1-चिंता
क्या करें, क्या न करें की उधेड़बुन में उलझा हुआ वह लड़का आखिरकार दुकान तक पहुँच ही गया और साहूकार के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। साहूकार इस वक्त भी ग्राहकों को जल्दी-जल्दी सामान देने और पैसे वसूलने में मशगूल था। लड़के के मन में उधेड़बुन के साथ-साथ इस बात की भी तसल्ली थी कि साहूकार चाहे जितना भी तंगदिल क्यों न हो, पूरी बात जानने के बाद उसकी प्रशंसा में जरा भी कोताही नहीं बरतेगा। तभी लड़के को रू-ब-रू खड़ा देख साहूकार झुँझलाया। बोला- ‘ऐ लड़के, तुझे सामान और बाकी के पैसे मिल गए न फिर यहाँ क्यों खड़ा है, चल हट यहाँ से।’
साहूकार की बेरुखी लड़के के कलेजे में काँटे की तरह चुभी, लेकिन पूरी बात जानने के बाद साहूकार के खुश होने की उम्मीद उसे अब भी थी, इसलिए कुछ किनारे हटकर वह फिर भी खड़ा रहा, ताकि वह दुकान में दोबारा लौटकर आने की वजह से साहूकार को अवगत करा सके। दो-तीन ग्राहकों से निबटकर साहूकार ने एक बार फिर से अपनी तीखी निगाहों से उसकी तरफ देखा और पूछा- ‘ऐ लड़के तुझे कोई और चीज चाहिए क्या?’
‘नहीं।’
‘तो फिर वापस दुकान में क्यों आया?’ चल निकल बाहर। एक बारगी उसे लगा कि वह दुकान से बाहर निकलकर बीस रुपये बचा ले, लेकिन शाबाशी की उम्मीदने उसे रोके रखा। इस बार साहूकार ने उसकी नीयत पर शक करते हुए पूछा- ‘अबे तू अभी तक खड़ा है… कुछ कहना है क्या?’
‘जी…जी’ लड़का बोला- ‘दरअसल पैसे लौटाते समय भूल से आपने बीस रुपये ज्यादा लौटा दिए थे।’ इतना बोलकर उसने साहूकार की आँखों में झाँका और उसकी तरफ बीस का नोट बढ़ाते हुए बोला- ‘लीजिए ये रहे आपके रुपये।’
साहूकार के चेहरे पर कोई नया रंग नहीं उभरा। उसने निर्लिप्त भाव से रुपये लेकर बक्से में डाल लिये, जिसमें पहले से भी बेशुमार रुपये पड़े थे। फिर अपने काम में लगगया। लड़का ठगा-सा दुकान से बाहर आ गया। अब उसे नाहक ही बीस रुपये गँवाने की चिंता सताने लगी थी।
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2-चोरी
वे दो भाई थे। उनके बीच मकान,खेत और पुश्तैनी जायदाद से जुड़ी लगभग हर चीज का बँटवारा हो चुका था। यहाँ तक कि दौलत के बँटवारे के दरम्यान दोनों के दिलों में भी दरारें पड़ गई थीं। दरारें इतनी लंबी-चौड़ी थी कि उन्हें पाटना मुश्किल था। पंचायत की देख-रेख में आँगन में उठने वाली दीवार के साथ-साथ उनके दिलों में भी दीवारों उठ गई थीं। दिल की दीवारें इतनी ऊँची थीं कि उनके आर-पार लाँघना कठिन था। गाली-गलौज और सिर फुटौवल भी उनके बीच हुआ था। यही कारण था कि दोनों एक-दूसरेको हमेशा नफरत की निगाहों से ही देखते। दोनों एक-दूसरे के दुःख में सुखी और सुख में दुःखी होते। अगर बड़े भाई पर कोई विपत्ति आ पड़ती तो छोटा खुश होता और छोटा किसी आफत में फंस जाता तो बड़े को खुशी होती।
