जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: July 1, 2025

1-नन्ही जिज्ञासा/ सेवा सदन प्रसाद

‘‘मम्मी, सन्नी अंकल के आने से डैडी खामोश क्यों हो जाते हैं? तुम तो बहुत खुश हो जाती हो’’ माँ के साथ सोई विकी ने एक अजीब सी जिज्ञासा प्रकट की।

‘‘आई डोण्ट नो’’ प्रश्नों से छुटकारा पाने का एक नपा तुला वाक्य।

‘‘सन्नी अंकल आपके लिए कितने ‘प्रजेन्ट्स’ लाते है, . डैडी के लिए कुछ भी नहीं … क्या डैडी उन्हें अच्छे नहीं लगते?’’ विकी ने पुनः कुरेदा।

‘‘तुम सन्नी अंकल से क्यों नहीं पूछतीं?’’ एक खीझ भरा स्वर।

‘‘सोचती हूँ, तुम गुस्सा कंरोगी’ विकी सहमति-सी बोली।

सन्नी की ही यादों में डूबी लूसी ने गौर से विकी को निहारा। उसकी नन्ही जिज्ञासा से परेशान हो गई। उसकी मौजूदगी में सन्नी के द्वारा की गई हरकतों को याद कर सिहर उठी। दिल का भेद लेने के लिए उसे सीने से चिपकाकर पूछा- ‘‘विकी, तुम्हें सन्नी अंकल चाहते हैं या नहीं?’

‘‘ओ यस… इतने सारे खिलौने, टाफियाँ … ड्रेस … सब अंकल ने ही तो दिया है’’ विकी थोड़ी प्रसन्नता प्रदर्शित करती हुई बोली।

‘‘तुम चाहती हो न अंकल को’’- लूसी सही प्वांयट पर आई।

‘‘क्या सोचने लगी विकी… सन्नी अंकल अच्छे नहीं लगते?’’

‘‘नो’’ विकी बहुत साहस बटोरकर बोली।

‘‘व्हाई?’’लूसी आश्चर्य के कुहासों से घिर गई।

‘‘सन्नी अंकल तो ‘ओनली’ अंकल हैं … वे डैडी क्यों बनना चाहते … अपने डैडी तो कितने अच्छे हैं … तुम तो डैडी की हो न मम्मी।’

‘‘शट् अप … इडियट’’लूसी ने डपटकर उसे परे कर दिया और विकी सुबकने लगी।

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2-भीख

चर्चगेट स्टेशन पर लंबी ‘क्यू’ थी। लोग बस का इंतजार कर रहे थे। क्यू का मैं आखिरी व्यक्ति था। वैसे मुंबई मे ‘क्यू’ का जल्द अंत नहीं होता है। अपनी व्यवस्तता की वजह से ही लोग ‘क्यू’ में खडे़ – खड़े ही पेपर, मैगजीन या नॉवल पढ़ने में मशगूल थे।

तभी एक भिखारी आया। हाथ में एक पीतल की छोटी- सी थाली थी और उसमें भगवान की मूर्ति। थोड़ा- सा सिन्दूर और चावल भी था। अगरबत्ती जला रखी थी। वह लोगो से याचना करने लगा और लोग बड़ी ही श्रद्धा से रुपये – दो रुपये देने लगे। अंत में वह मेरे पास भी आया। मैने गौर से उसे देखा और थाली में रखी भगवान की मूर्ति को निहारा। इंसान की इस चतुराई पर भगवान भी हैरान दिखा। भिखारी मेरे समक्ष ढीठ की तरह खड़ा रहा। वह इस इंतजार में था कि कब मैं पर्स से पैसे निकालूँ।

मैं भी अपनी जिद पर कायम रहा। थोड़ी देर के बाद उस भिखारी से पूछा – ‘‘तुम विकलांग तो नहीं हो; फिर भी भीख क्यों माँगते हो ? वो भी भगवान की मूर्ति लेकर।’

भिखारी ने तब बेधड़क जवाब दिया – ‘‘साहब, बिना सिफारिश के कहीं भी नौकरी नहीं मिलती ….. मजदूरी के लिए भी पहचान एवं जमानत की जरूरत है। भीख भी यूँ ही नहीं मिलती। अगर भगवान की तस्वीर न हो, तो मुझ असहाय पर कौन तरस खाएगा?’

