जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: March 1, 2019

1.चक्कर

वह राशन कार्ड के लिये तीन महीने से ऑफिस का चक्कर लगा रहा था । जब वह सोमवार को जाता तो पता चलता कि बाबू ‘अ ’आज शिव मंदिर गए हुए हैं । मंगलवार को जाने पर बाबू ‘ ब ’ हनुमान मंदिर जाने के कारण नहीं मिलते । प्रत्येक बुधवार को समाज सेवा को अपना धर्म मानने वाले बाबू ‘स ’ की कॉलोनी में बैठकें होती थीं,सो वह ऑफिस में नहीं मिलते । गुरुवार को तो ऑफिस के आधे लोग ‘उपवास ’ रहते थे इस कारण घर में ही धरम- करम में लगे रहते । ‘शुक्रवार को बाबू ‘द ’ नमाज पढ़ने के बहाने ऑफिस से निकल जाते । फिर ‘शनिवार आ जाता । शनिवार को बाबू ‘इ’ और ‘ई’ पास के बजरंग बली के मंदिर में हनुमान चालीसा पढ़ने में लीन रहते ।
वह सोमवार से ‘शनिवार तक के दिन और इन दिनों में कौन बाबू कहाँ जाता है”को कई बार उंगलियों में गिन चुका था ।
उसे अपनी गलती का एहसास हुआ । उसने सोचा कि हो सकता है दफ्तर के बाबू अपने बचे काम को रविवार को करते हों । यह सोचकर वह खुश होने लगा ।
वह रविवार को निगम कार्यालय में उपस्थित हुआ । उसकी सोच के अनुरूप सारे बाबू वहाँ उपस्थित मिले । आज उसे उम्मीद थी कि उसका राशन कार्ड बन जाए गा ।
उसे देखते ही बाबू ‘इ ’ ने रौबदार आवाज में कहा , ‘‘आज रविवार है । छुट्टी का दिन । आज इधर कैसे आ गए ? ’’ बाबू उसे ऐसे देख रहा था जैसे किसी अपराधी को देख रहा हो ।
उसे नहीं मालूम था कि उन लोगों ने रविवार का दिन दारू मुर्गा के लिए तय कर रखा था । उसे अपनी गलती का एहसास हुआ ।
दूसरे दिन से वह ऑफिस का चक्कर लगाना छोड़ उन मंदिरों और मस्जिदों में चक्कर लगाना ‘शुरू कर दिया ।
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2.पेइंग गेस्ट
माँ जी पहली बार अपने बहू-बेटे के पास ‘शहर आई थी। गाँव में अकेले रहते हुए उन्हें बड़ा एकाकी पन महसूस होता। कई बार उन्होंने बेटे से कहा उसे भी अपने साथ’ शहर ले जाए. घर के किसी कोने में पड़ी रहेगी।
हर बार बेटा टाल मटोल कर बहाने बना देता। मोतियाबिंद के आपरेशन हेतु बेटे को मजबूर होकर माँ को ‘ शहर लाना पड़ा।
बहू बेटे ने अपने बड़े से मकान में पेइंग गेस्ट भी रखा हुआ था। डाइनिंग टेबल पर पेइंग गेस्ट भी भोजन करने बैठे। उनको देखकर माँ जी ने अनुमान लगाया था कि कोई रिश्तेदार होंगे। वे उन्हें पहचानने की कोशिश करने लगी।
आखिर वे पूछ बैठी, “बहू, ये मेहमान तुम्हारे मायके वालों से हैं क्या?”
बहू ने समझाया, “नहीं, माँ जी ये हमारे पेइंग गेस्ट हैं।”
उनको कुछ समझ नहीं आया। बात में पोते ने समझाया-“दादी ये हमारे साथ रहते हैं। खाते-पीते हैं और इन सबके बदले ये पैसा देते हैं। इसलिए इनको रखा गया है। आप भी हर महीने पैसे दोगी तो मम्मी तुम्हें गाँव में नहीं बल्कि हमारे घर रखेगी।”
पोते ने मासूमियत से कहा।
यह सुनकर माँ जी का मन आहत हो गया।

3-आज़ादी की कीमत

‘‘ साढे़ नौ बज चुके हैं। अब उठो भई , आज ऑफिस नहीं जाना है क्या ? ’’
मसेज ‘क’ ने मिस्टर ‘क’ को झिंझोड़ते हुए कहा।
मिस्टर ‘क’ ने आँखें मलते हुए कहा, ‘‘भागवान, कभी तो अक्ल से काम लिया करो। आज पन्द्रह अगस्त है। दफ़्तर की छुट्टी है। जरा सोने दिया होता।’’
मिसेज ‘क’ ने प्रसन्न होते हुए कहा,-‘‘वाह! ऐ अच्छी बात है। चलो अब जल्दी से उठो । बारह से तीन मैटनी ‘शो चलते हैं। बहुत दिनों से हमने कोई फिल्म नहीं देखी है।’’
तभी दरवाजे से स्कूल बच्चों की टोली वीर ‘शहीदों की जय-जयकार लगाती हुई गुजरी। मिस्टर ‘क’ दरवाजे पर खड़े होकर उन्हें देखने लगे।
पड़ोसी मिस्टर ‘ख’ने उन्हें दरवाजे पर खड़ा देखकर पूछा,-‘‘ क्यों भाई साहब , आज आप ऑफिस में ध्वजारोहण के लिए नहीं गए ?’’
मिस्टर ‘क’ ने मुस्कुराते हुए कहा, -‘‘भई ,यह झण्डा फहराने का काम नेताओं और अफसरों का है और उन्हें साथ देने के लिए ये स्कूली बच्चे हैं न, फिर हमारा क्या काम ? आज का दिन तो हमारा आराम का और एन्जाय का होता है।’’
यह कहते हुए मिस्टर ‘क’ फिल्म जाने के लिए तैयार होने लगे।
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4-संवेदनशीलता
‘‘बडे़ बाबू का एक्सीडेंट हो गया है। वे आई.सी.यू.मे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उनका बचना मुश्किल है।’’
सरकारी दफ्तर के बड़े अफसर को वहाँ का एक कर्मचारी बता रहा था।
बड़े अफसर ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा -‘‘यह तो बहुत ही बुरा हुआ।’’ यह कहते हुए वे किसी चिन्ता में डूब गए।
दोपहर में शर्मा बाबू एक फाइल में उनका हस्ताक्षर लेने पहुँचे , तब भी बड़े अफसर ने बड़े बाबू के स्वास्थ्य के बारे में पूछा। ‘शर्मा बाबू बड़े अफसर के कक्ष से निकले तो चपरासी से कह रहे थे,-‘‘हमारे बॉस कितने दयालु हैं । अपने ऑफिस के कर्मचारियों का कितना ध्यान रखते हैं । आज दिन भर बड़े बाबू के बारे में पूछते रहे हैं।’’
चपरासी ने तम्बाकू फाँकते हुए कहा, -‘‘खाक दयालु हैं। शर्मा जी, आप इस ऑफिस में नए हो न ? अरे हमारे बॉस बड़े बाबू को इसलिए पूछ रहे हैं कि उनके मरने के बाद उनके परिवार में किसी न किसी को अनुकम्पा नियुक्ति तो मिलेगी ही और हमारे बॉस का अनुकम्पा नियुक्ति के लिए कमीशन सीधा-सीधा पचास हजार बँधा हुआ है।
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