1-सवारी
सिपाही ने चालक को टैंपू रोकने का संकेत दिया। प्रत्युत्तर में चालक बोला, ‘हवलदार जी, जगह नहीं है, सवारियाँ पूरी हैं।’’
‘‘अबे, तेरी बगल में जो इतनी जगह है, यहाँ क्या अपनी माँ को बिठाएगा? साले के चार डंडे पड़ेंगे तो मिजाज ठीक हो जाएगा।’’ अपने पुलिसिया रोआब में सिपाही ने उसे डपटा।
सहमते चालक ने प्रार्थना–भरे लहजे में कहा, ‘‘हवलदार जी, आप ही लोगों का कहना है कि बगल में सवारी बैठाना कानूनी जुर्म है और अब आप ही…’’
चालक की पीठ पर डंडा जमाते हुए सिपाही दहाड़ा, ‘‘हरामजादे, तुझे मैं सवारी दिखाई देता हूँ?’’
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2-अकाल मत
अपने चुनाव–क्षेत्र में विधायक की जीप कीचड़ में फँस गई तो वे चिल्लाकर बोले, ‘‘यह क्या बात है कि जब भी इस ओर से गुजरता हूँ, मेरी जीप यहाँ फँस जाती है! पाँच वर्ष पूर्व भी इसी कीचड़ में फँसने से मेरे पैर में मोच आ गई थी।’’
अपने उजले–उजले कपड़ों को कीचड़ से बचाते हुए विधायक जी सड़क के किनारे आकर खड़े हो गए और जीप को धक्का लगाने के लिए आसपास के व्यक्तियों को बुलवाया। जीप तत्काल कीचड़ से बाहर निकाल ली गई। विधायक जी ने कहा कि इस बार चुनाव जीतने पर यह सड़क जरूर बनवा दूँगा। तभी पसीने से लथपथ एक अधेड़ व्यक्ति ने तपाक से कह दिया, ‘‘अगली बार आप जीतेंगे, तब न?’’
विधायक के बनावटी चेहरे पर सच्चाई का एक थप्पड़ लगा। वे समझ गए कि फँसी जीप इसलिए निकाली गई है कि जल्दी से जल्दी यहाँ से चले जाएँ।
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3-मुद्दा
एक महाविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के विभागाध्यक्ष अपने चैंबर में बैठे कुछ नेताओं से आम चुनावों के प्रचार–मुद्दों पर विचार–विमर्श कर रहे थे कि एक विद्यार्थी आया और बोला, ‘‘सर, आपका पीरियड है।’’
विभागाध्यक्ष ने विद्यार्थी की बात पर ध्यान दिए बिना ही विचार–विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सरकार द्वारा किए गए कार्यों की कटु आलोचना चुनाव का मुख्य मुद्दा होना चाहिए।’’
विद्यार्थी ने पुन: बीच में टोका,‘‘सर, आपका पीरियड!’’
विभागाध्यक्ष थोड़ी–सी गर्दन घुमाते और खिसियाते हुए फूटे, ‘‘बड़े बेवकूफ हो तुम। अरे, इससे अच्छा राजनीति का पीरियड और क्या होगा, जाओ, तुम लोग भी जाकर सड़क पर राजनीति का कोई प्रायोगिक मुद्दा ढूँढो।’’
विद्यार्थी लौट पड़ा। लौटते हुए उसने देख कि एक मुद्दा तो उसके आगे–आगे ही चल रहा है कि बूढ़े पेड़ केवल नमस्कार के योग्य होते हैं।
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4-लिफ्ट
‘‘स्कूटर रोकिए! मैं जल्दबाजी में सोच भी न सकी कि मुझे आपके साथ नहीं जाना है। आप रोकते हैं कि मैं कूद पड़ूँ?’’
‘‘हाँ…आप तो बड़े चौराहे तक जाने वाली थीं?’’
