लगभग तीन दशकों से इस विधा से मेरा गहरा जुड़ाव रहा है । इस अंतराल में सृजन और अध्ययन के क्रम में अपने पूर्ववर्तियों , समकालीनों( अशोक भाटिया , बलराम अग्रवाल , सुकेश साहनी , रामेश्वर काम्बोज , जगदीश कश्यप , भागीरथ, श्याम सुन्दर अग्रवाल , अशोक जैन , सुभाष नीरव , कमल चोपड़ा , स्व.विक्रम सोनी आदि) की कई ऐसी लघुकथाएँ पढने को मिली हैं ,जो मेरी स्मृति में जीवन्त हैं और आने वाले वक़्त में भी बदस्तूर जीवित रहेंगी।कहने की ज़रूरत नहीं कि नए-पुराने लघुकथा सर्जकों ने इस स्तम्भ में उपर्युक्त वरिष्ठों की लघुकथाओं का ख़ूब ज़िक्र किया है और अपनी अपनी पसंदगी की वजहों से हमें रू-ब-रू करवाया है । इस क्रम में , हाल-फ़िलहाल में विभिन्न कलेवर में सृजनात्मक ‘धमक’ के साथ इस शेत्र में अवतरित हुए उन नवागतों का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा; जिनका रचनाकर्म असीम संभावनाओं से परिपूर्ण है और हमारी आशान्वितताको पुख्ता ज़मीन मुहैया करवा रही है । इनकी भी लघुकथाएँ हमारी स्मृति-पटल पर जगह बनाने में कामयाब हो रही है । निश्चय ही यह इस विधा के लिए शुभ संकेत है ।
सच तो यह है कि अपनी पसंदीदा लघुकथाओं की ‘सुकून देने वाली भीड़’ से किन्हीं दो लघुकथाओं का निष्पक्ष और पूरी ईमानदारी के साथ चुनाव करना कभी –कभार दुविधा की स्थिति उत्पन्न कर देती है । फिर भी ‘रचनाएँ बोलती हैं’ , ‘रचना ही रचनाकार की पहचान है’ , बकौल सुकेश साहनी ‘…..उत्कृष्ट रचनाएँ बहुत दूर तथा बहुत देर तक हमारे साथ चलती हैं’ – इन्ही विचारों को ध्यान में रखते हुए जिन दो लघुकथाओं का अपनी पसंद के कारणों का उल्लेख करना चाहूंगा , वे हैं—‘और हाथी रो रहा था’(अनवर शमीम ) , ‘एक ठेला स्वप्न’ (चित्तरंजन गोप )
अनवर शमीम हमारे समकालीन हैं । भले ही वे वर्तमान काव्य परिदृश्य के सशक्त और चर्चित हस्ताक्षर हैं , लेकिन दोनों विधाओं (कविता और लघुकथा ) को साधने में सक्षम और पारंगत हैं । उनकी भी कई उम्दा लघुकथाएँ शीर्षस्थ पत्र –पत्रिकाओं में बाइज्ज़त जगह बनाने में कामयाब रही हैं। जब वे लघुकथा विधा को गंभीरतापूर्वक और पूरी तन्मयता के साथ साधने में संलिप्त थेउसी दौर की ही यह लघुकथा है जो अखिल भारतीय कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता ,2006 में पुरस्कृत हुई थी ।
‘और हाथी रो रहा था’ संवेदनाओं में सनी-पगी अंतस् को केवल स्पर्श करने वाली ही नहीं वरन उसे भेदने , झकझोरने वाली विधाकी शास्त्रीयता पर खरी उतरी हुई रचना है । अपने मासूम और अबोध पुत्र की मामूली सी इच्छा पूरी न करने में असमर्थ , लाचार, असहाय पिता की कारुणिक , हृदयविदारक रुदन है यह रचना । प्रतिरोध और प्रतिकार के निमित्त आयोजित होने वाले जलसों , आन्दोलनों, जुलूसों से उत्पन्न होने वाली आमजनों की परेशानियों , दिक्कतों और प्रतिकूल प्रभावों का कच्चा चिटठा है यह रचना । आर्थिक विपिन्नता , घोर अभाव जैसे कारकों से उपजी विवशता , अक्षमता की हौलनाक दास्तान है यह रचना जो हमारी आँखों को भिगोते हुए रूह को भी भिगोती है । एक सामान्य सा कथानक को सुगठित