जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: October 1, 2019

1-टंगटुट्टा   

घर का माहौल थोड़ा असामान्य सा हो चला था। परसों ही राजेन्द्र ने किसी दुखियारी से शादी करने की बात घर पर छेड़ दी थी। छोटे भाइयों को तो आश्चर्य हुआ, पर बहुओं की आवाज़ कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गई। बेचारी बूढ़ी माँ  समझाने की कोशिश कर थककर हार मान चुकी थी।

बहुओं के तीखे बाण से कलेजा छलनी हो रहा था, पर कान में रूई डालने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं था।

शाम में तमतमाते वीरेंद्र का प्रवेश सीधा माँ की कोठरी में हुआ। बिना देर किए दोनों बहुएँ दरवाजे से चिपक गईं।

“माँ, यह हो क्या रहा है घर में? भैया पागल तो नहीं हो गए हैं।”

“बेटा,इसमें पागल होने वाली क्या बात है?”

” इस उम्र में शादी? लोग क्या कहेंगे? मुहल्ले वाले थूकेंगे हम पर!” गुस्से में वह लाल-पीला हो रहा था।

“बेटा, उसने कोई निर्णय लिया है ,तो सोच-समझकर कर ही लिया होगा न! उस दुखियारी के बारे में भी तो सोच।”

” हाँ, कुछ ज्यादा ही सोच कर लिया है। अपना तो दोनों टाँग टूटा हुआ है ही और ऊपर से बुढ़ापे में एक औरत का जिम्मेदारी लेने चले हैं!”

“बीस साल से बिना टाँग के ही चाय बेचकर हमारा-तुम्हारा खर्चा चला रहा है न! थोड़ा कलेजे पर हाथ रखकर सोचना कि असली टंगटुट्टा वह है या…!”

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2- बछड़ू

“क्या हुआ? कल से देख रहा हूँ। बार बार छत पर जाती हो।” विमल अनिता से पूछ बैठे।

“नहीं, ऐसा कुछ कहाँ है?”

“कोई हमसे ज्यादा स्माट आदमी आ गया है क्या, उधर?”

“बिना सोचे समझे ऊजूल फ़िज़ूल मत बोला करो। नहीं तो अच्छा नहीं होगा। कहे देती हूं।”

“अरे हम तो मज़ाक कर रहे थे। रानी साहिबा तो बुरा मान गयीं। क्या हुआ, बताओ न!”

” नहीं छोड़ो, जाने दो। तुम नहीं समझोगे।”

“अच्छा! ऐसा कौन सा चीज़ है जो तुम समझती हो और हम नहीं समझ सकते।”

“बात मत बढ़ाओ। छोड़ दो कुछ देर के लिए अकेला हमको।”

“अब तुमको मेरी सौगंध है, बताना ही पड़ेगा।”

” तुमने सौगंध क्यों दे दिया?”

” बताओ न। मेरा जी घबरा रहा है अब।”

“गनेशिया ने अपना बछड़ू बेच दिया।”

“लो,इसमें परेशान होने की क्या बात है? बछड़ू को कब तक पाले बेचारा? बैल बना कर रखना तो था नहीं।”

“नहीं दिखा न तुम्हें! गाय का दर्द नहीं दिखा न! जब से बछड़ू खुट्टा पर से गया है, गाय दो मिनट के लिए भी नहीं बैठी है। उसकी आँखों में देखोगे तो हिम्मत जबाब दे देगा।”

“वह तो होता ही है। क्या किया जा सकता है?”

“अपने सौरभ को भी जर्मनी गए हुए पाँच साल हो गए। शादी से पहले प्रत्येक दिन फोन करता था। शादी के बाद हफ्ता, महीना होते होते आज छह महीना हो गया, उसका फोन आए हुए।”

“उसका, इस बात से क्या मतलब है?”

“हमने भी तो बीस लाख और एक गाड़ी में अपने बछड़ू को….”

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3-डीएनए

“क्या हुआ दामाद जी?”

“नहीं, कुछ नहीं।”

” परसो से देख रहे हैं। आप खुश नहीं है।पांच साल के बाद बच्चा हुआ है। आपको तो बहुत खुश होना चाहिए था लेकिन….”

” हम खुश हैं। बिल्कुल खुश हैं।”

“ओह्ह! अब समझी। बिटिया हुआ है इसलिए उदास हैं। अरे! पहला बच्चा है! जो भगवान दे, खुश हो जाना चाहिए।”

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। बेटा बेटी दोनों बराबर है मेरे लिए।”

“तो क्या हुआ? दहेज़ की चिंता अभी ही लग गयी क्या? सब बच्चा अपने भाग्य कर्म से आता है। बिल्कुल चिंता नहीं कीजिए।”

” हाँ, हाँ। यह बात तो है।”

” तो पाटी साटी का तैयारी करने के बदले मुंह काहे लटकाए हुए हैं। मानसी आपको ऐसे देखेगी तो उसका तबियत और खराब हो जाएगी न। अभी तो वह डिस्चार्ज भी नहीं हुई है।”

…..

” बोलिएगा। तब तो समझ में कुछ आएगा।”

……

“आपको मानसी की कसम, बताइएगा क्या बात है?”

“जो भी बच्चा देखने आता है, सब कहता है कि देखो चेहरा बिल्कुल संजू पर गया है।”

“अच्छा तो यह बात है। शक! संजू उसका चचेरा भाई है। फिर भी आपको उस पर शक है। छि:।

…..

” आपका आफिस के काम से हफ़्तों बाहर रहते हैं। दो दो बजे रात तक ऑनलाईन रहते हैं। कई लड़की और औरत आपकी दोस्त है। मेरी बेटी को भी तो शक होना चाहिए था न!”

