जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: March 1, 2025

देवेन्द्र सुथार

1-अनुत्तरित प्रश्न

‘‘माँ, क्या यह देश हमारा भी है?’’
राजू के इस सवाल ने कमला को चौंका दिया। वह झुग्गी के बाहर मिट्टी के चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी। सामने की पटरी पर तेज़ी से गुजरती एक्सप्रेस ट्रेन की खिड़कियों से झांकती ठंडी हवा और रोशनी, जैसे झुग्गियों की अंधेरी गलियों को चिढ़ा रही थी।
‘‘बेटा, यह देश सबका है।’’ कमला ने जवाब दिया।
‘‘तो फिर हम इस झोपड़ी में क्यों रहते हैं? और वो लोग बड़ी-बड़ी कोठियों में?’’
कमला चुप रह गई। उसकी उँगलियों में पकड़ी रोटी जल गई थी।
स्कूल में टीचर ने कहा था कि भारत में हर नागरिक बराबर है। लेकिन यह बात राजू को समझ नहीं आई।
शाम को वह अपने पिता के साथ रोज़ की तरह कचरा बीनने निकला। कूड़े के ढेर में से काँच, प्लास्टिक और धातु के टुकड़े छाँटता हुआ वह सोच रहा था।
अचानक एक चमकदार वस्तु दिखी। यह टूटा हुआ मेडल था – ‘‘सर्वश्रेष्ठ स्वच्छता कर्मचारी’’। राजू ने उसे उठाया और अपने पिता की ओर देखा।
‘‘पिताजी, क्या हम भी इस देश के नागरिक हैं?’’
बूढ़े रामू ने बेटे की ओर देखा। उसकी आँखों में वही सवाल था, जो तीस साल पहले उसने अपने पिता से पूछा था।
रात को झुग्गी में लौटते समय राजू ने देखा – एक बड़ी कार के शीशे पर लिखा था ‘‘मेरा भारत महान’’। उसने जेब से वह टूटा मेडल निकाला और सड़क किनारे फेंक दिया। उसकी आँखों में अनुत्तरित सवालों की एक पूरी दुनिया थी।
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2-मुखौटे

सुधा ने सोशल मीडिया पर अपनी नई तस्वीर अपलोड की। पति के साथ रेस्तरां में डिनर, दोनों मुस्कुरा रहे थे। कैप्शन था – ‘‘परफेक्ट इवनिंग विद माय परफेक्ट हसबैंड।’’
लाइक्स की बरसात होने लगी। कमेंट्स में लोगों ने लिखा – ‘‘क्या जोड़ी है!’’ ‘‘रिलेशनशिप गोल्स!’’ ‘‘आप दोनों बहुत खुश नसीब हैं!’’
सुधा ने फोन नीचे रखा। आईने में देखा। मेकअप की परतों के नीचे छिपी नीली चोट उसकी सच्चाई को उजागर करने के लिए तड़प रही थी। कल रात की यादें ताजा हो गईं। पति की डांट, फिर धक्का, फिर…
वॉट्सऐप पर माँ का मैसेज आया – ‘‘बेटी, तुम ठीक हो न? तुम्हारी आवाज़ से कुछ अजीब लग रहा है।’’
‘‘हाँ माँ, सब बहुत अच्छा है,’’ सुधा ने जवाब दिया।
अगली सुबह। सुधा ऑफिस पहुँची। टेबल पर एक फाइल रखी थी – घरेलू हिंसा के खिलाफ नई कानूनी नीतियाँ। उसने फाइल खोली। पहले पेज पर एक औरत की तस्वीर थी – उसकी मुस्कान में छिपा दर्द मानो सुधा को आईने में अपना अक्स दिखा रहा हो। नीचे लिखा था – ‘‘हर मुस्कान एक कहानी छिपाती है।’’
सुधा की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे-धीरे सोशल मीडिया का आइकन डिलीट किया, मानो अपनी जिंदगी के झूठ को मिटा रही हो। आज से, वह सच के साथ जीने का संकल्प ले चुकी थी।
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3-एक गिलास दूध