भाषा , पात्रानुकूल कथोपकथन, शिल्पकी बारीक बुनावट , रचाव की कसावट , बोधगम्य वाक्य –संयोजन, प्रतीकात्मक किन्तु संप्रेषणीय शीर्षक का सर्तकता औरसजगता से उपयोग कर किसी रचना में प्रभावोत्पादकता कैसे पैदा किया जा सकता है , इसका अन्यतम उदाहरण है यह लघुकथा । रचना की प्रस्तुति में ऐसी सजगता बरती गई है कि कथानक का कोई हिस्सा ग़ैर ज़रूरी नहीं लगता और न ऊब पैदा करता है । प्रवाहमयी भाषा के साथ-साथ इसकी पठनीयता का भी पूरा ख्याल रखा गया है । यह लेखक की कथावाचन की कुशलता का परिचायक है ।
कथा का सार यही है कि छात्र आन्दोलन की वजह से इलाके का जन-जीवन ठप्प है । रमजानी उस इलाके का एक दिहाड़ी मजदूर है जो बंद के कारण काम पर नहीं जा पाया है । उदासी की हालत में अपनी झोंपड़ी में लेटा हुआ है । उसी समय झोंपड़ी के बाहर कोई हाथीवाला आता है । रमजानी का बेटा हाथी की पीठ पर बैठने के लिए उससे पैसे की मांग करता है । वह पैसे देने में असमर्थता जताता है ; लेकिन उसका बेटा पैसे देने की बाल-सुलभ ज़िद पर अड़ा रहता है । बेटे की इस ज़िद सेरमजानी खिसिया जाता है और गुस्से में बेटे को बुरी तरह डाँट-डपट देता है । हाथीवाला के चले जाने के बाद बाप-बेटा झोंपड़ी में समा जाते हैं । इच्छा पूरी न होने पर बेटा बेहद उदास और मायूस है । बेटे की उदासी उसके क्रोध की अग्नि में पानी की छिडकाव का काम करती है और वह व्यथित होकर तिलमिला जाता है । बेटे को तात्कालिक ख़ुशी देने के लिए रमजानी खुद हाथी बनकर अपनी पीठ पर उसे बिठाकर झोंपड़ी के अन्दर ही चक्कर काटता रहता है। हाथी बना बाप की पीठ पर बैठकर बेटा अपनी ख़ुशी मिश्रित किलकारियों से झोंपड़ी को गूंजयमान कर रहा था लेकिन रमजानी अपनी रुदन से झोंपड़ी को भिगो रहा था ।
नवागतों की लघुकथाओं में से जिस लघुकथा ने मुझ पर अच्छा-खासा प्रभाव डाला है , वह है चित्तरंजन गोप की ‘एक ठेला स्वप्न’ ( जागरण/ पुनर्नवा के 15 अगस्त ,16 अंक में प्रकाशित ) चित्तरंजन गोप नयी सदी के पूर्वार्द्ध में ‘धमक’ के साथ अवतरित होने वाला नाम है । चित्तरंजन‘थोक’ में नहीं लिखते । कम लिखते हैं । लेकिन ठोंक-बजाकर लिखते हैं । यही वजह है कि इनकी तमाम लघुकथाएँ स्थापित मानकों पर खरी उतरती है । प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके लेखन का भरपूर सम्मान और स्वागत होता है ।
‘एक ठेला स्वप्न’ सियासत, सियासतदाँ और हुकूमत के स्याह पक्ष को उजागर करने वाली सशक्त रचना है ।आज़ादी के बाद से सपने, सब्जबाग दिखाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी बदस्तूर जारी है । बेशुमार ख़्वाबों का ताबीर में तब्दील होने के लम्बे इंतज़ार में आमजन की त्रासदी और उससे उपजी विडम्बनाओं , विसंगतियों से साक्षात्कार कराने वाली रचना है –‘एक ठेलास्वप्न’ । यद्यपि कथानक प्रतीकात्मक शैली में बड़े सलीके से प्रस्तुत हुआ है । लेकिन चित्तरंजन की यह शैली कथ्य को दुरूह नहीं करती । यहां दुर्बोधतता की कोई जगह नहीं । बोधगम्य और संप्रेषणीय प्रतीक का प्रयोग रचना को जीवंत बनाकर प्रभावोत्पादकता सृजित करता है । कहा जाता है कि लघुकथा में थोड़ा कहा और ज़्यादा अनकहा होना चाहिए । मगर शर्त यह है कि ये अनकहा पूरी तरह से संप्रेषित होकर पाठकों के मर्म को स्पर्श कर ले । इस मानक पर इसे परख कर देखें तो प्रतीकात्मक शैली में लिखी गई यह एक उत्कृष्ट रचना है ।