“मैंने ऐसा कभी कुछ न किया जिससे शक हो।”

“मेरी बेटी ने कभी कुछ ऐसा नहीं किया। जिसने शादी से पहले नहीं किया, वह बाद में क्या करेगी?”

“सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। डीएनए टेस्ट करा ले, बस।”

“क्या कहा? डीएनए टेस्ट!”

“जी! वही।”

” तो फिर ठीक है। अगर टेस्ट में आपका बच्चा नहीं निकला तो आप तलाक़ दे दीजिएगा। हाँ एक बात और अगर आपका बच्चा निकला तो मानसी आपको तलाक़ दे देगी। ठीक है न!”

….

” जब ये मन्ज़ूर हो जाय तो आ जाइएगा। अभी नज़र से दूर हो जाइए। जाइए।”

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4-कबच

हाथों से मेहन्दी का रंग अभी छूटा भी न था कि चूड़ियों को आपस में टकराकर तोड़ दिया गया । साड़ी का रंग लाल से सफेद हो चुका था और हँसी-मुस्कुराहट इतिहास की बातें। सास भी अपने इकलौते बेटे को खोने के गम में डूब जाना चाहती थी मगर बहू का चेहरा देख संभल जाती ।
इस बीच मँझले नन्दोई का आना-जाना बढ़ गया था। पहले जो मज़ाक आँखों तक ही सीमित रहता था, वह अब शब्दों और छुअन की ओर बढ़ने लगा था। पति को याद करने और भगवान को कोसने के सिवा कोई दूसरा चारा भी तो न था उसके पास ।
आज फिर आए थे मालदह आम लेकर।
वह ननदोई के लिए आम काटकर कमरे में ले गई।
“बैठिए न! खड़ी क्यों हैं ?” नन्दोई ने बड़े प्यार से कहा।
“जी..मैं ठीक हूँ।”
“ठीक कहाँ हो ! अजी! जो होना था सो हो गया। अब इस तरह पहाड़-सा जीवन थोड़े ही न कटेगा।” कहते हुए जबरदस्ती हाथ पकड़ अपने नज़दीक बिठा लिया।
“ये क्या कर रहे हैं आप?” अनीता ने उठने की कोशिश करते हुए औपचारिक हो कहा “आम खाइए न आप !”
“तुम भी मालदह आम से कम थोड़े न हो ! साले साहब के जाने के बाद मेरी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है न!” और हाथ ने मर्यादा की सीमा रेखा पार करने की कोशिश की।
अनीता झटके से अपने आपको छुड़ाती हुई आँगन की ओर दौड़ पड़ी।
सास की अनुभवी आँखों को घटनाक्रम आँकने में एक पल भी न लगा। पीडा व रोष- मिश्रित भावो में सास ने जिम्मेदारी लेनी चाही मगर “आगे का कठिन सफर तो  उसे अकेले ही तय करना होगा” यह सोच उसने बहू को अपने पास बिठा लिया ।
” सुन बहू! मै जब ब्याह कर ससुराल आयी तो सास का साया सिर पर नहीं था । ससुर ने सारी जिम्मेदारी अकेले ही सम्भाली थी । कभी कोई कमी महसूस न होने दी। फिर एक दिन वो भी चल बसे। पर मरने से पहले तेरे दादा ससुर ने अपनी खडाऊँ मुझे देते हुए कहा था कि बहू! यह खडाऊँ मैं विरासत के रूप में तुझे देता हूँ। सम्भाल कर रखना इसे, जरूरत पड़ेगी ।”
बहू के कंधे पर हाथ रख उसने भर्राए गले से कहा, “बेटी, मुझे तो इसकी जरूरत अब तक न पड़ी लेकिन तुझे अब इसकी सख्त जरूरत है। पुरखों की विरासतें यूँ जाया नहीं जाती ।” कहते हुए सास ने खडाऊँ को जोर से जमीन पर पटक दिया  । खडाऊँ छिटका, गुलाटियाँ मारते हुए बरामदे से कमरे की ओर दौडा़ । अंदर से चीखने की आवाज़ सी आई ।
अनीता ने आश्वस्त नजरों से सास की तरफ देखा और अपना सिर सास के कंधे पर टिका दिया ।

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5-विद्या

कक्षा में शिक्षक नहीं थे। बच्चे उनके न होने का फायदा उठाते हुए शोर मचा रहे थे। अचानक शिक्षक के आने की आवाज सुन सब चुपचाप अपनी-अपनी जगह पर बैठ गए। 

शिक्षक ने कक्षा शुरू की, “बच्चो ! कल जो पाठ पढ़ा था। वह सबको समझ आया था न!”

 “जी सर।” सब बच्चों ने जोर से आवाज लगायी। 

“ठीक है, रवि! तुम वह श्लोक सुनाओ।” 

“विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ।।”

 “समीर,अब तुम इसका अर्थ बताओ।”

 “विद्या विनय ….” 

“ठीक !”

“विद्या विनय देती है और…और !” 

“अरे नालायक! कल ही तो बताया था।” 

“सर, विद्या विनय देती है और …और उससे धन…!” 

“ला रे रवि, छड़ी ला। इस गधे को एक श्लोक का अर्थ तक याद नहीं हुआ। उल्लू का पट्ठा, पक्का फेल होगा इस बार।”

बच्चे अपनी कॉपियों में सर द्वारा लिखवाया गया श्‍लोक का अर्थ पढ़ रहे थे, ‘  विद्या विनय देती है…. !’

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मृणाल आशुतोष

द्वारा- श्री तृप्ति नारायण झा,ग्राम+पोस्ट- एरौत,वाया-रोसड़ा,जिला-समस्तीपुर (बिहार)-848210

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