1- फक्कड़ उवाच
सड़क किनारे बैठे फक्कड़ के सामने अपना रथ रोकते हुए सूरज ने कहा,”मुझे झुककर सलाम कर!”
“तुझे सलाम करूँ? मगर क्यों?” उसके प्रचंड प्रकाश से बचने के लिए अपना हाथ आँखों के सामने करते हुए फक्कड़ ने पूछा।
“ये दुनिया का दस्तूर है, चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं!” सात घोड़ों के रथ पर सवार सूरज ने उसे समझाया।
“करते होंगे, मगर मैं तेरे आगे सिर नहीं झुकाऊँगा! जा हवा आने दे।” सूरज के तेज से परेशान फक्कड़ से बहुत ही निश्चिन्त स्वर में उत्तर दिया।
“मगर क्यों नहीं झुकाएगा?” घोड़ों की लगाम कसते हुए सूरज ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा।
“क्योंकि तू बहुत कमज़ोर और निर्बल है, जिस दिन सबल हो जाएगा मैं तेरे आगे सर ज़रूर झुकाऊँगा!” सड़क की पटरी पर अपनी कथरी बिछाते हुए फक्कड़ बोला।
“कमज़ोर और निर्बल? और वो भी मैं?” सूरज के पाँव के नीचे से ज़मीन खिसक गई थी।
“हाँ!” कथरी की सिलवटें हटाते हुए फक्कड़ ने बहुत ही आत्मविश्वास से कहा।
“तो अगर मैं यह सिद्ध कर दूँ कि मैं सबल हूँ, तो क्या तू मुझे सलाम करेगा?” सूरज भी हार मानने को तैयार न था।
“एक बार नहीं, सौ-सौ बार सिर झुकाकर सलाम करूँगा!” कथरी पर लेटते हुए फक्कड़ ने सिर हिलाते हुए स्वीकृति दी।
“तो फिर जल्दी बता! तुझे विश्वास दिलाने के लिए मुझे क्या करना होगा?” अब सूरज के स्वर में बेचैनी थी।
फक्कड़ ने सूरज की तरफ़ पीठ मोड़ते हुए उत्तर दिया,”एक बार, सिर्फ़ एक बार रात में उदय होकर दिखा दे!”
यह कहकर फक्कड़ ने अंगोछे से अपना चेहरा ढक लिया, अब सूरज का माथा पसीने से तरबतर था।
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2-कुक्कुर जात
घटाटोप अँधेरे को चीरकर सामने से आती टॉर्च की रौशनी ने फुसफुसाकर आने की अनुमति माँगी तो इस ओर की टॉर्च ने धीरे-से टिमटिमाकर सुस्वागतं कहा। दोनों तरफ़ से कुछ साए आगे बढे। उनके क़दम एकदम मौन थे, किन्तु चेहरों पर विचित्र-सी मुस्कान नृत्य कर रही थी। ख़ामोशी, मगर गर्मजोशी से हाथ मिलाने का सिलसिला शुरू हुआ। पट्टे से बँधा कुत्ता उस तरफ़ की हवा सूँघकर अचानक ग़ुर्राया।
“हश्श्श।” होंठों पर उँगली रखते हुए वर्दीधारी साए ने कुत्ते को मौन रहने का आदेश दिया।
“इसे दूर रखो यार।” भयभीत स्वर में आगन्तुक ने कहा।
“इसे छोड़ो, जल्दी से काम की बात करो।”
पट्टे से बँधा कुत्ता फिर ग़ुर्राया, वर्दीवाले ने उसे घूरकर देखा तो उसकी गुर्राहट कुछ कम हुई।
“ये लो पूरे पाँच है, गिन लो” आगन्तुक ने एक भरी-भरकम पैकेट उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।
“न..न.. न..! ये बात ग़लत है भई। ऐसा नहीं चलेगा। मुझे पूरा पैसा चाहिए।” वर्दीवाले ने न में सर हिलाकर अप्रसन्नता जताई।
पट्टे से बँधा कुत्ता फिर ग़ुर्राया। वर्दीवाले ने उसे घूरकर देखा पर वह मौन न हुआ।
“अरे यार पूरा पैसा ही तो दे रहा हूँ।” कनखियों से कुत्ते की ओर देखते हुए वह बोला।
“देखो, बात एक आदमी की हुई थी। जबकि ये तो दो हैं। इसलिए दुगनी रकम देनी होगी।”
