अपने साथ हुई ज़्यादती की आग में जलती रिद्दिमा के जीवन में फैसले की घड़ी आ गई थी। अपनी सहेलियों के साथ वह अदालत पहुँची। कुछ ही देर में फैसला अपने हक़ में और लड़के के गुनाह की जज द्वारा तय की गई सज़ा सुनकर उसके तपते दिल को ठंडक मिली और चेहरे पर सुकून तिर आया।
लेकिन कुछ सोचते हुए तुरंत ही उसने अदालत से एक निवेदन पत्र पेश करने की अनुमति माँगी।
जज द्वारा निवेदन पत्र पढ़ते ही सभागार में उपस्थित सभी लोगों की आश्चर्य भरी निगाहें रिद्दिमा पर ठहर गईं। आपस में खुसुरपुसुर करते लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि आख़िर यह चाहती क्या है।
अदालत से बाहर निकलते ही गुस्से में तिलमिलाती रिद्दिमा की सहेलियाँ उस पर बरस पड़ीं।
पहली बोली – लड़कों के माँ-बाप ने लगाम लगाई होती तो आज यह ऐसी हरकतें न करते। और तुझे क्या सूझी, तूने उस लफंगे को बचाया क्यों?
दूजी – चार दिन जेल की हवा खाता तो सारी हीरोपंती करना भूल जाता।
तीसरी – पीसने देती उस कम्बख़्त को जेल की चक्की तभी उसकी अक़्ल ठिकाने लगती। कम से कम ज़िंदगी भर फिर किसी की इज़्ज़त पर हाथ डालने की हिमाकत न करता।
सबकी बातें सुनकर रिद्दिमा भड़क कर बोली – क्या इतना क़ाफी न था कि वह गुनहगार साबित हुआ और लोगों में उसकी बदनामी हुई।
तुम्हें क्या लगता है जेल किसी ऋषि-मुनि का आश्रम है जहाँ इनका सुधार होगा।
अरे, चोरों उचक्कों में रहकर यह और भी निर्लज्ज और बेलगाम हो जाएगा।
तुम इससे चक्की पिसवाना चाहती हो, कभी सोचा है बदले की आग में चक्की के प्रत्येक फेर के साथ एक लड़की को बरबाद करने के मनसूबे बनाएगा। और जब बाहर आएगा तो कितनी ही मासूम इसकी बदले की आग में बेवजह झुलस जाएँगी। क्या सज़ा से बेहतर नहीं कि किसी को शर्म दिलाई जाए! यही सोचकर मैंने उसको लगाम लगा दी।