‘‘बीबी जी, आज दूध नहीं ला पाऊँगी।’’ लक्ष्मी की आवाज़ धीमी थी।
सरोज बेन चौंकीं- ‘‘क्यों?’’
‘‘गाय बीमार है।’’
‘‘दूसरी जगह से क्यों नहीं लाती? मेरे बच्चे को दूध चाहिए।’’
लक्ष्मी चुप रही। उसकी आठ साल की बेटी गीता स्कूल की वर्दी में तैयार खड़ी थी।
‘‘जाओ गीता,’’ लक्ष्मी ने कहा। ‘‘दादी के घर से होकर जाना।’’
गीता चली गई। लक्ष्मी ने झाड़ू उठाई और काम में लग गई।
शाम को सरोज बेन ने देखा – लक्ष्मी की गीता उनके बेटे के साथ टीवी देख रही थी। दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे।
‘‘गीता बेटा, तुम्हारी माँ ने दूध का इंतज़ाम कर लिया?’’
गीता ने मासूमियत से कहा, ‘‘नहीं आंटी, माँ कहती हैं कि दादी के घर से दूध लेकर आना, ताकि छोटू को यहाँ दूध मिल सके।’’
सरोज बेन का हाथ रुक गया। अब उन्हें समझ आया – लक्ष्मी हर रोज उनके बच्चे के लिए अपनी बेटी का दूध क्यों नहीं लाती थी।
उस रात सरोज बेन ने पहली बार महसूस किया कि माँ का प्यार सिर्फ अपने बच्चों तक सीमित नहीं होता। उन्होंने अपने बेटे को बिना दूध के सुलाया, लेकिन मन में एक नया एहसास जाग उठा।

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4-गणतंत्र की चादर

‘जय हिंद!’ के नारे लगाते हुए मंच से उतरे और सीधे अपनी सरकारी गाड़ी की ओर बढ़े। ड्राइवर ने दरवाजा खोला। पीछे की सीट पर बैठते ही उन्होंने मोबाइल निकाला और एक नंबर डायल किया।
‘हां बोलो श्रीवास्तव… कार्यक्रम खत्म… हां, भाषण दे दिया। संविधान, कानून, नागरिक कर्तव्य – सबकुछ। अच्छा सुनो, वह जमीन वाला काम हो गया? …क्या? अभी तक नहीं? अरे यार, कितनी बार कहा है, जहां कानून ना चले वहां पैसा चलाओ, जहां पैसा ना चले वहां दबाव डालो और जहां दबाव ना चले… वहां फिर से पैसा चलाओ।’
गाड़ी चल पड़ी। सड़क किनारे लगे तिरंगे झंडे हवा में लहरा रहे थे।
‘और सुनो… उस पत्रकार को समझा दिया ना? …बहुत अच्छा। अब वह नहीं लिखेगा हमारे खिलाफ और हां, वह स्कूल की जमीन… उस पर मॉल बनाने का प्लान फाइनल करो। बच्चे कहीं और पढ़ लेंगे।’
अचानक गाड़ी रुकी। सामने एक बुजुर्ग महिला सड़क पार कर रही थी।
‘अबे ये बुढ़िया कहां से आ गई? …नहीं-नहीं श्रीवास्तव, तुमसे नहीं कह रहा था। अरे चलो भी!’ चिल्लाए।
ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। महिला ने धीरे से सर उठाया और देखा। उसके हाथ में तिरंगा था। शायद गणतंत्र दिवस समारोह से लौट रही थी।
‘सर, जेब्रा क्रॉसिंग है,’ ड्राइवर ने धीमे से कहा।
‘तो क्या हुआ? साइड से निकाल लो।’
गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ गई। महिला ने डर से एक तरफ छलांग लगाई। उसके हाथ से तिरंगा छूट गया।
गाड़ी आगे बढ़ गई। पीछे की सीट से आवाज आई – ‘हां तो श्रीवास्तव, कह रहा था… कानून तो सिर्फ भाषण में अच्छा लगता है। असली जिंदगी में तो…’
पीछे सड़क पर धूल में लिपटा तिरंगा हवा में थरथरा रहा था।

