जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: June 1, 2024

1-बुरे मौसम में
               
  सारे घर में अफ़रा-तफ़री मची हुई थी।
‘‘अभी तो यहीं थी, कहाँ चली गई? हे भगवान! कहाँ ढूँढूँ?’’
राधा का कलेजा मुँह को आ रहा था। माथे पर पसीनें की बूंदे उभर आईं। हथेलियाँ पसीज गईं।
‘‘कहीं कोई।।?’’ सोचते ही राधा का कलेजा भींच गया।
‘‘नहीं-नहीं।’’ राधा ने बुरे विचार को झटकना चाहा।
‘‘तुमने कब देखा था उसे?’’ परेशान होते हुए पति बोला।
‘‘अभी कुछ देर पहले, जब मैं किचन में थी। तब तो यहीं खेल रही थी।’’
‘‘तुम भी राधा।।बच्ची का ख़्याल नहीं रख सकती।’’ पति ने  झल्लाते हुए कहा।
राधा के आँसू रुक नहीं रहे थे।
टीवी न्यूज एंकर की आवाज़ उसके कानों में पड़ रही थी,’’ एक और मासूम बच्ची से रेप। आरोपी फरार।’’
‘‘प्लीज़ टी।वी। बंद कर दो।’’
 राधा के सामने एक भयंकर दृश्य खिंच गया। वह सिहर उठी। खौफ ने उसे जकड़ लिया था। ज़मीन तेज़ी से घूम रही थी। सोफे पर सिर थामकर बैठ गई। आँसू थम नहीं रहे थे।
‘‘हाय राम कहाँ ढूँढू? कहाँ है मेरी बच्ची?’’
पति बेचैनी से इधर उधर घूम रहा था। चेहरे पर तेज़ी से भाव आ जा रहे थे।
‘‘छत पर देखा?’’ वह बोला।
राधा बिजली के फुर्ती से उठी। छत पर पहुँची। इधर-उधर देखा। कोई दिखाई नहीं दिया। तेज़ी से गुमटी की और लपकी। कोने में बैठी में बैठी ट्विंकल डॉल से खेल रही थी। राधा ने लपकर ट्विंकल को छाती से चिपटा लिया। वह मम्मी को हैरानी से देख रही थी।

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 2-कसूर

     वसंत का एक मोहक दिन था। एक छोटा बच्चा प्रभात अपनी कक्षा में बैठा था। सभी बच्चे अपनी-अपनी कॉपी में सुलेख लिख रहे थे। बच्चा मंत्रमुग्ध सा खिड़की के बाहर बगीचे को देख रहा था।
‘‘लिखता क्यों नहीं?’’ सर की भारी आवाज़ के साथ छड़ी उसकी पीठ पर पड़ी। छड़ी पड़ते ही वह तिलमिला उठा। आँखों में पानी उतर आया। बाहर बगीचे में फूल पर बैठी तितली उड़ गई।

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  3-जंगल

‘‘एक जंगल है।’’
‘‘अच्छा।’’
‘‘जंगल में ऊँची-ऊँची बिल्डिंग हैं।’’
‘‘ऐसा कैसे? जंगल में तो पेड़ होते हैं।’’
‘‘जंगल में चौड़ी सड़कें हैं।’’
‘‘ये क्या गप सुना रहे हो भाई?’’
‘‘जंगल में बहुत सारी गाड़ियाँ इधर-उधर दौड़ती हैं।’’
‘‘अब रहने दो भाई, कुछ भी बोले जा रहे हो।’’
‘‘जहाँ तू खड़ा है ये क्या है?’’
‘‘नया शहर।’’
‘‘पहले यहाँ क्या था?’’
‘‘जंगल।’’
‘‘तो फिर!!!’’

