अगस्त 2026

संचयनलघुकथाएँ                                    Posted: March 1, 2018

 1-परंपरावादी

कुदरत की कृपा से परिवार में यह एक गर्वोत्पादक परंपरा सी स्थापित हो गई। उसकी दादी ने  पाँच बेटे जने। बेटी एक भी नहीं। इन सपूतों के दम पर दादा जिंदगी भर मूँछों को बारम्बार ताव देते रहे। इतनी बार कि यदि विधिवत आंकडे पेश करते तो ये कारनामा गिनीज बुक के वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो जाता। माँ ने चार लडकों को जन्म दिया। पिता ने भी बेटी का बाप नहीं होने का सुख भरपूर भोगा। उसकी पत्नी की तीनों डिलीवरी में लड़के हुए। परंपरा निभाते हुए वह भी इस खुशी में ताउम्र फूलता जाना चाह रहा था; किंतु जवान हो चुके लडकों से वह कोई ऐसा सुख झटक पाने में असमर्थ है, जिससे निरंतर फूलता जाता रह सके। उल्टे अब उसे एक भयंकर चिंता सता रही है। लडकियों की घटती संख्या और बढ़ती शिक्षा के दौर में कहीं उसके सामान्य और अल्प शिक्षित लड़के  कुँआरे ही न रह जाएँ।

दादा और पिता की मानसिकता के प्रति उसे विकृति की आशंका होती है। सिर्फ बेटों का बाप बनकर आखिर वे ऐसा कौन सा सुख लूटते रहे, जिसे अब वह जरूरत महसूसने पर हासिल तक नहीं कर पा रहा है।

कभी अपराधबोध के मारे, तो कभी झुँझलाकर। इधर वह पत्नी से कह बैठता है, ‘‘तीन-तीन लडके! काश एक-दो बेटियां होतीं।’’

सुनकर पत्नी अवाक् रह जाती। मन ही मन मुस्कुराती। इस परंपरावादी को ये क्या हो गया है!

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2-मुस्कुराहट

पिताजी मौका पाते ही मुझे उपदेश देना शुरू कर देते थे। दुनियादारी, ऊँच-नीच, भला-बुरा सब कुछ मुझे समझाने के लिए मानो वे प्रतिबद्ध थे। इस अभियान के दौरान कई बोधजनक रोचक लोक कथाओं और किस्सों को उदाहरण के रूप में मेरे सामने रख देते थे वे। इनमें से कई किस्से तो मैं पहले भी उनसे सुन चुका होता, कितनी ही बार। इसलिए बच निकलने के लिए कसमसाता। अनमनेपन के भाव मेरे चेहरे पर साफ उभर आते। जिन्हें मैं, शिद्दत से चाहता कि पिताजी पढें और समझें। ताकि उपदेश पिलाने की इस यातना से मुझे बरी कर सकें। एक तरह से वह एकदम खुल्ला पिताजी का मानसिक अपमान था। अक्सर मुझे शक होता। पिताजी मेरे चेहरे के सारे भाव हूबहू पढ-समझकर भी जानबूझ कर अनजान बने, मुझे यह सब सुनाए जा रहे हैं। अपना सारा जीवन अनुभव मुझमे  उँडेलने के लिए वे हरदम बेताब से रहते। पर मैं इससे बचने की कोशिश में रहता और  फँस जाने पर झल्लाता हुआ सा तमाम बातें सुनता, जिनमें से अधिकतर तो अवश्य ही, मेरी एकाग्रहीनता के मारे, मेरे सिर के ऊपर से निकल चुकी हैं।