“अरे इतनी पुरानी दोस्ती है अपनी, जल्द ही कर दूँगा सब घाटा पूरा।” ज़बरदस्ती पेकेट उसके हाथ में थमाते हुए वह बोला।
कुत्ता अब ज़ोर से ग़ुर्राया।
दोनों वर्दीधारियों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
“ठीक है गुरु, तुम भी क्या याद करोगे कि किसी रईस से पाला पड़ा था।” पेकेट अपने साथी को पकड़ाते हुए वह बोला।
कुत्ता अचानक ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। उसका साथी कुत्ते के पट्टे से खींचते हुए कुछ दूरी पर गया, और उसे एक पेड़ से बाँध दिया।
“चलो आओ भई, ज़रा जल्दी करो। ये पगडंडी सीधे तुम्हें मंज़िल तक पहुँचा देगी।” उँगली के इशारे से रास्ता बताते हुए वर्दीधारी फुसफुसाया।
कंधों पर भरी-भरकम बैग लटकाए दोनों साए तेज़ी से उस पगडंडी की तरफ़ बढ़ने लगे। उनका साथी तेज़ी से अँधेरे में ग़ायब हो रहा था। नोटों की गड्डियों के बोझ से दबकर उन वर्दीधारियों की आत्मा तो कोमा में जा रही थी लेकिन ज़ंजीर से बँधा हुआ कुत्ता, पगडंडी की तरफ़ बढ़ते हुए सायों की ओर देखता हुआ क्रोधभरे स्वर में लगातार भौंके जा रहा था…भौंके जा रहा था…।
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3-धूल सने दर्पण
पत्नी की पीठ का दर्द दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। सब घरेलू नुस्खे बेअसर साबित हुए थे, अत: बाबूजी उन्हें किसी विशेषज्ञ को दिखाना चाहते थे। कई दिनों से अपने बेटे से आग्रह कर रहे थे किन्तु बेटा उनकी बात को अनसुना करता आ रहा था। आज तो उसने दफ्तर में काम का बहाना बनाकर माँ को साफ़ इनकार कर दिया। बेटे का यूँ जवाब दे देना उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। पत्नी का रुआँसा-सा चेहरा देख बाबूजी ने कहा,
“चल भागवान, मैं ही ले चलता हूँ तुम्हें डॉक्टर के पास।”
दर्द से लगभग कराहती हुई पत्नी को लेकर डॉक्टर के पास चल पड़े। कॉलोनी में निकलकर सड़क पार करते हुए पत्नी ने यकायक कम्पनी बाग़ की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा,”देखो जी, ये वही पार्क है न जहाँ कभी हम देर रात तक बैठे बतियाया करते थे ?”
“हाँ !” बाबूजी ने ठंडी-सी आह भरते हुए उत्तर दिया।
“समय कितनी तेज़ी से बीत जाता है.. नईं?”
“सही कहती हो।” बाबूजी के स्वर में अभी भी उदासी थी।
“चलो न, थोड़ी देर के लिए चलें अन्दर।”
“अरे मगर डॉक्टर के पास भी तो जाना है, ख़ामख़्वाह देर ही जाएगी।”
“थोड़ी देर बाद चलें जाएँगे, अभी चलो न पार्क में।” पत्नी ने ज़िद करते हुए कहा।
“अच्छा अच्छा, चलता हूँ।” पार्क की ओर मुड़ते हुए वे बोले। “अच्छा अब तुम यहाँ आराम से बैठ जाओ।” पार्क में प्रवेश करते ही बेंच की तरफ़ इशारा करते हुए बाबूजी ने कहा।
“तुम्हें याद है बरसों पहले हम दोनों कितनी मस्ती किया करते थे यहाँ ?” पत्नी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ रही थी।
“हाँ याद है ! और फिर हम स्टेशन के पास वाले ठेले से अक्सर शाम को चाट-पापड़ी भी खाने जाया करते थे?”
“हाँ, बिल्कुल याद है।”
“पता नहीं क्यों आज बीते हुए वक़्त की यादें फिर से ताज़ा हो उठी हैं।”
“एक बात कहूँ जी ?”