तमाम तरह की चीजों के बँटवारे के बावजूद घर के आगे का दालान अभी किन्हीं कारणों से नहीं बँटा था।दालान का उपयोग अभी साझे में ही था।साझे के दालान में अभी दीवार नहीं उठी थी, इसलिए उसका उपयोग दोनों भाई अपनी-अपनी सुविधा से करते थे। एक भाई उस दालान के एक कोने में अपनी भैंस बाँधता तो दूसरा दूसरे कोने में पुआल का बंडल रखता। उसी दालान के एक कोने में बिछी चौकी पर एक दिन खूब सवेरे छोटे भाई का नन्हा-सा बच्चा, जिसकी उम्र नौ-दस माह से ज्यादा न थी, मुँह से कुछ-कुछ अस्फुट स्वर निकालता हुआ खेल रहा था। कभी-कभी जोर से किलकारी भी मारता। उसकी किलकारियों में मानो मिसरी घुली थी। उसकी निष्कलुष और निर्दोष किलकारियों से कोई भी रससिक्त हो सकता था, लेकिन उस समय वहीं पर मुँह धो रहे ‘बड़े भाई’ पर इसका कोई असर न हुआ। उल्टे उसका मन नफरत से भर गया। उसने दाँतों पर दातुन की रगड़ को कुछ तेज करते हुए तीखी निगाहों से बच्चे की तरफ देखा और बुदबुदाया- ‘साला साँप का बच्चा…।’
फिर उसने बच्चे की तरफ से अपना मुँह फेर लिया।बच्चे की मोहक किलकारी दालान में एक सिरे से दूसरे सिरे तक गूँजती रही। मगर इस किलकारी के प्रभाव से वह अपने को सायास बचाता रहा और हाथ-मुँह धोने का उपक्रम करता रहा। हाथ-मुँह धोकर जैसे ही वह चौकी के निकट खड़ा हुआ, तो न चाहते हुए भी बच्चे की तरफ उसका ध्यान चला ही गया। ऑंखें चार होते ही बच्चा एक बार फिर जोर से खिलखिलाया। तब उसके हाथ अनायास ही बच्चे की तरफ बढ़ गए। लेकिन तत्क्षण ही मन के किसी कोने में सिमटा यह भाव उसके दिमाग में उतर आया कि यह तो दुश्मन का बच्चा है। दिमाग में यह बात उतरते ही उसके हाथ रुक गये। फिर वह एक झटके से घर के अंदर जाने के बजाय वहीं खड़े होकर चारों तरफ देखनेलगा। उस वक्त वहां कोई न था, सिवा उस बच्चे के।जब उसे पूरी तरह से इत्मीनान हो गया कि बच्चे और उसके सिवा वहाँ और कोई नहीं है, तब उसने आव देखा न ताव, एक झटके से बच्चे को उठाया और… और सीने से लगाकर बेतहाशा उसके गालों को चूमने-दुलारने लगा।
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3-जिन्दगी के लिए मौत
डमरू बजाकर संतों ने मुहल्ले के लोगों को अपनी उपस्थिति से अवगत कराया। धीरे -धीरे बूढ़े-जवान, स्त्री -पुरुष और बच्चे-बच्चियों की भीड़ संतों के चारों तरफ वृत्ताकार घेरे में खड़ी हो गई। भीड़ इकट्ठी होने पर उसने अपने झोले के अंदर से एक बड़ी और एक छोटी चादर निकाली। छोटी चादर को उसने जमीन पर फैला दिया और उसके ऊपर अपने बेटे बंतो को चित लिटाकर बड़ी चादर से ढक दिया और पुनः जोर-जोर से डमरू बजाने लगा। डमरू बजाते हुए वह तमाशाइयों की तरफ मुखातिब हुआ- ‘हुजूर…माई-बाप आपने बहुत सारे मदारियों का खेल देखा होगा लेकिन अब मैं जो दिखाऊंगा … वो जिन्दगी और मौत का खेल होगा…’
इतना कहकर वह एक बड़े से झोले में हाथ डालकर कुछ टटोलने लगा। फिर अधमुंदी आँखों से आसमान की तरफ देखते हुए कुछ बुदबुदाया और उस बदरंग झोले के भीतर से एक लंबे फल का छुरा निकालकर तमाशाइयों को दिखाते हुए बोला- ‘यह छुरा मैं अपने बच्चे के पेट में घुसेड़ दूँगा और दो मिनट के अंदर ही इसकी आँत निकालकर दिखाऊँगा।
