जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: April 1, 2023

1-नियति

विमला को गाँव वाले मास्टरनी कह कर बुलाते थे; क्योंकि उसके पति गाँव के सरकारी स्कूल में मास्टर जो थे। गाँव में मास्टरनी को भी मास्टर जी की तरह ही सम्मान प्राप्त था। विगत दो वर्ष पहले गाँव के स्कूल में वार्षिकोत्सव मनाया गया तो कई गणमान्य लोगों के साथ – साथ मास्टरनी भी उस समारोह में मास्टर जी के साथ मुख्यतिथि के साथ बैठी थी। मास्टरजी के साथ उसे भी अन्य लोग बराबर सम्मान देते थे। ये सब उसे भी अच्छा लगता था। वक्त ने करवट बदली,  मास्टरजी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। दुखों के पहाड़ के नीचे मास्टरनी दब गई। तीन बच्चों का बोझ और खुद ,चार जनों को उठाने में उसकी पीठ लड़खड़ाने लगी। बड़ी जद्दोजहद के बाद उसे दैनिक भत्ते पर उसी स्कूल में चपरासी की नौकरी मिल गई। चूँकि वह आठवीं तक ही पढ़ी थी। कल की मास्टरनी अब चपरासिन बन स्कूल जाने लगी। कल तक जो लोग उसे दुआ-सलाम करते थे आज  उससे मांगने लगे। उसे अन्दर ही अन्दर ये सब अच्छा न लगता मगर मरता क्या न करता ? बेबसी – लाचारी उसकी नियति थी। बच्चों व खुद का बोझ ढोने के लिए नौकरी जरूरी थी। तीन बरस नौकरी बीत गई। आज फिर स्कूल में वार्षिकोत्सव था। मुख्याध्यापक ने उसे सुबह जल्दी बुलाया था। इसलिए वह निर्धारित समय से पहले स्कूल में पहुँच गई। अभी तक कोई भी स्कूल में नहीं पहुँचा था। ऑफिस व कमरों की सफाई करके वह स्टाफ रूम में रखी कुर्सी पर आराम के लिए अभी बैठी ही थी तभी स्कूल के तीन चार अध्यापक आ गये। वह कुर्सी से उठने ही वाली थी कि एक ने उसे देख लिया उसे देखते ही वह उसे झिड़कते हुए बोला, विमला बड़ी बाबू बन कर कुर्सी पर आराम फरमा रही हो, अपने स्टूल पर बैठा करो। विमला कुर्सी से तो उठ गई थी परन्तु उसे अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती हुई लग रही थी। वह बुझे–बुझे कदमों से सबके लिए पानी ले आई थी। तीन बरस पहले के वार्षिकोत्सव और इस वार्षिक उत्सव का फर्क उसके मानसपटल से गुजर रहा था। तीन बरस में ही मास्टरनी चपरासिन हो गई थी। नियति को स्वीकार कर अब वह खिसकती जमीन पर बुझे कदम लिए सभी आगंतुकों को पानी पिला रही थी, कुर्सियाँ दे रही थी। ये सब समय का फेर था…..।

2- गणित

विधायक के मंत्री बनते ही प्रधान रौणकी राम ने पत्नी से सलाह की कि क्यों न मंत्री महोदय को घर में बुलाया जाए और नुवाले [शिव पूजन]  का आयोजन उनके हाथों संपन्न करवाया जाए। ‘परन्तु इससे हमें क्या मिलेगा?’ पत्नी ने चेताया। रौणकी राम बोले- तू भी बड़ी भोली है। तुझे राजनीति का गणित नहीं आता। हम भी बिना लाभ के कोई काम नहीं  करते। रौणकी राम ने शेखी बघारी। पत्नी चुप हो गयी। प्रधान ने निर्धारित तिथि पर मंत्री जी को नुआले में पधारने के लिए निमन्त्रण दे दिया और साथ में यह भी बता दिया कि मैंने आपके मंत्री बनने के लिए भगवान शिव से मन्नत की थी कि आप जीतकर मंत्री बन गए, तो मैं अपने घर में नुआला [शिव पूजन] करवाऊँगा। इसलिए नुआले की सारी रस्म-पूजा आप ही के कर कमलों से सम्पन्न होगी। मंत्री महोदय ने ख़ुशी- ख़ुशी निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और निर्धारित तिथि को अपने लाव- लश्कर के साथ प्रधान के घर पहुँच भी गये। कई विभागों के अधिकारी भी मंत्री जी के साथ थे। उत्सव सम्पन्न हुआ। प्रधान की पहुँच की चर्चा दफ्तर- दफ्तर पहुँच गई। अब उसके सारे काम बिना रुकावट के होने लगे। उसकी रुकी हुई ठेकेदारी चल निकली। घर का कायाकल्प देख अब पत्नी को भी राजनीति का गणित समझ आ गया था।