“हाँ कहो न।”
“आज हम पहले यहाँ चाट-पापड़ी खाएँगे, फिर बड़े चौक पर जाकर बर्फ़ की चुस्की।”
“तुमने तो मेरे मुँह की बात छीन ली, हम दोनों जगह ही चलेंगे।”
“उसके बाद माल रोड की ठंडी हवा भी खाने चलेंगे।” पत्नी का पीला चेहरा अब गुलाबी होने लगा था।
“जो हुकम मेरी सरकार ! तो मैं कोई ऑटो रिक्शा देखता हूँ।” बाबूजी के स्वर में अब उत्साह था। बाबूजी अचानक पैंसठ से पच्चीस के हो गए थे।
“ऑटो रिक्शा क्यों जी ? हम तो यूँ ही पैदल टहलते-टहलते जाएँगे।” पत्नी ने बेंच से उठते हुए कहा। उनकी पत्नी भी अट्ठावन से अठारह की हो रही थी।
“अरे इतनी दूर पैदल ? मगर तुम्हारा पीठ का दर्द…?”
“अब कोई दर्द नहीं है जी मुझे। बस तुम हाथ पकड़ लो मेरा।”
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4-तापमान
“पैंतीस साल की नौकरी के बाद भी न कोई क़द्र है न कोई इज्ज़त। ये भी साली कोई ज़िंदगी है? इससे अच्छा तो मौत ही आ जाए, सारा टंटा ही ख़त्म हो।” अपना स्कूटर दीवार से साथ लगाकर बाबूजी बड़बड़ाते हुए घर में दाख़िल हुए।
दरअसल आज का दिन ही मनहूस था बाबूजी के लिए। सुबह घर से काम पर जाने के लिए निकले तो तो रास्ते में स्कूटर ख़राब हो गया, सुबह-सुबह कोई मैकेनिक भी नहीं मिला तो लगभग तीन मील तक बमुश्किल स्कूटर को घसीटते हुए कारख़ाने पहुँचे। जाते ही उस नए अफ़सर ने बिना कुछ सुने बाबूजी को देर से आने पर न केवल डाँटा ;बल्कि नौकरी से निकाल देने की धमकी भी दी थी। दोपहर को पता चला कि तीर्थयात्रा पर जाने के लिए उनकी छुट्टी मंज़ूर नहीं हुई। यही नहीं अपने छोटे बेटे के दाखिले हेतु जो ऋण की अर्ज़ी दी थी, वह भी अस्वीकार कर दी गई थी। उनका खाना भी आज डिब्बे से बाहर नहीं निकला, और भोजनावकाश के समय वे बीड़ी पर बीड़ी फूँकते रहे।
“बाबूजी, पानी।” बाबूजी को देखते ही उनकी पुत्रवधू पानी का गिलास उनके सामने रखते हुई बोली।
“नहीं बहू मुझे नहीं चाहिए, ले जाओ उठाकर।” बाबूजी के माथे की त्योरियाँ और गहरी हो रही थी।
“इतने परेशान क्यों हो, तबीयत तो ठीक है न? क्या हुआ है तुम्हें ?” बाबूजी की पत्नी भी कमरे में आ पहुँची।
“कुछ नहीं हुआ मुझे, बस तुम लोग जाओ यहाँ से।” बाबूजी ने उन्हें उँगली के इशारे से बाहर का रास्ते दिखाते हुए कहा।
“बाऊ जी, वो आपके लोन का क्या हुआ?” स्थिति से अनभिज्ञ छोटे बेटे ने कमरे में प्रवेश करते ही पूछा।
उत्तर में बाबूजी ने उसे बुरी तरह घूर कर देखा, उनका यह रूप देखकर सबने वहाँ से जाना ही उचित समझा। बीड़ी सुलगाकर वे फिर बड़बड़ाने लगे:
“ये ज़िंदगी है कि साला नरक?” कमरे की दीवारों का ज़र्द पीला रंग धीरे-धीरे उनके चेहरे पर उतर रहा था। और वे एकटक दीवारों को घूरे जा रहे थे, उदासी का सन्नाटा पूरे कमरे में फैल चुका था, तभी नन्ही-नन्ही पायलों की छनछन से कमरा गूँजने लगा।
“दादू, दादू जी!!”
