‘शाम को अधिकतर वे घर के बाहर चबूतरे पर बैठ जाते हैं। आने-जाने वाले परिचितों से हाल-चाल पूछना, बतियाना अब उनकी आदत में शुमार हो चुका है। सांध्यवेला में समय काटने का इससे अच्छा उपक्रम और हो भी क्या सकता है। काफी देर से कोई गुजरा नहीं था। उनकी आंखें बतियाने के लिए बेताब थीं। तभी स्कूल से लौटती एक लड़की दिखी। झट से बुलाया और प्रश्न दाग दिया-‘‘कौन की मोड़ी आय?’’
‘‘रामेसुर की।’’
‘‘कौन सी किलास पड़त?’’
‘‘चौथी।’’
जैसे प्रश्न वैसे उत्तर। लड़की बेबाकी से जवाब दिए जा रही थी। उन्हें भी मजा आ रहा था। बोले-‘‘का नाम तुमाव?’’
‘‘रोसनी।’’
‘‘कायकी रोसनी?’’
‘‘मतलब?’’
‘‘अरे दिया की, डिबिया की, बलफ की, चंदा की के सूरज की रोसनी।’’
लड़की कुछ देर सोचती रही, फिर बोली-‘‘घर की रोसनी।’’
उनकी वृ़द्ध सजल आंखें मुस्कुरा उठीं। सिर पर आशीर्वाद से भरपूर हाथ फेरा। लड़की मुस्कुराते हुए जा रही थी, बार-बार पलटकर देखते हुए। उनकी आंखें भी दूर तक उसका पीछा करतीं रहीं।
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अक्तुबर 2026
देशरोशनी Posted: January 4, 2015
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