तब मैं सोचने लगा कि लोग भीख किसे दे रहे हैं – भिखारी को या भगवान को।

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3-अशुभ बहू

पूनम जब से विधवा हुई, तब से ही पूरे परिवार की उपेक्षाओं का शिकार होने लगी थी। सास उसे अशुभ समझती थी, जेठ एक बोझ एवं ननद एक अभागिन। पति की मौत का सबसे ज्यादा दुःख तो पूनम को ही था; पर वास्तविकता पर सब पर्दा डाल रहे थे। सतीश को शराब पीकर मोटर सायकिल चलाने से कितनी बार रोका था उसने। जिस बात से सदा रोका, उस पर कभी ध्यान नहीं दिया सतीश ने। शराब पीकर तेज गति से मोटर साइकिल चलाने से ही हुआ एक्सीडेंट। अपनी मौत का जिम्मेदार तो वह खुद ही था। पर परिवार वाले तो पूनम को ही जिम्मेदार मानते थे। सोचते थे – अवश्य ही पति-पत्नी में कुछ कहा-सुनी हुई होगी, कुछ डिमांड रख दी होगी इसने, उलाहना दिया होगा किसी बात का। विचलित मन से ड्राइविंग करना तो खतरनाक होता ही है।

एक दिन अचानक ही परिवार का पूनम के प्रति व्यवहार बदल गया। अब उसे अशुभ नही माना जा रहा था, बोझ नहीं समझा जा रहा था। अकस्मात् अपने प्रति परिवार को विनम्र हुआ देख, हैरान थी पूनम। अब उसका बहुत ध्यान भी रखा जा रहा था। पता चला कि सतीश का दस लाख रुपये का जीवन-बीमा हुआ था। यह बीमा-राशि पूनम को मिलने वाली थी।

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4-मोहभंग

फिस से लौटते वक्त श्यामलाल नुक्कड़ पर बैठी औरत से सब्जी खरीदना नहीं भूलता। औरत की गठी हुई बदन ही उसके आकर्षण का केंन्द्र था। वह बिना मोल भाव किये सब्जियाँ लेता और मुँहमाँगी कीमत दे देता; पर प्रतिदिन एक सवाल अवश्य पूछता।

अब तक उस औरत के बारे में मालूम हो चुका था कि उसकी एक बेटी भी है, जिसे वह पढ़ा लिखाकर एक काबिल इंसान बनाना चाहती है; पर उसके पति के बारे में तो कभी पूछा ही नहीं। देखने से तो विध़वा जैसी दिखती; पर चेहरे पर कोई भी शिकन नहीं।

पर आज श्यामलाल अपनी जिज्ञासा मिटा डालना चाहता था; अतः आते ही बोला- ‘‘क्या बात है, आज तो ताज़ा सब्जियों की तरह तुम भी नई ताज़ा लग रही हो। नई साड़ी भी खूब फब रही है।’’

‘‘हाँ, साहब साड़ी फट गई थी… लोग घूर- घूरकर देखते थे। समझ नहीं पाती कि लोग मेरी गरीबी को निहार रहे हैं या कुछ और।’’

‘‘तुम अकेले इतना सब करती हो और तुम्हारा पति?’’

‘‘यही तो रोना है साहब…’’

‘‘अरे माफ करना। मैंने तुम्हारी दुखती रग को छू लिया। मुझे क्या पता कि तुम्हारा पति अब इस दुनिया में..’’

‘‘मेरा पति जिंदा है साहब।’’

श्यामलाल जी को एक जबरदस्त झटका लगा।

‘‘जिन्दा है?’’

‘‘हाँ, पर वह जेल में बंद है।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्या है न साहब, पहले मैं एक बहुत बड़े साहब के यहाँ काम करती थी और मेरा पति भी उसका ड्राइवर था; पर एक रात शराब के नशे में उस कमीने ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की। मेरा पति तब अपना आपा खो बैठा। काफी रोकने की कोशिश की; पर वह नहीं माना और उसे मार ही डाला।’’

श्यामलाल तब बिना सब्जी लिए ही तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ा।

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 5-प्रौढ़ – प्रेम

हर शाम घड़ी में छह क्या बजते, राधा के पाँव पार्क की ओर बढ़ चलते। गोपीचंद तो पहले से ही पहुँचकर पत्थर की कुर्सी पर बैठ जाते और बगल वाली कुर्सी पर अपनी छड़ी रख देते; ताकि कोई और आकर बैठ न जाए।

यह एक शास्वत सत्य है कि पुरुष और स्त्री को आजीवन एक दूसरे की जरूरत रहती है, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं; पर जीवन के इस पड़ाव पर राधा एवं गोपीचंद दोनों अधूरे हो गए थे।

अचानक गोपीचंद को राधा आती हुई दिखी। तब वह कुर्ते की जेब से रूमाल निकालकर पत्थर की कुर्सी को पोंछने लगे। राधा रोज की इस प्रक्रिया को देखकर मुस्कुरा पड़ी। फिर उसके लिए आरक्षित रखी गई पत्थर की कुर्सी पर बैठ गई।

गोपीचंद ने अपनत्व जताते हुए पूछा – ‘‘आज देर हो गई?’’

‘‘हाँ, पड़ोसी महिलाओं के संग ‘मीना बाजार’ चली गई थी, अचानक जब घड़ी पर नजर पड़ी, तो सीधे पार्क चली आई।’’

‘‘इस बैग में क्या है?’’