लेकिन बचा-खुचा जो कुछ मेरे पास है, वह मैं अपने लड़के को देने के लिए बेचैन -सा क्यों हूं। अवसर देखते ही मैं अपने बेटे को वह सब सुनाना शुरू कर देता हूं, जो कभी खुद मैंने अपने पिताजी से सुना था, पूरे अनमनेपन के साथ। पर मुझे लगता है उसे देने के लिए, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण कुछ भी तो नहीं है मेरे पास। यूँ लगभग आधा-अधूरा ही होता है वह सब, जिसे सुनाते वक्त अपने बेटे के चेहरे पर अनमनेपन के वही भाव देखकर मैं बरबस मुस्कुरा पडता हूँ, आत्मपीडा के मारे। मुझे लगता है यह मैं नहीं पिताजी ही मुस्कुरा रहे हैं, मुझ पर। तब शर्म, ग्लानि और झिझक से भरकर एकाएक मौन हो जाता हूं। और मौका पाते ही लडका वहाँ से भाग छूटता है। मैं फिर मुस्कुराता हूं। और साफ महसूसता हूं कि पिताजी व्यंग्य से मुस्कुरा रहे हैं। बल्कि ताना भी मार रहे हैं कि उनका लड़का अनमना होकर ही सही, उनके पास बैठकर उनकी बातें सुनता तो था। पर मेरे लड़के को तो इतनी भी फुरसत नहीं।

मैं सफाई देता हूँ, वह अधिक व्यस्त है। और हां उन दिनों समय का इतना अभाव भी तो नहीं था। पिताजी फिर मुस्कुराते हैं। समय के अभाव में क्या अनुभव सिद्ध अर्जित ज्ञान का महत्व कम हो जाता है!

वह खुद भी तो अपने समय और अपने अनुभव से ज्ञान बटोरेगा। जवाब में सोचते हुए मैं झेंपकर मुस्कुराता हूं।

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3-बिटिया की रोटी           

‘‘हूँ! ये क्या खाने लायक रोटियाँ हैं। कोई कच्ची-अधकच्ची है तो कोई जली हुई। आदमी क्या कोई कुत्ता भी नहीं खाएगा इन्हें ’’- माँ ने डपटते हुए कहा तो बेटी रूआँसी हो गयी। सचमुच उसकी बनायी रोटियाँ थी थीं ही ऐसी। उसने मन ही मन ईमानदारी से कुबूल किया। खुद उसे ये रोटियाँ नहीं भाएँगी। आखिर वह करे भी तो क्या। सुबह जल्दी कॉलेज जाना और आते ही ,माँ का बनाया कुछ खा-पीकर ट्युशन पढाने में जुट जाना। फिर अपनी पढाई पर भी ध्यान देना। मां बार-बार कहती रहती है। और वह खुद चाहती हैा कि घर के काम-काज में माँ का हाथ बँटाए। ढंग का खाना बनाना सीखे। लेकिन अक्सर उसे लगता है कि ये उसके बस की बात नहीं। वह ढंग की कविता कहानी भले ही लिख डाले किन्तु मां जैसी रोटियाँ शायद ही कभी बना पाएगी। आज फिर उसने मन मारकर माँ के कहने पर चार-छह रोटियां बनाने की कोशिश की थी और फिर वैसी रोटियां ही बना पायी। मां के शब्दों में कुत्ते के भी खाने लायक नहीं वाली। उसने सोचा इससे तो अच्छा होता कि वह कविता ही पूरी कर लेती जो रोटियां बनाते वक्त दिमाग में घुमड़ रही थी और अब उड़ चुकी थी।

अब उसे चिंता हुई। बेचारी इन रोटियों का क्या होगा। उसे उन पर तरस आने लगा। क्यों न अब इन रोटियों पर ही एक कविता लिखी जाए। सोचते हुए वह पानी पीने रसोई घर में गई ,तो देखकर चकित हो गई। माँ बड़े चाव से उसकी बनायी रोटियाँ खा रही थी। वह चुपचाप चली आई और डायरी लिखने बैठ गई।

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4-  सरप्राइज़  गिफ्ट                                                 –

मंत्रीजी ने स्पष्ट महसूस किया। साक्षात् महँगाई प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार को राखी  बाँध रही है।      ‘‘भैया ! अबके सरप्राइज गिफ्ट क्या है ? जानने के लिए वे कल से उतावले हैं !‘‘ मंत्री भाई को राखी  बाँधने के बाद बहन ने अधेडावस्था के बावजूद ठुनकते हुए कहा ।

स्नेह और रहस्य भरी मुस्कान के साथ कम पढी-लिखी बनी-ठनी बहना को निहारते हुए मंत्रीजी ने एक वजनदार पेकेट थमाया। पिछले साल उन्होंने एक करोड़ का गहना दिया था। इस बार बदले हालात और संभली-सुधरी मानसिकता वश उन्होंने ‘‘श्रीमद्भगवतगीता‘‘ की सरल भाषा टीका सहित मोटे अक्षरों वाली प्रति भेंट की है। जो सही मायने में आदर्श सरप्राइज गिफ़्ट साबित होगा ! सोचते हुए उनकी मुस्कान तेज हो गई। यह देख बहन के दिल की उमंग भरी धड़कनें भी तेज।

