1.फेयरवेल

“जया हमारी शादी के पचास साल होने जा रहे हैं!”-मनोहर जी खोए-खोए से बोले।
“हाँ जी… ! कब बीत गए पता ही नहीं चला? ज़िन्दगी के खट्टे मीठे लम्हें बिगड़ते सँवरते बीत गए… !”-कमरे की दीवार पर टंगे दोनों के फोटो को निहारती जया बोली।
“जब सब लोग साथ छोड़ गए तब तुम्हारा कंधे का ही सहारा था जया!”-मनोहर जी भावुक हो गए।
“सुनो जी बच्चे हमारी पचासवीं वर्षगांठ को धूमधाम से मनाने की सोच रहे हैं?”
“चलो इस बहाने चहल पहल तो हो जाएगी!”
“मैने तो कहा था मत करो इतना ख़र्चा अब इन बूढ़ी हड्डियों का क्या जश्न मनाना?”
सुन कर मनोहर जी यादों में खो गए और आहिस्ता से बोले-“तुम्हें तुम्हारे स्कूल के दिन याद है न जया…? जब स्कूल का आखिरी साल होता था तो सारा स्कूल मिलकर फेयरवेल देता था!”
“हाँ जी …! वे सब धूमधाम से पार्टी देते थे। खूब खुशियाँ मनती थी पर उसमें जुदा होने का दर्द भी छुपा रहता था!”
दोनों यादों में खो गए! चुप्पी तोड़ते हुए जया बोली-” बच्चों ने करीबियों की लिस्ट बनाई है, आप ज़रा देखकर अंतिम रूप दे दें?
“मेरा चश्मा कहाँ है जया… ज़रा दे दो?”
“मुझे क्या पता जी, आपने रखा है आप ही जानो?”-जया झुँझलाकर बोली
” अरे यार तुम से मेरा छोटा-सा काम भी नहीं होता?-मनोहर जी ज़ोर से बोले।
जया पहले तो हड़बड़ा गई फिर हँसते-हँसते दोहरी हो गई और बोली-“अरे वह देखो ज़रा …? गुस्से की तरह चश्मा तो तुम्हारी नाक पर रखा है?”
मनोहर जी सकपकाए और फिर धीरे से बोले-“बुढ़ापा है यार…फिर हमारा वह भी तो आ गया है?”
“वो क्या जी?”
मुस्कराहट के पीछे जुदाई के अहसास के दर्द को बरबस छुपाते हुए बोले- “फेयरवेल”
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2.उलझे सवाल
वह हुलस कर उसके पास आई और बोली-“राजू खेलोगे मेरे साथ?”
“नहीं रे तुम गंदी बच्ची हो”
“मैं तो रोज़ नहाती हूँ फिर गंदी कैसे हुई?”
“मेरी मम्मी को कहती है इसलिए?”
“तुम्हारी मम्मी ऐसा क्यों कहती है?”
“तुम काम वाली आंटी की बेटी हो न… इसलिए?”
“अच्छा…!”-वह रुआँसी हो गई।
“अच्छा चलो मेरे पास चॉकलेट है… खाओगी?”-राजू ने उसे उदास देखकर कहा।
“चॉकलेट…? लाओ दो…? पर मैं तो गंदी बच्ची!”-उसकी बाँछें खिल गई।
“अरे मैं दे रहा हूँ न?”-उसने चॉकलेट लहराई
लड़की ने खिल-खिलाकर उसके हाथ से चॉकलेट छीन ली।
“खेलें…? मम्मी को बताना मत?”
“हाँ” -लड़की खिलखिलाई।
“तुम चाँद का टुकड़ा हो।”
“हट, पागल हो गए क्या? चाँद तो आसमान में रहता है!”
“पर मेरे पापा तो कभी-कभी मम्मी से कहते हैं?”
“चलो हम मिट्टी का घर बनाए!”
“हाँ… मिट्टी से खेलने में मज़ा आता है पर मम्मी …?”
थोड़ी देर में मिट्टी का सपनों का महल बन गया ! नन्हे वास्तुकारों ने उसमें अपने सारे सपने भर दिए।
पर तभी कहर टूट पड़ा। आग बबूला राजू की मम्मी ने महल पर हमला बोल दिया-“ठहर राजू के बच्चे गंदे बच्चों के साथ खेल रहा है? बीमार पड़ना है क्या?”