फिर राधा ने एक-एक कर सारा सामान सामने रख दिया – ‘‘एक रूमाल, एक कलम, एक डायरी और छड़ी के लिए एक cचाँदी की मूठ।’’

‘‘तुम्हारा तो इस दुनिया में न कोई भाई है, न मामा, न काका और न ही तुम्हारा ….’’

‘‘पता नहीं, सब कुछ न कुछ खरीद रहीं थी, बस मैंने भी यह सब खरीद लिया।’’ और उसके चेहरे पर छा गई एक बाल सुलभ मुस्कान।

गोपीचंद बस गौर से देखते रहे -ये सारी चीजें तो उसकी जरूरत की ही लगी।

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6-कन्फ़ेस

पूरे क्लास की लड़कियाँ फादर के ऑफिस में खड़ी थीं … एक गुनाहगार की तरह। सब एक दूसरे को शंकित नजरों से निहार रही थीं और फादर उन सबको।

तभी शिप्रा मैडम दौड़ी-दौड़ी आई और फादर से बोली – ‘‘फादर, ये सारी लड़कियाँ निर्दोष है … कंडोम’ मेरे पर्स में था। दरअसल कल मेरे हसबैंड लेट नाइट पार्टी से आए और मैंने हमेशा की तरह उनकी पॉकेट चेक की तो ‘कंडोम’ मिला, जिसे मैंने पर्स में रख लिया।’’

फादर ने तब गुस्से से शिप्रा को निहारा। सारी लड़कियों को अपने क्लास में जाने की इजाज़त मिल गई।

‘‘तो ये गुनाह तुमने किया है?’’ फादर ने पूछा।

‘‘हाँ फ़ादर, गुनाह मैंने किया है; पर एक झूठ बोलकर।’’

‘‘मतलब?’’

‘‘लड़कियों के सामने झूठ बोला।’’

फादर को माजरा कुछ समझ में नहीं आया। फिर शिप्रा से कहा – ‘‘पहले इसे ठिकाने लगाओ।’’

‘’क्या करूँ …. डस्टबिन में डाल दूँ या जहाँ से उठाया था, वहीं रख दूँ?””

“क्या मतलब?”

“झूठ बोला, कबूल करती हूँ:  पर ‘कंडोम’ तो आपके ड्राअर से मिला।’’

फादर तब कन्फ़ेस करने के बजाय चीख पड़ा – ‘‘हाऊ यू डेअर टू टच माई ड्राअर ….. यू आर नाऊ सस्पेंडेड।’’

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6-रोबोट वाइफ

दरवाजे पर बेल बजाते ही दरवाजा खुल गया और एक आवाज आई-  ‘‘कम इन।’’

 अविनाश कमरे में प्रविष्ट हो गया। वहाँ कोई नहीं दिखा। फिर आवाज कहाँ से आई। शायद यहाँ भी रोबोट का जलवा। कमरे में धीमी रोशनी पर ए सी की भरपूर ठंडक। तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति कमरे में आया। आँखों पर चश्मा, अधपके लंबे बाल और चेहरे पर उन्मुक्त मुस्कान। सही में एक विचारक, एक वैज्ञानिक लगा। अविनाश ने अभिवादन करते हुए कहा, ‘‘आई एम अविनाश फ्रॉम इंडिया।’’

‘‘वेलकम’’ संक्षिप्त- सा उत्तर।

‘‘मैं कल एक रेस्टोरेंट में डिनर के लिए गया था। आपके द्वारा बनाया रोबोट लेडीज वेटर काफी पसंद आया। अच्छी खातिरदारी की, आम वेटर से बेहतर। तब मैं रेस्टोरेंट के मालिक से आपका पता पूछकर यहाँ आया हूँ। कैलिफोर्निया मुझे बहुत पसंद है।’’

‘‘ग्लैड टू हेयर … आने का मकसद ?’’

‘‘मैं चाहता हूँ कि आप मेरे लिए एक लेडी रोबोट बना दीजिए।’’

‘‘क्या तुम भी रेस्टोरेंट चालू करना चाहते हो?’’

‘‘नो … फॉर माई पर्सनल यूज।’’

‘‘मैं समझा नहीं।’’

‘‘मेरे सारे कलिग ने शादी कर ली। फिर किसी का डाइवोर्स हो गया, तो कोई जबरन छोड़ कर चली गई। किसी ने अपनी मरजी से दूसरे से भी रिलेशन बना लिया है। सो आई डोण्ट वांट टू मैरी। बस घर का सारा काम रोबोट वाइफ सँभाल लेगी।”

‘‘व्हाट अबाउट योर नेक्स्ट जेनेरेशन। तुम रोबोट के साथ सेक्स नहीं कर सकते।”

‘‘उसका भी हाल सोच लिया है। आई विल अडाप्ट ऐनी चाइल्ड।”

तब अधेड़ उम्र का आदमी उसे अपलक निहारता रहा। वह रोबोट को इंसान जैसा बना रहा; पर आज का इंसान रोबोट बनना चाह रहा।

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