1- एक मौत सच
तीसरी बार वे सचमुच मर गए। मौत के लिए सचमुच कहना सच्ची बहुत अजीब लगता है। आदमी क्या बार-बार मरता है…? शायद नहीं, पर वे कई बार मरे थे। पहली बार तब जब ढेर सारे लोगों के सामने पीड़ा की साक्षात् मूर्ति बनी पत्नी से उन्होंने लड़ख़ड़ाती ज़बान में कहा था, “अपने मरने का मुझे इतना दुःख़ नहीं, जितना इस बात का कि मैं धन के सिवा तुम्हें कोई और सुख नहीं दे सका…” और तब सम्बन्धियों के जाते ही उन्हें अचेतन हालत में जानकर पत्नी बड़बड़ाई थी, “दिन भर इनका गू-मूत साफ करते-करते मेरी तो ज़िन्दगी ही नरक बन गई। किसी तरह मरें, तो कोई सुख़ मिले।”
और दूसरी बार तब जब प्राण हलक में अटके ही थे कि तभी करीबी रिश्तेदारों की गिद्ध दृष्टि उनके धन पर अटक गई थी और वे नाप-जोख़ में जुट गए थे। जल्दी मरें, तो वे सब भी कुछ पाएँ…सारी ज़िन्दगी उनकी चाटुकारिता में बीत गई… आखिर अब तो कुछ मुआवजा मिलेगा।
और तीसरी बार…संतान कोई थी नहीं और पत्नी नकली कंठफोड़ विलाप में व्यस्त थी, तब रिश्तेदारों ने आनन-फानन में ही सारी तैयारी कर दी। एक ने उन्हें बिना नहलाए-धुलाए ही सस्ते क़फ़न में लपेट दिया और दूसरे ने जल्दबाजी में बनाई गई लचकदार बाँस की अर्थी में पटक दिया, तो उन्होंने (आत्मा) इस भौतिक संसार से विदा लेना ही उचित समझा।
थोड़ी देर बाद जब भाई-भतीजों के कंधे पर सस्ती-लचकदार बाँस की अर्थी थी और “राम नाम सत्य…” का समवेत स्वर पत्नी के ऊँचे विलाप में गड्मड हो रहा था, वे सच में मृत्यु को प्राप्त थे।
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2-लड़की
पूरे मोहल्ले में यह ख़बर आग की तरह फैल गई कि पण्डित राघोराम की जवान लड़की गीता को पुलिस पकड़ कर ले गई। लेडी पुलिस जीप लेकर आई थी।
ख़बर सुनते ही मोहल्ले के लोग बहाने से राघोराम के घर में ताँक-झाँक करने लगे, पर वहाँ से उन्हें कोई भी सुराग नहीं मिल पा रहा था। जवान लड़की के यूँ पकड़े जाने पर जिस हलचल की आशा वे सब कर रहे थे, उसके प्रतिकूल राघोराम के घर में शान्ति छाई हुई थी, जिसके कारण सबको निराश होना पड़ रहा था। उनकी बेशर्मी से सब हैरान थे।
हारकर वे सब अन्नो ताई के पास पहुँचे, क्योंकि अन्नो ताई का कहना था कि सब कुछ उन्होंने अपनी आँखों से देखा है। सारे दिन अन्नो ताई के घर सब का आना-जाना लगा रहा और वे सबकी जिज्ञासा अपने ढंग से शान्त करती रही, “अरे भैया, ऊ तो कहो कि हम अपनी आँखिन से देख लीहा, नाही तो भला कौनो को पता लगता। अरे हम तो पहिले ही कहित रहै कि ऊ छोरी के लच्छन ठीक नाही…दैखो पूरा मुहल्ला केर नाक काटि लिहन।”
पण्डित राघोराम पूरे मोहल्ले में फैल रही चर्चा से निरपेक्ष अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहे। जब भी वे बाहर निकलते, मोहल्ले वाले छिप-छिपकर उनकी ओर देखते और कानाफूसी करते। पर वाह रे बेशर्मी, उन्हें रत्ती भर भी परवाह नहीं हुई। अब ऐसे में साफ़ बात कहकर सीधा झगड़ा कौन मोल ले?