उसने एक बार फिर जोर-जोर से डमरू बजाकर तमाम तमाशाइयों का ध्यान अपनी तरपफ खींचा। इशारा पाकर बच्चों ने भी तालियाँ बजाईं।फिर एक झटके से उसने चादर के नीचे हाथ डाला और बंतों के पेट को खरबूजे की तरह चीर डाला। बंतो चादर के नीचे दर्दनाक रूप से चीखा। खून से लथपथ आँत को देखकर तमाशाइयों के रोंगटे खड़े हो गये। पलभर को वातावरण में आश्चर्यजनक सन्नाटा छा गया। संतों की इस सफलता पर बच्चे-बच्चियों ने तालियाँ बजाईं और जवान स्त्री -पुरुषों, बड़े-बूढ़ों ने उसकी मैली-कुचैली चादर पर अठन्नी-चवन्नी डालकर अपनी हमदर्दी का इजहार किया। तमाशा खत्म होते ही लोगों की भीड़ तितर-बितर हो गई। तब संतो इत्मीनान से चादर पर बिखरे सिक्के उठाकर गिनने लगा, ‘एक…दो…पाँच …तीस…पचास।’ वह बेहद खुश हुआ और इस खुशी में बंतो को भी शरीक करने के ख्याल से उत्साहित स्वर में बोला- ‘बंतो देखे… बेटा आज तो पूरे पचास रुपये हुए।’लेकिन बंतो पर इस बात का कोई प्रभाव नहीं दिखा। वह निस्पंद और निस्पृह भाव से बाप की तरपफ देखते हुए बोला- ‘बा-. बाबू अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा …।’
‘क्यों नहीं रहेगा मेरे साथ… तू तो मेरा बेटा है।’
‘फिर भी मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा … और रहूँगा भी तो कल से मरूँगा नहीं… मुझे रोज-रोज मरना अच्छा नहीं लगता…।’
‘अबे’, संतो ने कहा, ‘पागल हो गया है क्या, मरेगा नहीं तो जिंदा कैसे रहेगा?’
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4-कुत्ता
तिपाई पर उकडू बैठा विदेशी नस्ल का कुत्ता अपनी लंबी जीभ को लपलपाता हुआ कूलर की ठंडी हवा का मजा ले रहा था। और वहीं तिपाई के पास ही सोफे पर अधलेटे मंत्री के इर्द-गिर्द बैठे लोग कुत्ते के हाव-भाव और संस्कार की चर्चा में अपना कीमती मंतव्य जाहिर करने में लगे थे। तात्पर्य यह कि लोग कुत्ते की प्रशंसा के फूल उगा रहे थे और मंत्री खुशी से फूले नहीं समा रहा था।उसी समय कमरे में एक और आदमी आया और अभिवादन की मुद्रा मे अधलेटे अधेड़ मंत्री के बिल्कुल करीब खड़ा हो गया।
मंत्री ने गर्व से अपनी मूँछ की ऐंठन को दुरुस्त किया और करीब खड़े अपने खास आदमी पर रोब जमाने के लहजे में कहा- ‘रामदीन देखो, इस बार अमेरिका से यही कुत्ता लाया हूँ।’
वह कुछ नहीं बोला। बोलने का काम आँखों से लेने के अंदाज में उसने पहले कुत्ते को और तब मंत्री को देखा।
‘जानते हो रामदीन…’ मंत्री ने कहा- ‘यह दुर्लभ नस्ल का कुत्ता पूरे दस हजार डॉलर का है…’
वह इस बार भी चुप रहा। कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जबान तक आए अल्फाज को काबू में रखते हुए एक बार फिर उसने कुत्ते को देखा। कुत्ते को देखकर वह मुस्कुराया लेकिन आँखों में निराशा की हल्की धुंध उतर आई।
‘क्यों रामदीन’, उसकी आँखों में छाई उदासी को देखकर मंत्री ने पूछा- ‘तुम्हें कुत्ता पसंद नहीं आया?’