‘‘आप मानवताविहीन व्यक्ति हैं….किसी भी क्षण धोखा दे सकते हैं।’’
‘‘खबरदार! जो मेरे लिए अपशब्द निकाले। अपने मन की भड़ास अपनी माँ–बहन पर जाकर निकालना।’’
‘‘‘उस बुड्ढ़े का एक्सीडेंट हो गया था, तो उसे अस्पताल तक भी न ले गए, व्यस्तता बताकर इनकार कर दिया और मुझे लिफ्ट दे दी।’’
‘‘सुनिए, यह स्कूटर है…कोई एंबुलेंस तो नहीं, जो मैं मुर्दे ढोता फिरूँ। और आप लोगों के लिए तो….!’’
सामने चौराहे पर लाल बत्ती ी देखकर मजबूरन उसे स्कूटर रोकना पड़ा। और वह फुटपाथ से होकर हाँफती–सी किसी गली की ओर मुड़ गई।
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5-भीतर का सच
झुग्गी-झोपड़ी हटाने हेतु सरकारी आदेश की फाइल मेज पर रखते हुए सचिव ने अनुरोध करते हुएकहा-‘‘सर! झुग्गी- झोपड़ी में रहने वालों को नोटिस भेज दूँ।’’ रामनाथने अप्रत्याशित विजय को खुशी में तेज स्वर में हँसते हुए कहा-‘‘अभी नहीं….कुछ समय गुजर जाने दो।’’अचानक गम्भीर होते हुए पुनः कहना शुरू किया, ‘मेरे विरोधियों के मुँह में कालिख लग गई होगी, वहाँ पर एक आलीशान होटल, स्वीमिंग टैंक, पार्क बनवाऊँगा….।’’ अब उसके ओठों पर कुटिल मुस्कान तैर रही थी। उसे लगा कि उसका दिल बैठता जा रहा है और साँस फूलती जा रही है, वह तुरन्त एक गिलास पानी एक ही साँस में सुड़क गया; लेकिन उसके ओंठ सूखते जा रहे थे। उसने घबराहट में अपने आपसे कहा,‘मुझे क्या होता जा रहा है?’ वह सोफे पर बैठ गया, उसकी नजर आदमकद शीशे पर पड़ी, जिसमें उसकी ही आकृति उसे घृणित दृष्टि से देख रही थी, वह नफरत भरे स्वर में बोली -‘‘तू अहंकार का शिकार हो गया है। इन्हीं झोपड़ियों में तेरा अतीत छुपा है, इन गरीबों की आह से तेरा अस्तित्व नष्ट हो जाएगा….।’’‘मैं क्या करूँ….मैं…..क्या करूँ?’ उसने अपने आपसे कहा। कुछ ही क्षणों में पुनः आवाज उसके अन्तर्मन में उभरी, रामनाथ!तू इन गरीबों की आह मत ले….इनको उजाड़ने से पूर्व इनके रहने की कहीं व्यवस्था कर दे,तभी तेरा कल्याण सम्भव है।’ वह बेचैनी से आकृति की ओर मुखातिब हुआ,‘ ‘मैंने गरीबों के साथ कोई अत्याचार नहीं किया, अपनी ही जमीन उनसे खाली कराना कोई जुर्म है। ‘नहीं…..। तुमने हेरा फेरी करके इसे सस्ते दामों पर सरकार से खरीद लिया है, जब कि तुम्हें मालूम था कि वहाँ गरीब लोग काफी समय से रहते हैं। अचानक चारों तरफ एक शोर उभरने लगा- तुम खूनी हो…..खूनी हो…..। उसने दोनों हाथों से अपने कान बन्द कर लिये।घबराकर वह सोफे पर लेट गया……..मुझे क्या होता जा रहा है? उसे लगा कोई कह रहा है-‘रामनाथ……तुम चैन से नहीं रह सकोगे…….इन गरीबों की आहों से तुम्हारा परिवार फलीभूत नहीं होगा। इसलिए झोपड़ी में रहने वाले गरीबों को कहीं अन्यत्र व्यवस्था कर दो।’’
‘‘ठीक है……ठीक है….शहर के बाहर कहीं व्यवस्था अवश्य कर दूँगा।’’ धीरे-धीरे उसे अनुभव होने लगा कि उसके सीने पर रखा पहाड़ हट गया हो…….उसने राहत की साँस ली…….।
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