इस काण्ड से किसी को लाभ हुआ हो चाहे नहीं, पर राधा देवी को ज़रूर हुआ। कितनी बार राघोराम की घरवाली ने उसकी लड़की की बात को लेकर उसे नीचा दिखाया है, अब वह जमकर बदला लेगी। उसने बात को और बढ़ा-चढ़ाकर फ़ैलाना शुरू कर दिया। उसने किसी तरह यह सुराग भी लगा लिया कि गीता आज पाँच दिनो बाद वापस आ रही है। यह पता लगते ही सब अपने-अपने घरों के दरवाज़े पर खड़े हो गए।
थोड़ी देर बाद एक जीप पण्डित राघोराम के दरवाज़े पर आकर रुकी। उस पर से हँसती हुई गीता उतरी, तो सबके चेहरे लटक गए। जीप में एन.सी.सी की वर्दियाँ पहने लड़कियाँ बैठी थीं, जो चार दिनों का कैम्प लगाने के बाद लौटी थीं। उनकी वर्दी के कारण ही अन्नो ताई ने उन्हें पुलिस समझ लिया था।
जीप धूल उड़ाती चली गई ,तो मोहल्ले वाले अन्नो ताई को कोसते हुए अपने-अपने घरों के दरवाज़े बन्द करने लगे।
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3-पत्थर
वह अपनी धुन में गुनगुनाता पैदल ही चला जा रहा था कि अचानक सड़क के बीचो-बीच पड़े एक बड़े से पत्थर से उसे ठोकर लगी और वह औंधे मुँह गिर पडा। उसके आगे के दो दाँत टूट गए। मुँह से खून निकल पडा। वह कराहता हुआ उठा…मुँह का खून पोंछा फिर बड़बड़ाता हुआ आगे बढ गया, “न जाने किस गधे ने बीच सड़क पर इत्ता बड़ा पत्थर रख दिया…?”
गुस्से में भरा अभी वह दो कदम ही बढ़ा था कि ‘धड़ाम’ की आवाज़ से चौंक पड़ा। पीछे मुड़कर देखा, उसी पत्थर से टकराकर एक साइकिल सवार वहीं औंधे मुँह गिरा पड़ा था। उसने एक लापरवाह सी नज़र साइकिल सवार पर डाली और आगे बढ़ गया।
साइकिल सवार ने चारो ओर देखा फिर अपनी खोपड़ी सहलाते हुए उसे गालियाँ देने लगा, ‘स्साला…हरामज़ादा…ठोकर खाकर गिरा था फिर भी पत्थर हटाते नहीं बना…। दूसरों की तो परवाह ही नहीं…साला…।”
पल भर उसने भी अपने को संयत किया, फिर साइकिल उठाकर आगे बढ़ गया, पर यह क्या…? वह भी कदम-दो-कदम ही गया था कि एक ज़ोरदार धमाके की आवाज़ ने उसके क़दम ठिठका दिए। उसने मुड़कर देखा…ढेर सारी सवारियों से लदा-फदा टैम्पो उस पत्थर से टकरा कर उलट गया था और सवारियाँ उसके नीचे दबकर घायल हो गई थीं। वह उन सबकी सहायता करने को आगे बढ़ा, पर तभी रुक गया। सहायता के लिए पहले ही काफ़ी लोग आ जुटे थे।
टैम्पो मे दबे लोग सहायता के लिए चीख रहे थे; पर वहाँ खड़े अधिकतर लोग दुर्घटना का कारण जानने को अधिक उत्सुक थे। जैसे ही उन्हें कारण का पता चला, वे गुस्से में भर गए, “कैसे-कैसे अहमक लोग हैं इस दुनिया में…अरे, बीच में इतना बड़ा पत्थर रखने की क्या ज़रूरत…? इतना भी नहीं सोचते कि इससे ठोकर लगकर ऐसी कोई भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है…।”
“अरे भाई, अभी थोड़ी देर पहले ही दो लोग ठोकर खाकर गिर चुके हैं, पर उनकी खुदगर्ज़ी तो देखो…चोट खाने के बाद भी किसी ने पत्थर नहीं हटाया…।” भीड़ में से एक आवाज़ उभरी, तो सबको उन दो आदमियों पर बहुत गुस्सा आया।
थोड़ी देर बाद सबने एकजुट होकर किसी तरह टैम्पो को सीधा किया, उसी में घायलों को लादा और सीधे अस्पताल की ओर रवाना कर दिया।
टैम्पो के जाने के बाद भीड़ भी छँट गई। पर वह बड़ा सा पत्थर अब भी वहीं था…।
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4-विचित्र कुर्सी