मंत्री की बात सुनकर उदासी की धुंध उसके पूरे चेहरे पर फैल गई, जो अब तक आँखों में सिमटी थी। उसने धीरे से हलक में अटके अल्फाज को बाहर की तरफ खिसकाया, ‘सर वो…वो बात नहीं… कुत्ता पसंद आया… मगर…’
‘मगर क्या…? मंत्री चौंका।
‘मगर मैं यह सोच रहा था कि मेरे रहते आपको कुत्ता पालने की जरूरत क्यों पड़ गयी?’
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5-डर
उनकी दृष्टि अखबार की सुर्खियों पर थी कि तभी टेलीफोन की घंटी घनघना उठी। उनके लड़के ने टेलीफोन रिसीव किया।उन्होंने अखबार से अपनी निगाह हटाते हुए धीमी किन्तु उत्सुक आवाज में पूछा-‘किसका फोन है बेटा?’
‘आपके दोस्त माधव अंकल के लड़के का फोन है,टेलीफोन के मुँह को हथेली से दबाकर वह आहिस्ता से बोला- ‘माधव अंकल मरणासन्न स्थिति में हैं, वो आपसे किसी खास काम से मिलना चाहते हैं।’उन्होंने किंचित् नफरत से टेलीफोन सेट की तरफ देखा।
‘…किस खास काम से मिलना चाहता है…? जरूर ही वह फिर मदद के नाम पर चार-पाँच हजार रुपयों की माँग करेगा…।’ बुदबुदाते हुए उन्होंने शंका जाहिर की और पुनःअखबार में नजर गड़ाते हुए धीरे से कहा- ‘बेटा, कह दो पिता जी घर पर नहीं हैं… दस दिनों के लिए बाहर…’
कुछ ही दिनों के पश्चात् एक दिन अचानक उनके दोस्त माधव का बेटा उनके आवास पर आया तो वे सिटपिटा गए, किन्तु स्वयं को संयमित करते हुए बोले,‘बहुत दुख की बात है बेटा कि ऐन वक्त पर एक जरूरी काम से बाहर चले जाने की वजह से मैं अपने दोस्त से आखिरी वक्त में मिल नहीं पाया। उनके श्राद्ध -कर्म में भी अनुपस्थित रहा…।’
वे अभी अपनी बात कह ही रहे थे कि वह पाँच हजार रुपयों की गड्डी उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा- ‘चाचाजी,आप इसे रख लें…’ फिर कुछ पल की खामोशी के बाद एक गहरी उदासी के साथ उसने कहा- ‘पिताजी की बड़ी इच्छा थी कि वे मरने से पहले अपने हाथों से आपका कर्ज चुका दें। इसलिए मैंने आपको फोन किया था, लेकिन आप यहाँ थे नहीं।’
‘तु…तुम ठीक कहते हो बेटा मैं यहाँ नहीं था…’ आगे के शब्द उनके हलक में ही कहीं अटक कर रह गए और धमनियों में बहता रक्त जम-सा गया। उन्हें शिद्दत्त से महसूस हुआ कि उनके भीतर का डर कितना नपुंसक था।
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6.पानी का खेल
एक बड़े नगर का भीड़-भाड़वाला स्टेशन।
एक बन्द लिफाफा स्टेशन अधीक्षक की तरफ बढ़ाते हुए धीमी आवाज में कहा, ‘‘अग्रिम है साहब, पूरे पाँच हजार, बाकी बाद में पहुँचा दूँगा….।’’
‘‘ठीक है, अब आप जाइए, आपका काम हो जाएगा।’’ लिफाफा जेब के हवाले करते हुए स्टेशन अधीक्षक ने कहा।
वह स्टेशन अधीक्षक के कक्ष से बाहर निकलने हेतु मुड़ा ; लेकिन पलभर को रुककर उसने कुछ याद दिलाने के लहजे में फिर कहा, ‘‘साहब, टाइम याद है न, ठीक बारह से तीन के बीच, क्योंकि इसी समय पाँच
-छह एक्सप्रेस गाड़ियाँ एक साथ ठहरती है।’’
‘‘मैंने कहा न कि आप इत्मीनान रखें….’’
