगले महीने। उसे एक साड़ी और कुछ रुपयों की ज़रूरत है। ऐसा लगता है कि उसके वास्तविक मामा उसका फ़ोन नहीं उठा रहे हैं। उसने ग़लती से मेरा नंबर लगा दिया और बिना रुके रोते-रोते अपनी कहानी कह गई।”
“ओह ऐसा? तो मुझसे क्या चाहते हैं? फ़ोन नंबर के आधार पर मैं उसका नाम-पता निकालने की पूरी कोशिश कर सकता हूँ। आप क्या क़ानूनी कार्यवाही करना चाहते हैं?”
“नहीं, कुछ पैसे भेजना चाहता हूँ!”
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3-जीवनोदक
“लेकिन मैं बूढ़ा हो चला हूँ बेटा, अब तुमको कितना पढ़ा सकूँगा? मेरे तो जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं। छह साल हो गये बिस्तर पकड़े।””
“लेकिन सर, मुझे तो आपसे ही सीखना है गणित। आपकी पुस्तक हमारे पाठ्यक्रम में चलती है। मुझे मालूम हुआ कि आप इसी शहर में रहते हैं तो अपने आपको रोक नहीं सका।”
“वह भी दीवाली की रात में?”
“जी सर, आज शुभ दिन है ना? मैं हठी हूँ सर। पढ़ूँगा आप ही से। और फिर कैलकुलस तो मेरा पसंदीदा विषय है गणित का। आपसे ज्ञान प्राप्त करके कुछ बन पाया, तो इस विषय को अनेक लोगों तक पहुँचाऊँगा।”
“ओह! ऐसी बात है, तो कल से ही आ जाओ। और हाँ, जाते-जाते मेरा एक काम कर देना- वह जो कोने वाला दीपक है न, उसका तेल समाप्त होने वाला लगता है। वह बुझे, इससे पहले उससे जितने भी दीपक जला सको, जला देना।”
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4-चश्मा
“कुल मिलाकर सात अनियमितताएँ लगीं मुझे सविता जी। मैंने इस काग़ज़ में लिख दीं हैं। रिपोर्ट में भी लिखूँगा; लेकिन जो बात मुझे सबसे अधिक कचोटती है, वह यह कि आपके दिव्यांग-आश्रम में बड़ी मायूसी है। सदस्य बुझे-बुझे क्यों रहते हैं?”
“आप बिल्कुल सही फ़रमा रहे हैं सर। यहाँ के माहौल में ही मुर्दनी है। मैंने तो सरकार को कई बार अर्जी दी है कि मुझे किसी बढ़िया छात्रावास में लगा दे; लेकिन पटक दिया इन लूले-लँगड़ों के बीच। आप जैसे युवा और चुस्त अधिकारी को यहाँ नकारात्मक होना ही था। आपको तो दूर से देखकर ही मैं समझ गई थी कि नए साहब यहाँ बोर हो जाएँगे। सर, ये चश्मा रेबॉन का है क्या? तभी आप दिन में भी लगाए रहते हैं?” सविता जी एक ही साँस में बोल गई।
“ओह, समझा। अच्छा सविता जी, आपके आश्रम में एक स्थान ख़ाली है क्या?”