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 4- एक प्याली चाय

  “हे भगवान! कड़ाके की ठंड है। अगर एक प्याली चाय मिल जाए तो…”- रिटायर्ड विधुर वर्मा जी रजाई की बुक्कल मारते हुए सोचने लगे।
‘‘बहू कमरे में है, कैसे बुलाऊँ? नकचढ़ी बहू चाय कहाँ बनाएगी।” बड़बड़ाते हुए वर्मा जी जान-बूझकर खाँसने लगे।
‘‘शायद बहू पूछने ही आ जाए।’’ आशा का दीया मन के अँधेरे कोने में टिमटिमा रहा था।
 कई बार  खाँसने के पश्चात भी पुत्रवधू के आने की आसार न देखकर वर्मा खामोश हो गए। आँखों पर चश्मा चढ़ाया और किताब खोलकर पढ़ने लगे। पढ़ने में मन न था। वह तो चाय की प्याली में उलझा हुआ था। किताब बंद कर चश्मा कवर में रख दिया।
     गेट खुलने की आवाज़ के साथ चाय की चाह ने एक बार फिर सिर बाहर निकाला। वर्मा जी ने ज़ोर से खाँसा। स्कूटर खड़ा करके वर्मा जी का बेटा कमरे में आया और झझलाते हुए बोला, “अगर इतनी खाँसी है, तो दवाई क्यों नहीं लेते?’’
  वर्मा जी निरुत्तर हो गए। सोच रहे थे कि एक प्याली चाय के लिए कह दे। किंतु बेटे का गुस्सा देखकर चुप रह गए।
   ‘‘सुधा! बहुत ठंड है यार। ज़रा एक कप चाय पिला दो।’’ वर्मा जी का बेटा पत्नी से बोला।
   वर्मा जी के कान बेटे की ओर लगे थे। एक हल्की- सी आशा ने करवट ली। शायद अब की बार चाय मिल जाए।
     काफ़ी समय बीत गया। चाय नहीं आई। वर्मा जी ने मन मारकर रजाई से मुँह ढाँप लिया। गरमागरम भाप छोड़ती हुई चाय की प्याली हाथ में लिये स्वर्गवासी पत्नी की तस्वीर स्मृति में तैर गई।

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 5-  हरा
    रेड लाइट पर कार रोकी। विंडो का शीशा नीचे किया। गुब्बारे बेचने वाले एक बच्चे को पास बुलाया।
‘‘दो गुब्बारे दे दो मुझे।’’
‘‘कौन से साब, लाल… पीले…नीले?’’
‘‘हरा नहीं है?’’
‘‘बस हरा नहीं है साब।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘मुझे हरा रंग अच्छा नहीं लगता साब।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘जब ये बत्ती हरी होती है न साब।’’
‘‘हाँ।’’
‘‘तो गाड़ी चली जाती है। हाथ का गुब्बारा हाथ में ही रह जाता है साब।’’

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6- याद है?

   कब मिले थे मुझसे…याद है? कब आत्मीयता से दोनों हाथों में भींचकर छाती से लगाया था? कब चुपके से रस घोला था मैंने तुम्हारे मन में? कभी मुस्कराते थे और कब गमगीन हो जाते थे। घंटों बैठे रहते थे साथ-साथ। मौन रहकर भी करते थे ढेर सारी बातें। लंबे सफर में हमेशा मैं ही साथ रहती थी। दादी का प्यार, नानी का दुलार। सब कुछ तो दिया था मैंने तुम्हें।।।याद है कुछ? हथेलियों के अहसास को तो भूल ही गए हो। तुम हो थे न जो बचपन में दाढ़ी, मूँछ बनाकर तंग करते थे मुझे। पहचाना? शायद याद नहीं आ रहा है! माथे पर इतनी गहरी सलवटें मत डालो। मैं।। हाँ मैं।।वही किताब हूं। जिसे छोड़े तुम्हें वर्षो हो गए। इस मोबाइलपने को छोड़कर कभी कभी पढ़ लिया करो मुझे। बंद धूल भरी किताबों के पन्नों के कोनों पर पेंसिल से लिखे बहुत सारे एहसास मिलेंगे तुम्हें।
हाँ सचमुच।। मैं अब भी रस घोलती हूँ ज़िंदगी में। कभी मिलो तो सही। 

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7- कर्फ्यू
      धुँधलका छा गया। चिरायंध हवा में व्याप्त थी। जलते हुए मकानों की चौखटों से चट-चट की आवाज़ें आ रही थीं। सन्नाटा पूरे मोहल्ले में पैर पसारे पड़ा था। स्तब्धता चारों ओर छाई हुई थी।
हिंदू-मुस्लिम के झगड़े ने हर दरवाज़े साँकले चढ़वा दी। ज़रा सी आहट बेचैन करने वाली थी। दिन पर दिन रेंग रहे थे। कनस्तर बजने लगे। आटा खत्म। तली दिखने लगी। टोकरी में धरी प्याज़ भी ख़त्म। आलू बचे नहीं।
सरोज ने पिछली दीवार के आले से ईंट निकाली और सुराख से  झाँककर सलमा को आवाज़ देकर बोली-
  ‘‘बाजी! आलू रखें हैं क्या? बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं।’’
   ‘‘आलू तो है जीजी, ले लो। और थोड़ा- सा आटा है तो।…”-सलमा बोली।  

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