खुदाई का काम बड़ी तेजी से चल रहा था कि अचानक एक मज़दूर की कुल्हाड़ी किसी ठोस चीज से टकराई तो उसने काम रोक दिया। मिट्टी हटाकर देखा गया तो एक कुर्सी दिखी। ठेकेदार ने कुर्सी बाहर निकालने का आदेश दिया। तुरन्त कुर्सी बाहर निकाली गई। कुर्सी देखते ही सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। वहाँ मौजूद किसी ने भी अपनी ज़िन्दगी में इतनी ऊँची, चमकीली एवं विचित्र- से हत्थे वाली कुर्सी कभी नहीं देखी थी। ऐसी शानदार कुर्सी देखकर ठेकेदार उस पर बैठने का लोभ संवरण नहीं कर पाया और मज़दूरों से उसे साफ़ कराकर शान से उस पर बैठ गया। पर यह क्या? कुर्सी पर बैठते ही ठेकेदार अचानक विचित्र किन्तु लच्छेदार बोली में भाषण देने लगा। उसकी यह हरकत देखकर सबने सोचा कि कहीं वह खुशी के मारे पागल तो नहीं हो गया है। लोगो ने जब उससे नीचे उतरने को कहा, तो बजाय नीचे उतरने के वह और जोर-जोर से भाषण देने लगा। आखिर कई लोगों ने मिल कर उसे जबर्दस्ती कुर्सी से नीचे खींच ही लिया। नीचे उतरते ही ठेकेदार फिर से सामान्य हो गया।
लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब क्या था…सभी उस कुर्सी पर बैठने को उत्सुक हो उठे। एक-एक करके कई लोग बैठे उस कुर्सी पर, पर हैरान करने वाली बात यह थी कि जो भी उस कुर्सी पर बैठता, वही अजीब-अजीब भाषण देने लगता। कुर्सी के कारण खुदाई का सारा काम ठप्प था।
कुर्सी चूँकि खुदाई के कार्य में बाधा डाल रही थी, अतः निर्णय लिया गया कि जितनी जल्दी हो सके, उस कुर्सी का रहस्य खोला जाए, ताकि लोगों की उत्सुकता शान्त हो सके और वे सामान्य होकर फिर से अपना कार्य आरम्भ कर सकें। निर्णय होना था कि तुरन्त ही पन्द्रह आदमियों की एक समिति बनी, जिसने खोज में लाखों रुपये खर्च करने के बाद आखिर उस कुर्सी का रहस्य जान ही लिया। वह कुर्सी एक भूतपूर्व नेता की थी…।
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5- समाजवाद
फिर चुनाव का मौसम आया। नेताओं की गतिविधियों से वातावरण गुंजित हो उठा। कई बार से अपनी जमानत ज़ब्त करवाते आ रहे नेता करोड़ीमल को न जाने क्यों इस बार अपनी जीत की पूरी उम्मीद थी। कई बार चुनाव लड़ने का तजुर्बा भी था उन्हें। पर इस बार उन्होंने जनता को नए सिरे से प्रभावित करने की सोची, सो एक ऐसे क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहाँ गरीबी, साम्प्रदायिक्ता व अराजकता का बोलबाला था। उन्होंने थोड़ी बुद्धि खर्च की, थोड़ी जेब ढीली की और मनपसन्द क्षेत्र का टिकट पा गए। वे अत्यन्त प्रसन्न थे।
चुनाव यज्ञ से कुछ दिन पूर्व वे अपने चुनाव क्षेत्र का दौरा करने गए। नेताजी को स्वयं उनके सगे नहीं पहचान पा रहे थे। वे उस समय एकदम पिछड़े क्षेत्र के ही मानिन्द हो गए थे। किसी का हृदय जीतने के लिए उसमें एकदम घुलमिल जाना जरूरी होता है, यह नेताजी का गुरुमन्त्र था, जो उन्होंने अपनी पराजयों के दौरान सीखा था।
अपने क्षेत्र में पहुँचकर नेताजी ने पहले तो वहाँ की दशा पर आँसू बहाए, रूँधे गले से अभिवादन स्वीकार किया, फिर गला साफ़ कर फुसलाकर लाई गई पिछड़ी जनता को बड़ी आत्मीयता से संबोधित करते हुए बोले, “आप लोगों की ऐसी दशा देखकर एक ओर तो मेरा कलेजा दुःख से फटा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मुझे आप लोगों पर थोड़ा गुस्सा भी है। जानते हैं क्यों…?”