“है न सर। न भी होगा, तो हटा दूँगी किसी को। कोई आपके सम्बन्धी हैं क्या।”
“नहीं सविता जी, वह स्थान आपके लिए है। विशेष योग्यता वाले लोगों को लूला-लँगड़ा कहने वाली आप इस आश्रम की सबसे बड़ी विकलांग हैं, मानसिक विकलांग।” कहते हुए निरीक्षक महोदय ने अपना चश्मा उतारकर मेज पर रख दिया। सविता जी और उनका समस्त स्टाफ चौंक उठे। साहब के चेहरे पर बाईं आँख कृत्रिम थी।
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5-प्रतिरोध
अचानक उसकी चेतना लौटी।
उसे लगा कि उसे धीरे-धीरे एम्बुलेंस से उतारा जा रहा है। तीव्र पीड़ा के कारण वह पुनः बेहोश हो गई।
“मैं आपकी तीसरी बेटी हूँ, तो क्या हुआ पापा? मैं हमेशा कक्षा में प्रथम आऊँगी।” चहचहाकर उसने पापा से कहा।
पिता ने मुस्कुराकर उसे गले से लगा लिया था।
उसे स्ट्रेचर पर लिटाया जा रहा है। उसकी चेतना फिर लौटी। नर्स और डॉक्टर दौडभाग कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि शायद वह नहीं बचेगी। नहीं बचेगी, तो पापियों को सज़ा कैसे दिला सकेगी? उसकी आँखें फिर से मुँदने लगीं।
“अरे बिटिया, क्यों ज़िद कर रही है। मैं जो कह रहा हूँ कि रिश्ता बहुत अच्छा है। लड़का बहुत सीधा है। तुझे आगे पढ़ने भी देंगे और नौकरी भी करने देंगे।” पापा एक ही झोंक में बोल गए; परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि दहेज में उन्होंने दो लाख रुपये, दस तोला सोना तथा स्कूटर भी दिया है। विवाह के कुछ दिनों बाद ही सास व पति ने कड़वे शब्दों में बताया कि उनकी माँग तो पाँच लाख नकद, बीस तोला सोना और कार की थी, लेकिन उसके ‘भिखारी’ बाप ने कुछ नहीं दिया। उसके बाद प्रताड़ना व यातनाओं का लंबा दौर।
ऑपेरशन थिएटर की ठण्डी मेज पर सुलाया गया, तो तड़पकर वह फिर होश में आई। उसके नाक पर ऑक्सीजन केप लगाई गई है। डॉक्टर का तीव्र स्वर सुनाई दिया, “अरे इन्स्पेक्टर साहब, इसके पति ने लिखकर दे तो दिया कि सीढ़ियों से गिर गई है। अब इसका बयान तो आपको अभी मिलने से रहा। लड़की होश में नहीं है।” नर्स उसका रक्तचाप व ईसीजी आदि मापने लगी। बेहोशी ने फिर से उसे अपनी आगोश में भर लिया।
“नखरे मत कर नवाबजादी। चुपचाप इन सभी को खुश कर दे। दौलत मिलेगी दौलत। तेरे बकाया दहेज की किश्त… हा… हा…हा।” पति मानो राक्षस ही बन गया था। सास मुस्कुराती हुई घर के बाक़ी सदस्यों को लेकर घर से बाहर निकल गई। उसके सामने पूरे छह मर्द बैठे थे। सहसा न जाने कहाँ से उसमें विद्रोह जागा, “कमीनों, गरीब बाप की बेटी हूँ, वेश्या नहीं। कोई पास आया तो उसकी खैर नहीं।” कमरे में जंग-सी छिड़ गई। सात-सात मर्दों से अकेली भिड़ गई वह। किसी को काटती, किसी को लात-घूँसे मारती। अचानक उसे कमरे की खिड़की नज़र आई। पहली मंजिल से कूदने के विचार से ही वह एकबारगी काँप उठी; परन्तु सामने सात विक्षिप्त सांड जो खड़े थे। उसने खिड़की से बाहर छलांग लगा दी।
“नर्स इसको एनेस्थीसिया लगाओ।” डॉक्टर का स्वर सुनकर उसे आभास हुआ कि उसकी चेतना लौट आई है। उसने कसकर नर्स का हाथ पकड़ लिया। नर्स ने चौंककर उसे देखा। उसके मुँह से निकला, “बयान….. सिस्टर बयान।”
अगले ही क्षण अस्पताल में नर्स का स्वर गूँजा, “इन्स्पेक्टर साहब, जल्दी अंदर आइए, यह बयान देना चाहती है।”
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