‘‘थैंक यू सर! आपने तो पहले भी मदद की है।’’
दो घण्टे बाद एक साथ कई एक्सप्रेस गाडियाँ आकर निर्धारित प्लेटफार्मों पर खड़ी हो गईं। भीषण गर्मी से प्यास के मारे व्याकुल हो रहे यात्री खाली डिब्बा, गिलास और बोतल लिये अफरातफरी में एक नल से दूसरे नल तक दौड़ते रहे मगर कहीं भी एक बूँद पानी न मिला।
तब देखते-ही-देखते यात्रियों की भीड़ प्लेटफार्मो पर अवस्थित चाय-पान की दुकानों पर उमड़ पड़ी ,जहाँ बिक्री के लिए ‘मिनरल वाटर’ की हजारों बोतलेें पड़ी थीं। देखते-ही-देखते हजारों बोतल पानी मुँहमाँगी कीमत पर बिक गया। कुछ देर बाद कोई युवती एनाउंस कर रही थी कि, ‘विद्युत आपूर्ति में व्यवधान पैदा हो जाने के कारण नलों में पानी सप्लाई नहीं हो सका…इससे यात्रियों को जो असुविधा हुई उसके हमें खेद है।’
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7.फिसलन
अपनी खिचड़ी मूँछों में ऐंठन देकर वह मुस्कराया। फिर रोबदार आवाज में पूछा,‘‘हाँ तो बताओ, रात में तुम्हारे यहाँ से कौन-कौन चीजें चोरी गई…।’’
इतना कहकर उसने एक रहजस्टर निकाला और टेबुल पर फैलाकर रपट लिखवाने हेतु आए हुए व्यक्ति को गहरी दृष्टि से देखा। रपट लिखने हेतु आए व्यक्ति के चेहरे पर उदासी की स्याही पुती थी। वह उदास
स्वर में बोला, ‘‘क्या-क्या बताऊँ साहिब! मेरी तो जन्मभर की कमाई लुट गई….।’’
‘‘फिर भी तुम चोरी गई चीजों के नाम नहीं बताओगे ,तो मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकूँगा…।’’
दारोगाजी ने पुनः उसकी आँखों में झाँका, जहाँ से आँसू की कुछ बूँदें टपकने को बेताब हो रही थीं।
तब उसकी मायूसी पर दयाभाव को लेप चढ़ाते हुए उसने धीरज बँधाया, ‘‘अरे भाई, धन के लए आदमी को इतना शोकग्रस्त नहीं होना चाहिए…..धन तो हाथ का मैल है….ं’’
फिर कुछ पल रुककर बहुत ही इत्मीनान भाव से ओंठों के नीचे चुटकीभर तम्बाकू दबाकर बोला, ‘‘हाँ, तो लिखवाओ…..।’’
‘‘जी लिखा जाए…दस तोला सोना, दस हजार के बरतन, फ्रीज और कलर टी.वी….।’’
वह अपनी बात अभी पूरी भी नहीं कर पाया था कि दारोगाजी की कलम अचानक रुक गई।
चौंककर पूछा, ‘‘क्या कहा, कलर टी.वी….! ले…लेकिन कलर टी.वी. तो तुम्हारे पास नहीं था….।’’
‘‘यह…यह आप कैसे कह सकते हैं कि मेरे पास कलर टी.वी. नहीं था?’’ उसने आश्चर्यचकित हो पूछा।
उसका यह प्रश्न दारोगाजी के चेहरे पर कील की तरह ठुक गया। अपनी जुबान की फिसलन के कारण दारोगाजी के ललाट पर परेशानी के भाव पसीने की बूँदों की शक्ल में छहरा आए थे। झेंप मिटाने के लिए वे बगलें झाँकने लगे। जीवन में पहली बार उन्हें आज चोरों की वफादारी पर शक पैदा हो गया था। वे क्रोध से मन-ही-मन तिलमिला रहे थे।
और वह बगैर रपट लिखवाए तेज-तेज कदमों से थाना परिसर से बाहर निकल गया।
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