उनके सपनों का महल मम्मी के पैरों तले कुचल गया था।
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3.अपना घर
गाहे बगाहे दादी उलाहना दे देती थी-“मन्नू तू तो पराई अमानत है, एक दिन ये घर छोड़ कर चली जाएगी।”
माँ भी उनकी हाँ में हाँ में मिला कर कहती थी-“सच अम्मा जी लड़कियों की भी क्या ज़िन्दगी होती है, बस चिड़िया की तरह फुर्र हो जाती है? उनका कोई अपना घर नहीं होता?”
वह रुठ कर कहती थी-“मैं कहीं नहीं जाऊँगी, ये घर मेरा है!”
ससुराल में अपने कमरे में वह छुई मुई-सी डरी-डरी बैठी बीते दिनों के ख्यालों खोई हुई थी-“लड़की का अपना घर क्यों नहीं होता?”
तभी उसने सुना उसकी सासू माँ उसके चौदह साल के देवर से कह रही थी-“सौरभ अब तू अपनी मन्नू भाभी से पूछा कर, वह नए ज़माने को समझती है और अब ये घर उसी का है!”
“यह उसका अपना घर…?” शब्द उसके कानों में मिश्री की तरह घुल गए। उसने उठ कर आत्मविश्वास से अपने आप को दर्पण में निहारा और अधिकार से घर के कोने-कोने को देखने लगी।
सौरभ कह रहा था-“भाभी आपने तो मेरा कमरा हथिया लिया अब मैं कहाँ जाऊँ?”
वह मुस्करा कर बोली-“देवर जी क्यों मज़ाक करते हो?”
वह खिड़की पर फुदकती चिड़िया के पास जा कर फुसफुसाई-“जा माँ से कह देना चिड़िया का भी अपना घर होता है!”
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4. धुंध में तैरता भय
“सुनो जी मेरा हाथ बहुत दर्द कर रहा है”-रात को बिस्तर पर लेट कर पसीना पोंछते हुऐ कौशल्या बोली।
“इस उम्र में हाथ पैर दर्द नहीं करेंगे तो क्या दिल में इश्क़ के मर्ज वाला दर्द होगा?”-रामेश्वर जी ने खांसते खांसने तंज कसा।
“उफ़ ये खाँसी… ? अब तो सिगरेट बंद करदो? आपको कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी?”-कौशल्या ने झिड़का।
“कौशल्या तुम्हारे हाथ का दर्द कहीं सचमुच दिल की बीमारी तो नहीं है?”-रामेश्वर जी अब गम्भीर थे।
“लगता तो नहीं है…?”-कौशल्या बोली
“कभी हाथ दर्द करता है, कभी पीठ, कमर घुटने? मेरे जाने के बाद कौन सम्हालेगा तुम्हें? अच्छा तो ये रहेगा मेरे सामने ही छुट्टी पा जाओ तो मैं चिंता मुक्त हो जाऊँगा!”
“रह लोगे मेरे बिना…?”-कौशल्या ने ताना मारा!
“अरे तुम्हारी ज़रूरत क्या है? मुझे क्या चाहिए बस दो वक़्त की रोटी जो मिल ही जाएगी और चाय तो मैं ख़ुद बना लेता हूँ!”-अब रामेश्वर जी ने ढींग मारी।
“चलो ठीक है मैं तो निश्चिंत हुई.!”