बहन के जाते ही पीहर जाने के लिए तैयार मंत्रीजी की पत्नी बोली- ‘‘देखें ! इस बार मेरा भारी भरकम ठेकेदार भाई क्या देता है !”  लालच भरे स्वर से लार सी टपक रही थी ।

कहाँ कसर रह गई ! अब इसे और क्या चाहिए !    चिंतन करते मंत्री जी को पत्नी तृष्णा की जीती -जागती मूरत नजर आई। तृष्णा और वासना ही तो भ्रष्टाचार की संगिनी हैं। पत्नी के साथ ही उन्हें अपनी गर्ल फ्रेंड का खयाल आया, जो हफ्ते भर से मचल रही थी। रक्षा बंधन के उपलक्ष्य में अपने मुंह बोले भाई के हित में कुछ करने के लिए।

‘‘पापा देखिए तो! भैया ने मुझे रक्षा बंधन पर क्या दिया है !‘‘ पुलकते हुए आकर किशोरी बिटिया ने कहा ,तो मंत्रीजी तीव्र जिज्ञासु हो उठे, ‘‘जल्दी बताओ ! क्या दिया है ?‘‘

तभी किशोरावस्था पार कर रहा मंत्री-पुत्र गंभीर मुस्कान के साथ आकर गर्व से बोला, ‘‘दिया नहीं ! इसने मुझसे पक्का वादा लिया है, जो मैंने भी सच्चे दिल से दिया है कि भविष्य में यदि मैं राजनीति में उतरा तो भ्रष्टाचार नहीं, शुद्ध जन सेवा करूँगा !”

निष्ठा और सिद्धांत कदापि भ्रटाचार की संतान नहीं हो सकते ! सोचते हुए भावुक मन और भीगी  आँखों के साथ मंत्रीजी के मुखडे पर सुखद आचर्य भरी मुस्कान थी ।

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5-व्‍यवस्था

सरकारी अधिकारी मित्र बहुत दिनों बाद उसकी दुकान पधारे। इधर से गुजर रहे थे सोचा मिलते चलें। उसने प्रसन्नता और तत्परता से स्वागत किया। चायपानी के साथ भ्रष्टाचार सहित दुनिया भर की चर्चा होती रही। मित्र सिद्धांतवादी हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों के प्रशंसक बल्कि समर्थक। रवाना होते हुए याद आया। कार्यालय में अगले हफ्ते एक समारोह का आयोजन है। जिसमे मुख्य और विशिष्ट अतिथियों के लिए दो उपहार खरीदने हैं। संयोग से उसकी फेंसी आइटमस् की दुकान पर उपयुक्त सामग्री उपलब्ध थी। अधिकारी मित्र ने पसंद कर पेक करवा ली। और कहा -दो दिन बाद कार्यालय का आदमी आकर ले जाएगा। बिल उसी दिन बनाना!

वह कर्मचारी क्या यहीं आसपास रहता है? -उसने जिज्ञासावश पूछा!

अरे नहीं! कार्यालय से आएगा। बाकायदा सरकारी गाडी लेकर!- मित्र के कथन में गर्व है या व्यंग्य वह समझ नहीं पाया।

लेकिन तुम्हारा ऑफिस तो यहां से 13-14 किलो मीटर पड़ता है। इतनी दूर से इस भीड़भाड़ वाले इलाके में इतने छोटे से काम के लिए आना-जाना! यानी आधे दिन की मेहनत और इतने पेट्रोल का फिजूल खर्च। ऐसा करो, तुम अपने घर ले जाओ ये उपहार। कल ऑफिस ले जाना। यह ठीक रहेगा!- उसने व्यावहारिक चेतना के साथ कहा ।

मित्र अधिकारी बन मुस्कुराया -यह तुम्हारे हिसाब से ठीक है। लेकिन सरकारी हिसाब से ठीक वही है जो मैंने कहा!

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