3-युग-विडम्बना

सावित्री की बेटी पारो के ससुराल से फोन आया , पारो के लड़का हुआ है बूढ़ी विधवा माँ बहुत खुश हुई।  नानी बनने पर उसे पूरे मोहल्ले के परिचितों से खूब बधाइयाँ मिलीं। फिर कुछ समय बाद पारो का फोन आया , मम्मी मेरे यहाँ आना तो जरा नाक से आना। पहली बार पारो की शादी के समय डिमांड उसके ससुराल वालों की थी।  तब उसने अपने गहने व जमा पूँजी निकल कर पारो की शादी खूब धूमधाम से कर दी थी।  अब की बार डिमांड उसकी अपनी बेटी पारो की थी। यद्यपि पारो माँ की परिस्थितियों से अच्छी तरह परिचित थी।  माँ ने दोनों बेटों से पारो के फोन की बात कही ,परन्तु दोनों ने अपनी – अपनी तंगी का रोना रोकर हाथ खड़े कर दिए। तब सावित्री ने अपनी बची दो सोने की चूड़ियाँ बेचकर दोहते के लिए चेन बनवाई और पूरे परिवार के लिए कपड़े खरीदे।  फल और मिठाइयाँ टोकरे में बांध पारो के यहाँ हो आई। पारो के ससुराल में उसके मायके की  नाक तो बच गई परन्तु बूढ़ी माँ जब वापिस घर आई तो उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।  चिड़ियाँ बेचने की बात सुनकर बेटे – बहुएँ उससे इस कदर खीझ गये कि कलह क्लेश के बाद उसे दो रोटियाँ  भी देना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा। अब सावित्री मंदिर में सेवा करके अपनी दो रोटियाँ व बुढ़ापे कि दवाइयों का खर्च चलती है और वहीं मंदिर की  धर्मशाला के एक टूटे –फूटे कमरे में घुट –घुटकर अपना बुढ़ापा ढो रही है।  उधर बेटों –बहुओं का कहना है कि माँ जी का रुझान भगवान की ओर हो  गया है। वह अब घर के बंधन में बंधकर नहीं रहना चाहती,  इसलिए वह संन्यस्त हो गई हैं और अब घर नहीं आतीं। ।  

4-गंध

मेरे घर के पास ही अपने पिल्लों के साथ एक कुतिया नाली के बगल में पड़े कूड़े के ढेर पर अपने तथा पिल्लों के लिए रोटी तलाश लेती थी। आज रात भारी बर्फवारी हुई। कूड़े का ढेर बर्फ में दब गया था। कुतिया अपने पिल्लों को लेकर मेरे कमरे के सामने बन रहे नये मकान में आ गई। मकान के एक कमरे में सीमेंट की खाली बोरियाँ पड़ी थीं। उसने वहीं अपना डेरा जमा लिया था। दिन जैसे – जैसे चढ़ने लगा भूखी कुतिया के स्तनों को भूखे पिल्ले चूस –चूसकर बुरा हाल करने लगे। शायद स्तनों से निकलता दूध उनके लिए पर्याप्त नहीं था। भूखे पिल्लों की  चूँ – चूँ  की आवाजें हमारे कमरे तक आ रही थीं। मेरी पत्नी ने जब यह दृश्य देखा तो रात की बची रोटियाँ लेकर उस कमरे की ओर चल दी। मैं खिड़की से ये सब देखे जा रहा था। जैसे ही वह वहाँ पहुंची कुतिया उसे देखकर जोर जोर से भौंकने लगी। ऐसे लगा मानो वह मेरी पत्नी पर टूट पड़ेगी। तभी मेरी पत्नी ने उसे प्यार से पुचकारा और रोटियाँ तोड़कर उसके मुंह के आगे डाल दीं। अब कुतिया आश्वस्त हो गई थी कि उसके बच्चों को कोई खतरा नहीं है। कुतिया ने रोटी सूंघी और एक तरफ खड़ी हो गई। भूखे पिल्ले रोटी पर टूट पड़े। कुतिया पास खड़ी अपने पिल्लों को रोटी खाते देखे जा रही थी। सारी रोटी पिल्ले चट कर गए। भूखी कुतिया ने एक भी टुकड़ा नहीं उठाया। मातृत्व के इस दृश्य को देख कर मेरा हृदय द्रवित हो उठा और इस मातृधर्म के आगे मेरा मस्तक स्वतः नत हो गया। मेरा मन भीतर ही भीतर मानो सुगंध से महक उठा।

तभी मैंने दरवाजे पर पड़ा अखबार उठाया और देखा , यह खबर हमारे शहर की ही थी। कोई महिला  अपनी  डेढ़ साल की बच्ची को जंगल में छोड़कर  अपने प्रेमी संग फरार हो गई थी इस उद्देश्य से कि शायद कोई हिंसक जानवर इसे खा जाएगा। आर्मी एरिया होने के कारण पैट्रोलिंग करते जवानों ने जंगल से बच्ची के रोने की आवाजें सुनी तो उसे उठा लाए और पुलिस के हवाले कर दिया। फोटो में एक महिला पुलिस कर्मी की गोद में डेढ़ साल की बच्ची चिपकी थी। पिता को बच्ची कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के उपरांत ही सौंपी जानी थी। खबर को पढ़ने के उपरांत दोनों दृश्य मेरे मानस पटल पर रील की  भांति आ जा रहे थे। अब इस खबर की दुर्गंध से मेरा मन कसैला हो गया था।