मूलभूत सुविधाओं से वंचित आश्वासनों ,प्रलोभनों,वादों के सुनहरे भ्रमजाल में फँसे आमजन के बीच तिजारती मंसूबों को अमलीजामा पहनाने के इरादे से मोहताजियों की बस्ती में किस्म-किस्म के सपनों को ठेले में सजाकर पहुंचा ठेलेवाला और माइक में तिजारती घोषणा करने वाला साथी उन हुक्मरानों की भूमिका में हैं जो ‘सपनों और भूख ‘ की राजनीति करते हुए सिर्फ और सिर्फ छलनेका ‘काम’ किया है ।सच तो यह है कि इस रचना में प्रतीकात्मकता और भावात्मकता का सुखद और जायकेदार सम्मिश्रण है । अगर कहा जाय कि यह लघुकथा उपयुक्त प्रतीक- योजना , प्रभावकारी कथा-भाषा , जीवंत दृश्य-संयोजन वाली उत्कृष्ट कथा-रचना है तो गलत नहीं होगा ।
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1-और हाथी रो रहा था
छात्र संघ के आव्हान पर शहर पूरी तरह बंद था । सड़कों पर पुलिस की गश्ती गाड़ियों के अलावा हाकिम-हुक्का और गिने-चुने अति विशिष्ट लोगों की गाड़ियाँ दौड़-भाग रही थीं। बंद समर्थक छात्रों की टोलियाँ अपनी इस सफलता पर इठला रही थीं। रोज कमाने-खाने वाले उदास चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।
जन –जीवन पूरी तरह ठप्प था ।
दिहाड़ी मजदूर रमजानी चूडा-गुड़ खाकरअपनी झोंपड़ी में ज़मीन पर लेटा ऊपर देख रहा था । खपरैल छत से छनकार धूप के छोटे-छोटे टुकड़े उसके बदन पर यहाँ-वहाँ पड़ रहे थे । थोड़ी देर बाद धूप का एक नटखट नन्हा _सा टुकड़ा उसकी बाईं आँख पर आ गिरा ,तो उसकी शरारत से बचने के लिए उसने करवट बदल ली । नींद में कुछ अच्छे ख्वाब देखने की सोच ही रहा था कि तभी मुन्नू दौड़ता हुआ अन्दर आया और उसे झिंझोड़ते हुए बोला , “।अब्बा,हाथी वाला आया है।”
“अरे, आया है ,तो हम का करें ? जा, जाके देख ।” वह बगैर पलटे ही झुँझलाया।
“अब्बा, हम भी हाथी पर बैठेंगे , पैसा दो ।”
“पैसा नहीं है बाप ।” वह खिसियाया हुआ उठ बैठा और मुन्नू के आगे अपने झलंग कुरते की फटी जेबें उलट दीं ।
“ नां$$, आँ…नां , हम हाथी पर बैठेंगे , पैसा दो अब्बा , पैसा दो न ।” मुन्नू ने जिद्दी बच्चे की तरह ठुनकना शुरू कर दिया । उसकी इस हरकत पर रमजानी को गुस्सा आ गया । उसने मुन्नू का हाथ पकड़ा और लगभग घसीटता हुआ उसे दरवाजे पर ला खड़ा किया , “हाथी देख ले ई जनम में , ऊ जनम में बैठ लेना …समझा। खाने का ठिकाने नहीं है और हथिए पर चढ़ेगा साला … चुपचाप हिंये पर खड़ा रहो नई तो बतिसिए झाड़ देंगे अभी …” गुस्से में काँपता हुआ वह अन्दर आ गया ।
मुन्नू अपने बाप का तेवर देखकर सहम गया था और गुम-सुम सा अपने दरवाजे के पास से मस्त हाथी को देखता रहा था एक टक । कॉलोनी के साफ़-सुथरे बच्चे हाथी की पीठ पर बैठे चहक रहे थे । उनके मां-बाप की आँखें भी चमक रही थी ।
थोड़ी देर बाद हाथी चला गया । तमाम साफ़-सुथरे बच्चे थोड़ी देर तक दूसरे खेलों में मस्त रहे फिर अपने-अपने ठिकाने के हो लिए ।