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5-तिरंगे की आड़

‘जय हिंद!’ की गूंज के साथ तिरंगा लहराया और सड़क किनारे खड़े दुकानदार राजू ने अपनी दुकान पर टंगे स्पीकर की आवाज़ और तेज़ कर दी। पुलिस वाला रमेश जो रोज़ उससे चाय पीने आता था, आज भी वहीं खड़ा था।
‘साहब, आज तो बड़ा दिन है। कुछ मिठाई तो ले जाइए,’ राजू ने कहा।
‘अरे भई, आज तो कानून का दिन है। फ्री में कैसे ले जाऊं?’ रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘साहब, आप भी… रोज़ तो फ्री में ही ले जाते हैं। आज क्या कानून याद आ गया?’
दोनों ठहाका लगाकर हंसे। तभी एक स्कूटर तेज़ रफ्तार से आया। बिना हेलमेट के दो युवक, हाथों में तिरंगा लहराते हुए। पीछे बैठे युवक ने गर्व से चिल्लाया – ‘भारत माता की…’
रमेश ने सलामी दी। स्कूटर आगे निकल गया।
‘वाह साहब, कमाल कर दिया! ट्रिपल राइडिंग, बिना हेलमेट और आप सलामी दे रहे हैं?’ राजू ने कहा।
‘अरे भाई, तिरंगा देखा नहीं? देशभक्त हैं वो। आज के दिन तो माफ़ करना बनता है।’
तभी एक कार आकर रुकी। शीशा नीचे हुआ। अंदर बैठा व्यक्ति कार से ही चिल्लाया – ‘रमेश भाई, नमस्ते! कैसे हो?’
‘अरे सेठ जी, आप! कहिए क्या सेवा करूं?’
‘कुछ नहीं भाई, बस आपको याद दिला दूं कि कल रात वाली बात…’
‘हां-हां सेठ जी, सब याद है। आप निश्चिंत रहिए।’ रमेश ने कार के अंदर झांकते हुए कहा।
कार चली गई। राजू ने देखा कार की डिग्गी से एक तिरंगा झांक रहा था।
‘क्या बात थी साहब?’ राजू ने पूछा।
‘कुछ नहीं, कल रात एक ट्रक पकड़ा था। माल ज़्यादा था। सेठ जी ने कहा है सब ठीक कर देंगे।’
‘और आप मान गए?’
‘अरे भई, देखा नहीं तिरंगा लगा है उनकी कार पर? देशभक्त आदमी हैं।’ रमेश ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा।
शाम को राजू ने देखा रमेश की जेब भारी हो गई थी और उसकी दुकान के सामने का अवैध कब्ज़ा भी बच गया था। आख़िर दोनों ने मिलकर दुकान के ऊपर एक बड़ा तिरंगा टांग दिया था।
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 6-खिड़की के पार

“कौन है वहां?” बूढ़ी विधवा सुमित्रा ने खिड़की से झांका।
“मैं हूँ, बगल वाले घर का अंशु। चाय मिलेगी?”
सुमित्रा हतप्रभ रह गई। “तुम्हारे घर में चाय नहीं?”
अंशु मुस्कराया, “आपके जैसी चाय कहीं नहीं मिलती।”
सुमित्रा हँसी। उसने चाय बनाई और अंशु को पकड़ा दी।
“आप हमेशा खिड़की से बाहर क्यों देखती रहती हैं?”
सुमित्रा ने धीमे स्वर में कहा, “शायद कोई अपना लौट आए।”
अंशु ने झिझकते हुए पूछा, “क्या मैं अपना हो सकता हूँ?”
सुमित्रा की आँखें छलछला गईं।
उस दिन के बाद अंशु हर शाम खिड़की पर दस्तक देता। धीरे-धीरे सुमित्रा के घर की खिड़की में उम्मीद की रोशनी चमकने लगी।

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– देवेन्द्रराज सुथार
स्थानीय पता – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025
मोबाइल – 8107177196

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