5-औजार

सोहन का तबादला दूर गांव के हाई स्कूल में हो गया।  शहर की आबो –हवा छूटने लगी।  पत्नी ने सुझाव दिया, कल हमारे मोहल्ले में नए बने शिक्षा मंत्री प्रधान जी के यहाँ आ रहे हैं।  क्यों न माताजी को उनके सामने ला उनसे , मंत्री जी से तबादला रोकने की प्रार्थना करवाई जाये।   शायद बूढ़ी माँ को देख मंत्री जी पिघल जाएँ और तबादला रद्द करवा दें।   सोहन को सुझाव अच्छा लगा।  वह शाम को ही गाँव रवाना हो गया और बूढ़ी माँ को गाड़ी में बैठा सुबह मंत्री जी के पहुंचने से पहले ही प्रधान जी के घर पहुँच गया।  ठीक समय पर अपने लाव –लश्कर के साथ मंत्री जी पहुँच गये।   लोगों ने अपनी –अपनी समस्याओं को लेकर कई प्रार्थना –पत्र मंत्री महोदय को दिए।  इसी बीच समय पाकर सोहन ने भी अपनी बूढ़ी माँ प्रार्थना –पत्र लेकर मंत्री जी के सम्मुख खड़ी कर दी। कँपती-कँपाती बूढ़ी माँ के हाथ के प्रार्थना –पत्र को मंत्री जी ने स्वयं लेते हुए कहा –बोलो माई क्या सेवा कर सकता हूँ।  तब बूढ़ी माँ बोली –साहब मेरे बेटे की मेरे खातिर बदली मत करो, इसके चले जाने से इस बूढ़ी की देखभाल कौन करेगा।  शब्द इतने कातर थे कि मंत्री जी अंदर तक पिघल गये।  बोले –ठीक है माई ,आपके लिए आपके बेटे की बदली रद्द कर दी गई। उन्होंने साथ आये उपनिदेशक महोदय को कैम्प आर्डर बनाने को कहा।  कुछ ही देर में तबादला रद्द होने के आर्डर सोहन के हाथ में थे।  सोहन और बूढ़ी माँ मंत्री जी का धन्यवाद करते हुए घर आ गये।  शाम की गाड़ी में सोहन ने बूढ़ी माँ गांव भेज दी। अब पत्नी भी खुश थी और सोहन भी, उनका आजमाया औजार चल गया था ….।

6-समय के पदचिह्न

अनुभव ने लाला मदन लाल को कहा-” मुझे बढ़िया से जूते दिखाओ”। लाला का नौकर उसे जूते दिखाता गया और वह रेंज बढ़ाता गया। कस्बे की इस दुकान पर सबसे महंगे जूते दस हजार तक के ही थे। उसने कहा –“इससे महंगे और भी है जूते?” लाला ने इंकार कर दिया। अनुभव ने वे जूते खरीद लिए। पैसे देने के लिए जैसे ही अनुभव लाला मदनलाल के काउंटर पर खड़ा हुआ , लाला मदन लाल ने बिल काटते हुए कहा बेटा आप कहां से हो ?  मैंने आपको पहचाना नहीं  ? अनुभव बोला – लालाजी मैं धर्मनगर से महू का बेटा हूँ। फिर लाला ने पूछा क्या करते हो ? तो वह बोला – मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में साइंटिस्ट हूँ। तब लाला बोला -अच्छा तो आप महू के बेटे हो; महू तो हमारा ही ग्राहक था। अनुभव बोला जी पिताजी आपके ही ग्राहक थे। फिर वह आगे बोला- “शायद आपको याद हो न हो लेकिन मुझे तो आज भी बीस बरस पहले की वह सारी घटना याद है। मैं बीमार था मेरे पिताजी मुझे दवाई लेने बाजार आए थे।  उनके जूते फटे हुए थे। बारिश लगी थी। बारिश का सारा पानी जूतों में जा रहा था। मैं उस समय दस वर्ष का था। वह आपकी दुकान पर आए और आपसे उधार में जूते मांगे। उन जूतों का मूल्य उस समय दस रुपये था। परंतु आपने उधार में जूते देने से यह कहकर इंकार कर दिया कि यह बहुत महँगे जूते हैं आपकी हैसियत से बाहर हैं। इतने महंगे जूते मैं आपको उधार नहीं दे सकता। आपने दूसरी तरफ रखे हुए जूते दिखाते हुए कहा था कि “आपने लेने ही हैं तो ये दो रुपए वाले ले लो उधार में।” पिताजी को यह बात चुभ गई। वे उन्हीं फटे जूतों में वापिस घर आ गए। जबकि पिताजी आपके पास ही पूरे परिवार के लिए जूते खरीदा करते थे। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा था। फिर वह आगे बोला – ये जूते मैं अपने पापा के लिए ही ले रहा हूँ। लालाजी वक्त बदलता रहता है। यह कहकर वह दुकान से बाहर आ गया। अब समय के पदचिह्न लाला के मानस पटल पर उभर आए थे।

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