सड़क सुनसान थी और भोजन का समय था ।
मुन्नू सुनसान सड़क को निहारते-निहारते थक गया तो हारकर झोंपड़ी के अन्दर आ गया । रमजानी अब भी दीवार की ओर मुँह करके लेटा –पड़ा था। मुन्नू चुपचाप दीवार से टेक लगाकर बैठ गया और कच्चे फर्श पर बेमतलब आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने लगा । रमजानी ने हौले से पलटकर देखा , अपने बेटे को इस तरह इतना उदास बैठा देखकर उसे गहरी चोट लगी । वह तिलमिला गया । किसी तरह वह अपनी जगह से उठा और हाथी बनकर झूमता –झामता अचानक मुन्नू के एकदम सामने आ गया । उदास मुन्नू उसे हाथी बना देखकर खिल उठा और चिड़िया की तरह फुदकता हुआ उसकी पीठ पर बैठकर चहकने लगा , “ चल मेरे हाथी पटना चल , चल मेरे हाथी दिल्ली चल, ज़ल्दी चल , ज़ल्दी चल …चल मेरे हाथी ।”
हाथी मुन्नू को पीठ पर बिठाए झोंपड़ी के अन्दर चक्कर काट रहा था । मुन्नू के होंठों पर हंसी थी और हाथी रो रहा था ।***
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2-एक ठेला स्वप्न
आज ठूँस –ठूँसकर खाना खा लिया था ,इसलिए पलंग पर लेट गया था। लेटे-लेटे खिड़की से बाहर का नज़ारादेखने लगा
एक फेरीवाला आया था । वह एक बड़े ठेले पर एक ठेला स्वप्न लाया था। उसकासाथी माइक पर घोषणा कर रहा था , “ले लो , ले लो अच्छे –अच्छे स्वप्न ले लो ! चौबीस घंटे पानी- बिजली का स्वप्न । हर घर में ए.सी का स्वप्न । घर –घर मोटर कार का स्वप्न ।…..ले लो भाई ,ले लो !”
देखते-देखते कॉलोनी वालों की भीड़ लग गई । औरत –मर्द, जवान –बूढ़े सब ठेले के चारों तरफ जमा हो गए । माइक पर घोषणा जारी थी , “ले लो भाइयों , ले लो ! बेटे –बेटियोंको अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने का स्वप्न । उन्हें डॉक्टर –इंजीनियर बनाने का स्वप्न । आइ.ए.एस – आइ. पी.एस बनाने का स्वप्न । हजारों तरह के स्वप्न हैं। अच्छे-अच्छे स्वप्नहैं। ले लो भाईयों , ले लो !”
माइक की आवाज़ बगल के आदिवासी गाँव चौड़ाईनाला तक पहुँच रही थी । आदिवासी महिला-पुरुष का एक झुंड दौड़ा-दौड़ा आया । वे ठेले से कुछ दूरी पर खड़े हो गए । एकबूढ़ा जो लाठी के सहारे चल रहा था , सामने आया । उसने फेरीवाले से पूछा , “भूखल लोकेकेर*** खातिर किछु स्वप्न होय कि बाबू ?”(भूखे लोगों के लिए कोई स्वप्न है ?)
“नहीं।” फेरीवाले ने कहा , “भूखे लोगों के लिए भोजन के दो-चार स्वप्न हैं जो काफी नीचे दबे पड़े हैं ।अगली बार जब आऊंगा ऊपर करके लाऊंगा । तब तक इंतज़ार कीजिए।”
“इंतजार करैत –करैत त आज उनसत्तर बछर (69) उम्र भैय गेले । आर कते… ?” कहते-कहते बूढ़े को खांसी आ गई और खांसते-खांसते वह अपने झुंड के पास चला गया । कॉलोनी वाले अपनी –अपनी पसंद के स्वप्न खरीद रहे थे । हो-हुल्लड़ , हंसी-ठहाका भी चल रहा था । आदिवासियों ने कुछ देर तक इस नज़ारे को खड़े-खड़े देखा और अपने गांव की ओर चल दिए।
-0-अपर बेनियासोल , पो. आद्रा, जि. पुरुलिया, पश्चिम बंगाल 723121 , mo. 9800940477
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