उन्होंने थोड़ी देर सबकी ओर आशा भरी नज़रों से ताका, पर उन्हें काठ की मूर्ति की मानिन्द बैठे देखकर फिर बोलने लगे, “गुस्सा इसलिए; क्योंकि अपने पिछड़ेपन के लिए आप खुद जिम्मेदार हैं। अपनी नासमझी से आपने समाजवाद को अपने से दूर रखा। समाजवाद को आने दीजिए, फिर देखिए यहाँ कैसी खुशहाली छा जाती है। मैं आपका ही भाई हूँ…बेटा हूँ…मुझे वोट दीजिए, फिर देखिए समाजवाद आता है कि नहीं…।”
चमचों को ताली बजाते देख क्षेत्र की जनता भी करतल-ध्वनि करने लगी। नेताजी ने नाक छिनकी, आँसू पोंछे और फिर कार में बैठकर धूल उड़ाते चले गए।
कुछ समय बाद चुनाव हुए। जैसा कि नेताजी को आशा थी, उस क्षेत्र से वे चुनाव जीत गए और उसके बाद इतने व्यस्त हुए कि उस क्षेत्र को ही भूल गए…और शायद अगले पाँच वर्षों तक भूले ही रहते, अगर उस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ने के कारण उन्हें वहाँ का दौरा न करना पड़ता।
नेताजी के स्वागत में उनके चमचों ने वहाँ पहुँचकर जोरदार तैयारियाँ शुरू कर दी। जगह-जगह वंदनवार सजाए गए, सभास्थल पर एक ऊँचा मंच बनाकर उसे सजाया गया और दूसरे शहर के एक बड़े होटल से उनके नाश्ते-खाने का इंतज़ाम किया गया।
नियत दिन-समय पर नेताजी अपने क़ाफिले के साथ आए…फिर भीड़ जुटी। इस भीड़ में वे चेहरे भी थे जिनकी आँखों में नेताजी ने चुनाव पूर्व समाजवाद का पोस्टर चिपकाया तो था, पर उसे उतारना भूल गए थे।
उन आँखों ने सजा पंडाल देखा…नेताजी के लिए नाश्ते-खाने का इंतज़ाम देखा और फिर उस खाने की ओर हसरत भरी आँखों से ताकते, लार टपकाते अपने बच्चों के यह पूछने पर कि कौन आया है, बड़ी समझदारी से कहा, “लगता है, समाजवाद आया है…।”
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6-सोच
स्टेशन छोड़ने के दो मिनट बाद ही तूफान मेल ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ ली थी। सेकेण्ड क्लास यात्रियों से इस तरह खचाखच भरा था कि तिल रखने की भी जगह नहीं बची थी, पर पता नहीं कहाँ से एक दर्जन शोहदे उसमें और घुस आए।
कोई लाल कमीज़ और काली पैण्ट पहने था तो कोई सिर पर रुमाल बाँधे था। सभी के मुँह पान-मसाला चबाने से लाल थे। ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी थी। लोग चुपचाप बैठे थे कि तभी उन्होंने अकारण ही रोब गाँठना शुरू कर दिया, “एई, हट यहाँ से…यहाँ हम बैठेंगे…।”
“चल, नीचे बैठ जा बेटे…ऊपर बादशाहों को लेटने दे…” और भी तरह-तरह के फिकरे…। उनकी रूपरेखा से डरकर कुछ यात्री पहले ही सीट छोड़ चुके थे और जो नही छोड़ पाए थे, उन्हें भी मजबूरी में छोड़ना पड़ा।
सब शोहदे जब आराम से बैठ गए तो लगे आपस में चुहल करने। इसी बीच उनकी निगाह सामने बैठी कमसिन लड़की पर पड़ी तो वे उधर ही लपक लिये और फिर सब एक साथ ही अश्लील हरकतें करने लगे। लड़की डर कर सहायता के लिए चीखने लगी पर डर के मारे कोई भी नहीं बोला।
उस भीड़ में हरिहर बाबू भी थे अपने परिवार के साथ। उनकी दो बेटियाँ…जवान बेटा…पत्नी…। सभी चुपचाप उस लड़की पर होते अन्याय को और उसके बूढ़े बाप को गिड़गिड़ाते देख रहे थे कि तभी हरिहर बाबू का बेटा यह सोचकर उठ खड़ा हुआ कि अगर उस जगह उसके पिता और बहनें होती तो भी क्या वह चुप रहता?
