प्रसव-पीड़ा से गुजरती हुई वह उस क्षण को छूने लगी, जहाँ सृष्टि होती है। नर्स ने हुलस कर कहा, ’बेटा हुआ है’। परिजनों के बीच ख़बर आग की तरह फैल गई, एक-दूसरे को बधाई देने के स्वर हवा में तैरने लगे।अचानक किसी दूसरी नर्स आकर बोली, ‘माफ कीजिए,बेटा नहीं,बेटी हुई है’।फिर क्या हुआ? पता नहीं! शोर थम गया, खामोशी पसर गई। उसे लगा,जैसे वह कहीं निर्जन में पड़ी है…नितांत अकेली! कमज़ोर काया के साथ वह लेबर रूम में अकेली छोड़ दी गई और बच्ची परिजनों के बीच।
अजीब- सी अकुलाहट लिए वह बिस्तर से उठी और नर्स की सहायता से अपने कमरे में पहुँची।नज़रें किसी को ढूंढ रही थीं। इशारे से शिशु को माँगा।बमुश्किल होठ हिले,स्वर निकला ‘वो कहाँ हैं?’…
”वह तो ‘बेटी’ सुनते ही जाने कहाँ चला गया। बेचारा! बेटा सुनकर कितना खुश हुआ था!”सासू माँ के शब्द तीर से भी तेज़ गति से बिंधने लगे, आँसू रोकना कठिन होने लगा।बड़ी कठिनाई से करवट हो, उसने सजल नेत्रों से बेटी का चेहरा निहारा …. भोला, मासूम,जीवन की कठिनाइयों के एहसास से दूर प्रेममय चेहरा। सहसा वह झुकी और धीरे से उसके माथे को चूम लिया ;उसकी बंद मुट्ठी में अपनी उँगली फँसाते हुएअपने-आप से बोली –“मैं साथ हूँ न” उर दुबारा उसका माथा चूम लिया।
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अगस्त 2026
देशलक्ष्य Posted: November 1, 2015
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