“सुनो तुम सोते वक़्त सांसे बहुत तेज लेती हो! उसकी आवाज़ से मुझे नींद नहीं आती?” रामेश्वर जी बोले
कौशल्या ने तेज नजरों से उन्हें देखा और करवट बदल कर सो गई।
आधी रात बीत गई। रामेश्वर जी को नींद नहीं आ रही थी। उन्होने कौशल्या की तरफ़ देखा।
“आज इसकी सांसों की आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही हैं? पीठ में भी हलचल नहीं है?”-वो बुदबुदाए।
उन्हें लगा जैसे चारों तरफ़ धुंध के बादल छा रहे हैं और बादलों में वह दोनों तैर रहे हैं …एक दूसरे का हाथ पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं पर दूर होते जा रहे हैं। एक काली छाया कौशल्या को पकड़ रही है।
“हे भगवान… चली तो नहीं गयी? सब कुछ तो उसे ही पता है मेरा टावल… टूथ ब्रश, पेस्ट, दवा सभी कुछ तो उसी से मांगता हूँ? सांसे भी सुनाई नहीं दे रही है, कोई हलचल भी नहीं है?”-आशंका से पसीने-पसीने हुऐ रामेश्वर जी करवट बदल कर लेटी कौशल्या पर लगभग झुकते हुऐ उसकी नाक पर अंगुली रख सांसो को अनुभव करने की कोशिश करने लगे। हड़बड़ा कर कौशल्या उठी और आंखे मलती हुई बोली-“सारा वज़न मुझ पर क्यों डाल रहे हैं बुढ़ऊ… मारने का इरादा हे क्या?”
रामेश्वर जी निश्चिंतता की साँस छोड़ते हुऐ बोले-“कुछ नहीं… बस यूँ ही… तुम सो जाओ!”
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5.इंतजार
झील की लहर झूम कर किनारे रखी बेंच से टकराईं और पूछा-“तुम इतनी उदास क्यों हो?”
“वीरान जगह पर कोई कैसे खुश रहेगा?”
“तीनों बुज़ुर्ग जो तुझ पर बैठ कर बतियाते थे वह कहाँ गए?”
“मत पूछ लहर कौन किसका साथ देता है?”
“कितनी दिलचस्प बातें करते थे न वो?”
“अरे लहर…! वह पैंसठ साल का बंगाली…बाप रे क्या ऊँची फेंकता था? मेरे तो हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाते थे?”
“उसका क्या हुआ तुम्हें पता है बेंच?”
“दोनों बुज़ुर्ग उदास हो कर बतिया रहे थे कि उसको कोई कोरोना नाम की बीमारी निगल गई! दोनों रो रहे थे बहन लहर!”
“अब वह दोनों भी तो नहीं आ रहे हैं न… क्या हुआ?”
“लहर…! दोनों बुड्डे बहुत याद आते हैं! इस उम्र में भी कितने रोमांटिक थे दोनों? ऐसे चुटकुले सुनाते थे, सच मैं तो उत्तेजना से लाल हो जाती थी?”
“वे लोग राजनीति, धर्म, व घर की चर्चा नहीं करते थे…हे न?”
“वे कहते थे हम वीराने में कड़वी दवा खाने तो नहीं आए… कुछ-कुछ मन की भी तो करले? लहर उन्हें शिकायत थी कि आजकल के बच्चे बस पैकेज और नौकरी की बात करते हैं… रोमांस तो जैसे भूल ही गए हैं!”
“बेंच बहन…! ज़रा बताओ वे लोग कहाँ चले गए, बहुत याद आती है उनकी?”
“एक दिन एक बुढ़ऊ अकेले आए थे और रो-रो कर जी हलकान कर रहे थे, लहर बहन बस एक ही रट लगाए थे-अल्लाह ऐसी कलयुगी संतान को दोजख बख्शे…! स्यालों को बाप बोझ लगता है…भेज दिया न मेरे यार को ओल्ड होम्ज में?”
“ओह! बेंच बहन इंसानों की दुनिया में ऐसा भी होता है क्या?”
“बस वह ही आखिरी दिन था लहर बहन, उसके बाद कोई नहीं आया? मैं बहती हवा से रोज़ कहती हूँ वे बुज़ुर्ग मिले तो कहना कोई उनका इंतज़ार कर रहा है?”-कह कर बूढ़ी बैंच चरमराकर खाँसने लगी!
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6.आराम कुर्सी
“आपकी नयी आराम कुर्सी आ गई है!”-अम्मा ने बाऊ जी को बोला।
“नहीं… मैं वैसे ही ठीक हूँ?”-राम जी तल्ख़ी से बोले।
“खाना खा लीजिए?”
“भूख नहीं है!”
“आप भी न अभी तक उस पुरानी कुर्सी के मोहपाश में बँधे हैं?”