वह उस लड़की के लिए आगे बढ़ता कि तभी हरिहर बाबू ने सख्ती से उसका हाथ पकड़ लिया, “चुपचाप बैठ जाओ…दूसरों के चक्कर में पड़कर अपनी जान खतरे में डालने की कोई जरूरत नहीं…।”
“पर बाबूजी…”
“मैने कहा न…बैठ जाओ…” उनकी आवाज़ और सख्त हो गई, तो बेटा चुपचाप बैठ गया। फिर थोड़ी देर में अगला स्टेशन आने ही वाला था, पर यह क्या…? उस लड़की से जी भर जाने पर उन शोहदों की नज़र हरिहर बाबू की खूबसूरत लड़कियों पर पड़ गई।
थोड़ी देर बाद ट्रेन का वह खचाखच भरा डिब्बा एक खाली कमरे की तरह उनकी बेटियों और जवान बेटे की चीख से गूँज उठा…। एक घायल पक्षी की तरह हरिहर बाबू और उनकी पत्नी सहायता के लिए फड़फड़ा उठे; पर आगे कोई नहीं आया…।
आदमियों से भरे उस डिब्बे के हर आदमी के दिमाग में उस समय हरिहर बाबू की सोच भरी थी।
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7- नींद
आकाश से उतर कर आधी रात ने अभी धरती को छुआ भी नहीं था कि तभी विश्वंभरनाथ बेचैन होकर उठ बैठे। उनके इस तरह अचानक उठने से चारपाई चरमराई तो बगल में लेती सावित्री ने भी करवट बदल ली, “क्या बात है? इस तरह क्यों उठ बैठे? कुछ चाहिए क्या…?”
“नहीं, नींद नहीं आ रही है। बड़ी बेचैनी है। जागने पर दिमाग में तरह-तरह के ख्याल आते हैं। यह बुढ़ापा भी अजीब है, आदमी चैन से जी भी नहीं पाता।”
सावित्री को हँसी आ गई, “बुढ़ापा क्या अभी आया है? आपको याद भी है…इस साल आप अस्सी पार करने वाले हैं और मैं पिचहत्तर।”
“हाँ, याद क्यों नहीं है…” उनकी आवाज़ एकदम से भर्रा गई, “पन्द्रह-बीस साल से इस छोटे से कमरे में कैदी की तरह जी रहा हूँ। न कहीं आना न जाना। अब तो जल्दी कोई मिलने भी नहीं आता।”
हर बार की तरह वे फिर रो देते कि सावित्री ने सम्हाल लिया, “अरे, कौन मिलने आएगा अब…? आपके दोस्त भी तो आप की तरह ही हो गए होंगे न…कुछ मर-खप भी गए होंगे। पैर की इस जानलेवा तकलीफ के कारण आप भी तो अब कहीं जा नहीं सकते। शुक्र मनाइए कि दूसरे कई लोगों के बेटों की तरह हमारे बेटे-बहू ने हमें वृद्धाश्रम नहीं भेज दिया।”
“पर अभी भी तो एक कमरे में ही पड़े हैं न, जैसे किसी कैद में हों।”
भर्राई आवाज़ बाँध तोड़ देती कि सावित्री ने बातों का रुख मोड़ दिया, “अरे आपको याद है, आपके रिटायर होने के तुरंत बाद जब हम लोग गोवा घूमने गए थे तब आप समुद्र तट पर कम कपड़ों में औरतों को अठखेलियाँ करते देख कर कितना बौखलाए थे…?”
सावित्री की बात सुनकर वे हँसने लगे, “अरे हाँ…तुमको तो पता ही है, औरतों की ऐसी निर्लज्जता से मुझे हमेशा गुस्सा आता है।”
बात करते-करते दोनों पति-पत्नी लेट गए तो जेहन में गोवा के साथ-साथ जवानी के दिनों के सपने भी तैर गए… । इन सपनों ने बुढ़ापे को जैसे ही दूर छिटकाया, नींद ने उन्हें दबोच लिया।
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