इन शब्दों से उनकी तन्द्रा भंग हुई, तीन साल की पोती अचानक उनकी टाँगों से आ लिपटी और बाबूजी के माथे से त्योरियाँ कम होने लगीं।
“अले… ले… ले… ले! मेली गुगली-मुगली! मेली म्याऊँ बिल्ली! कहाँ चली गई थी तू? दादू जी कब छे तुझे ढूँढ लए थे।” नन्ही पोती को उठाते हुए वे पंछी की तरह चहक उठे थे। पोती ने भी अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया। अब उनके चेहरे के पीलेपन पर पोती की फ़्रॉक का गुलाबी रंग चढ़ना शुरू हो चुका था। स्नेह से उसका माथा चूमते हुए उन्होंने पुत्रवधू को आवाज़ दी,”एक कप गर्मा-गर्म चाय तो पिला दे बहू…ऽ…।”
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5-नारायणी
कामिनी जबसे यहाँ आई थी उसने हमेशा अपनी सहेली सुनंदा को रसोई के साथ रसोई होते ही देखा था। उसके जीवट से ईर्ष्या भी होती लेकिन अक्सर उसे सुनंदा पर ग़ुस्सा ही आता। क्योंकि उसके चहरे पर न तो कभी थकावट ही दिखती और न ही भाग-भाग कर बच्चो, पति और सास-ससुर की सेवा करते हुए किसी प्रकार की झुँझलाहट ही। रोज़ की तरह आज भी उसने पहले दोनों बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजा, नहाने से लेकर दफ्तर जाने तक पतिदेव की सब फरमाइशें पूरी कीं। फिर सास-ससुर को नाश्ता दिया। घर को व्यवस्थित कर लेने के बाद अपने नाश्ते की प्लेट लिए वह हॉल में पहुँची:
“ग्यारह बजने को आए हैं, और तू अब नाश्ता करने लगी है?” कामिनी ने अधिकार भरे स्वर में कहा।
“अरे फ़्री होऊँगी तभी तो करूँगी न?” सुनंदा ने उसके पास बैठते हुए मुस्कुराकर उत्तर दिया।
“इतने दिनों से देख रही हूँ, पल भर के लिए आराम नहीं तुझे” कामिनी ने अपनी कुर्सी उसके नज़दीक सरकाते हुए कहा
“अरे आराम ही आराम है। तू ये सब छोड़ ये बता कि लंच में क्या खाएगी?” उसकी बात को अनसुना करते हुए सुनंदा ने पूछा।
“हे भगवान!! अभी नाश्ता ख़त्म हुआ नहीं कि तुझे लंच की चिंता भी होने लगी?” कामिनी ने अविश्वास भरे स्वर में कहा
“डेढ़ बजे बच्चे स्कूल से आ जाते हैं और दो बजे इनको भी तो खाना भेजना होता है न। और तू लंच की बात कर रही है मैंने तो डिनर के लिए भी चने भिगोकर रख दिए हैं।”
“धन्य है रे तू! किस मिट्टी की बनी है, तुझे कभी थकावट नहीं होती क्या?” दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए कामिनी बोली।
“अरे अपना घर है अपना परिवार है, थकावट कैसी?”
“मगर तुझे भी तो आराम मिलना चाहिए न?” आत्मीयता भरे स्वर में कामिनी ने कहा।
“आराम के लिए पूरी रात पड़ी होती है मेरी प्यारी कम्मो रानी” कामिनी की नाक को धीरे-से पकड़कर हिलाते हुए सुनंदा ने कहा।
“इसीलिए तो अपन ने शादी नहीं की, कौन दिनभर मुफ़्त की ग़ुलामी करे?” अपने कटे हुए बालों पर हाथ फिराते हुए कामिनी ने बहुत ही बेफ़िक्र अंदाज़ में कहा।
“अपनों के लिए कुछ करने को ग़ुलामी नहीं सुख कहते हैं कामिनी मैडम” कप में चाय उड़ेलते हुए उसने कहा।
“सच बता क्या तुझे कभी इस हाड़तोड़ रुटीन से कोफ़्त नहीं होती?” कामिनी ने अगला प्रश्न दागा।
“कोफ़्त कैसी? मुझे तो बल्कि सच्ची ख़ुशी मिलती है ये सब करने से।”
“ख़ुशी? मगर क्यों?” कामिनी उत्तर जानने को बेचैन थी।
“तूने गृहस्थी नहीं बसाई न?” उत्तर देने की बजाय सुनंदा ने प्रतिप्रश्न उछाला।
“गृहस्थी? माई फुट! हम तो आज़ाद परिंदे हैं” स्वछन्द अंदाज़ में उसने उत्तर दिया
चाय का कप उसकी तरफ़ सरकाते हुए सुनंदा ने मुस्कुराते हुए कहा:
“फिर तू यह सब नहीं समझ पाएगी।”
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योगराज प्रभाकर
53 ‘ऊषा विला’,रॉयल एन्क्लेक्स एक्स्टेंशन,डीलवाल, पटियाला-147002
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चलभाष: 98725-68228