“वह बुजुर्गों की निशानी थी!”
“मैंने तो संजय से ठीक कराने के लिए बोला था पर उसने…?”
“उसने उसे बेच दिया?”-राम जी गुस्से से बोले।
“वह बोला अम्मा कब तक इस बाबा आदम की कुर्सी से चिपककर बैठे रहोगे?”
“ऊँ हूँ बाबा आदम की कुर्सी… ? हम भी पुराने हैं, हमें भी नीलाम कर दे?”-राम जी तिलमिलाए।
अम्मा उन्हें नहीं समझा पाई और झल्लाकर काम पर लग गई ।
राम जी ने देखा उन्होंने जो मकड़ी का जाला हटाया था, वह मकड़ी ने पुनः बना लिया है। बालकनी से अम्मा चिल्ला रही थी-“मुए ये कबूतर रोज-रोज़ तिनके इकट्ठे कर बैठने की जगह बना लेते हैं…! पुराना हटाती हूँ और ये नया बना लेते हैं? लो आज तो अंडे भी दे दिए… करूँ तो क्या करूँ?”
राम जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई! परिवर्तन तो सतत है! जो बात इंसान नहीं समझा पाए, वह इन बेजुबानों ने समझा दी थी! उन्होंने चश्मा हटाकर गीली आँखों को पोंछा और अम्मा को आवाज़ लगाई-“संजय की अम्मा सुनो ज़रा मेरा खाना लगादो!”
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7.दो रोटी
“आलू भिंडी, प्याज, टमाटर, लाल मीठा मेलन वाटर”
“एकदम ताज़ा सब्जियाँ”-सब्जी वाला जैसे ही आवाज़ लगाता वह दौड़ी-दौड़ी दरवाजे पर आती और आवाज़ लगाती-“रूक जा अब्दुल सब्जी नहीं देगा क्या?”
अब्दुल मुस्कराते हुए बोलता-“सलाम अम्मा…! अरे दिन की शुरुआत तो आपसे ही करानी है न?”
देवकी हल्के से झिड़कती-“चल झूठे…! फ़िज़ूल मस्का मत लगाया कर! अच्छा बता आलू क्या भाव है, भिंडी कैसे दी…प्याज तो नया है न? और बता धंधा कैसा चल रहा है!”
अब्दुल जानता था अम्मा को आज क्या और कितना लेना है, सोमवार को सौ ग्राम भिंडी, मंगलवार को दो आलू, बुधवार को थोड़ा-सा पालक, गुरुवार को एक टिंड्डा, शुक्रवार को लौकी, शनिवार को ककड़ी और रविवार को प्याज, मिर्च, धनिया! फिर भी वह देवकी का मन रखने के लिए सारे भाव बताता और रटा-रटाया जवाब-“आपकी दुआ से रोटी मिल रही है अम्मा …अकेली जान को कितना चाहिए?”
देवकी पैसे देने का उपक्रम करती तो वह बोलता-“भला अपनी अम्मी से भी कोई पैसे लेता है?”
पहले पहल तो अम्मा ने झिझकते हुए झोले से दो रोटी निकाली और स्नेह से बोली-“अब्दुल कल मेरी ये दो रोटी बच गई, मैं अकेली जान किसको दूँगी…तू खा लेगा क्या… प्याज़ से खाले?”
दो रोटी का क्रम शुरू में कभी-कभी चला फिर नियमित हो गया
विचारों में डूबा अब्दुल भौंचक्का—सा ठेले को एक तरफ़ खड़ा कर सामने अर्थी पर लेटी अम्मा को देख रहा था! उसने डबडबाई आँखों से अर्थी सजाते पड़ोसी से पूछा-“कब कैसे हो गया?”
“पता नहीं शाम तक तो अच्छी भली थी…! रात को ही किसी वक्त…?”
अब्दुल ने ठेले से चार पांच भिंडी उठाई और अम्मा के चरणों की तरफ़ रखते हुए बोला-“आज सोमवार है भिंडी नहीं लोगी क्या…? मेरी दो रोटी कहाँ है अम्मा… बहुत भूख लगी है?” और फूट-फूट कर रोने लगा।
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पदम गोधा गुरुग्राम हरियाणा
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