लघुकथा के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह एक क्षण का चित्र प्रस्तुत करती है; परन्तु मेरा मानना है कि लघुकथा केवल किसी क्षण की उपलब्धि मात्र नहीं है, अपितु यह तो दीर्घ साधना की उपलब्धि हैं। ‘कुकनूस’ के आविर्भाव के पार्श्व में कुछ घटनाएँ और कुछ कल्पना है, जिनकी कतरब्योंत से लघुकथा का प्रस्तुत रूप अस्तित्त्व में आया। तो आइए ‘कुकनूस’ से रू-ब-रू होते है:
हमारा घर पटियाला शहर के बीचों-बीच घनी आबादी वाले मुहल्ले में स्थित है। जहाँ आस-पड़ोस के सभी लोग एक-दूसरे दुःख-सुख के साथी है और प्रेमपूर्वक मिलजुल कर रहते हैं।
नगभग 17-18 वर्ष पुरानी बात है। मेरी तीन- साढ़े तीन वर्षीय भतीजी रश्मि, तो परे मुहल्ले की दुलारी थी, मुहल्ले के एक बावाऊर्जी की विशेष प्रिय थी। वह जब भी उन बाऊजी को देखती ती उन्हें ‘ओए-होए ‘-कहकर पुकारती, जवाब में बाऊजी भी उसे दो- तीन बार ‘ ओए- होय’ कहते, जिसे सुनकर वह बहुत प्रसन्न होती और बाऊजी भी हँस देते थे। यह सिलसिला दो-तीन महीनों से अनवरत चल रहा था। एक बार बाऊजी किसी कारणवश शहर से बाहर गए हुए थे और दो-तीन दिन बाद घर लौटै थे। रश्मि दो दिनों से बीमार थी। घर लौटते ही किसी कारण बाऊजी की अपने घरवालों से बहस हो गई,चूँकि बाऊजी गुस्सैल स्वभाव के थे, लिहाजा वह बहुत ऊँची आवाज में चिल्ला रहे थे। बाऊजी की आवाज जैसे ही रश्मि के कानों में पड़ी, तो वह उठकर सीधे बाऊजी के घर पहुँच गई और उन्हें देखते ही धीरे-से बोली-‘ओए-होए’। रश्मि को देखते ही बाऊजी के गुस्से के जलते तवे पर मानों शीतल जल के ठंडे छींटे गिर पड़े और वह अपना गुस्सा भूलकर रश्मि को ‘ओए-होए’, ‘ ओए-होए’ कहते हुए खिलखिला पड़े। घर का माहौल जून की तपती दोपहर से अक्तूबर की गुलाबी सर्द शाम-सा खिल उठा। यह घटना मेरे जेहन में अंकित हो चुकी थी।
शादी के आठ वर्ष बाद हमारे सूने घर में बेटे रोहित की किलकारियाँ गूँजी। बेटे का जन्म हॉस्पिटल में हुआ था। जच्चा-बच्चा का ध्यान रखने के लिए मुझ समेत घर के दो-तीन सदस्य हॉस्पिटल में ही रहते थे। मेरा एक बड़ा बड़ा भाई अपना काम-धाम छोड़कर लगातार 15 दिन हॉस्पिटल में ही रहा। उसे रोहित से बहुत स्नेह है। जैसे-जैसे रोहित बड़ा होता गया, उनका स्नेह और भी प्रगाढ़ होता गया। मैंने अक्सर देखा कि रोहित उनका बहुत ध्यान रखता था । जैसे-ही उनकी आवाज़ सुनता सबकुछ छोड़कर उनके पास चला जाता आता। वह भी रोहित से ऐसा व्यवहार करते जैसे उसके ताऊ न होकर उसके सहचर हों । रोहित की छोटी से-छोटी बात का वह बहुत ध्यान रखते। पार्क में घूमने जाना क्रिकेट खेलना हो यो कोई टूटा खिलौना ठीक करवाना हो सब कुछ छोड़कर रोहित के बताए काम जुट जाते। अब तो हालात यह है कि रोहित अपने ताऊ के विरुद्ध कोई बात सुनना तक भी गवारा नहीं करता।
रोहित जब ढ़ाई वर्ष का था, तब उसे प्ले-प्ले स्कूल में भेजा गया। स्कूल में वैसे तो कई टीचर्स थे ,जो बच्चों को बड़े प्यार से रखते थे; पर मैंने नोट किया कि रोहित समेत सभी बच्चे टीचर्ज़ की अपेक्षा वहाँ काम करने वाली ‘आंटी ‘ से विशेष स्नेह रखते । वह बच्चे हमेशा आंटी के साथ खेलना पसन्द करते और वह आण्टी भी साथ बच्चों का बहुत ध्यान रखती ; जैसे बच्चों को टॉयलेट ले जाना, उनकी साफ़-सफ़ाई इत्यादि कार्य प्रसन्नतापूर्वक करती। किसी बच्चे की नाक आदि बहता देखकर जहाँ टीचर्स नाक -भौं सिकोड़ते और बच्चों को डॉट भी देते, वहीं ‘आंटी’ बिना डॉटे, प्रेमपूर्वक बच्चों च्चे कोइ नाक वगैरह पोंछती। लंच में बच्चों को टिफ़िन खोलकर देना और खाते समय उनके हाथ और मुँह पोंछते समय उसकी आँखों में एक संतोष दिखाई देता। एक बार हमने देखा कि रोहित पिछले कुछ समय से स्कूल जाने में आनाकानी करने लगा था। छूट्टी के बाद जब घर वा स्कूल जाने मे और ला कि अब छुट्टी के बाद जब घर वापिस आता तो उदास-सा रहता और कहता कि अब स्कूल नहीं जाएगा। जब॒ स्कूल जाकर इस बाबत पूछताछ की तो पता चला कि रोहित ही नही और भी बच्चे ऐसा ही कर रहे है, क्योंकि ‘आंटी’ अपने पति के स्थानांतरण की वजह से स्कूल छोड़ गई थी।
उपर्युक्त तीनों घटनाएँ कई वर्षों से मेरे मन-मस्तिष्क में गहनता से अंकित थी। मेरे पास घटना रूपी कच्चा माल तो था, अब उसे लघुकथा, अब उसे लघुकथा में ढालना था यानी अब इन अनुभूत किए हुए अनुभवों को अभिव्यकत करना था। मैंने इसके तीन-चार ड्राफ़्ट लिखे परन्तु मेरी संतुष्टि नहीं हुई। लेखन आत्माभिव्यक्ति है, परन्तु उपर्युक्त तीनों घटनाओं से प्रात हृदयानुभूति की अभिव्यक्ति नहीं हो पा रही ; क्योंकि स्वानुभूति के कुछ अंश अभिव्यक्ति के टकसाली साँचे में नहीं ढल पा रहे थे ।
अनावश्यक विस्तार और अपने अंतर के भावों को यथार्थ रूप में प्रकाशित न करने की अभिलाषा के फलस्वरूप हृदय में उमड़े भाव बाहर आने के लिए उद्वेलित हो रहे थे। इसी बीच मुझे हिन्दी लघुकथा के मूर्धन्य हस्ताक्षर सुकेश साहनी की कुछ प्रतीकात्मक तघुकथाएँ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सुकेश साहनी अपने एक आलेख में ‘मेरी लघुकथा-यात्रा’ में एक स्थान पर लिखते हैं- “राजेन्द्र यादव लघुकथा को एक कठिन विधा मानते थे । लघुकथा के यान्त्रिक लेख से उन्हें चिढ़ थी। मेरी प्रतीकात्मक रचनाएँ उन्हीं की देन हैं” बस! फिर क्या था, मुझे एक दिशा मिल गई। मैने लघुकथा प्रतीकों में लिखने का फैसला किया ; क्योंकि प्रतीकों में संक्षिप्तीकरण की प्रवृत्ति होती है, जिस कारण गूढ़ व सूक्ष्म विचार और अनुभूतियों को संक्षिप्त रूप में प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है, इसलिए ही प्रतीकों को व्यष्टि में समष्टि के सम्पोषण से अभिहित किया जाता है। प्रस्तुत लघुकथा में मैंने क्रमश रश्मि , रोहित और प्ले-स्कूल के बच्चों को कबूतरों के रूप में लिया है। कबूतर बच्चों के जैसे ही अबोध और मासूम होते हैं। बाऊजी , रोहित के ताऊ और प्ले-स्कूल की आंटी को लघुकथा के केन्द्रीय पात्र ‘वह’ के प्रतीक रूप में लिया है। स्कूल टीचर्ज तथा स्कूल के अन्य स्टाफ़ मेम्बर्स को दरबान व पर्यटकों के रूप में चित्रित किया है, इनको बच्चों से कोई लगाव नहीं है, इनके अपने-अपने ही निहित स्वार्थ हैं। ‘वह’ को मुफ़िलस दिखाने का आशय केवल यही था कि बच्चे, जो कि भगवान का रूप होते हैं, बाह्य चमक-दमक के आवरण से प्रभावित नहीं होते। बच्चे तो उससे प्रभावित होते हैं, जो अंदर से स्वयं बच्चा हो। अगर (भगवान स्वरूप) बच्चों का स्नेह पाना है, तो बच्चों के संग बच्चा बनना पड़ेगा अर्थात् छद्म वेष-व्यापार का त्याग करना पड़ेगा, तभी बच्चों (भगवान) को पाया जा सकेगा। लघुकथा के प्रस्तुत रूप से अब संतुष्टि हो गई थी, क्योंकि प्रतीकों का बल पाकर भाषा में नई अर्थशक्ति एवं अभिव्यक्ति में मनोहरता की गंध महसूस हो रही थी।
अब बारी थी लघुकथा के शीर्षक चयन की। भालचंद्र गोस्वामी के अनुसार, ‘शीर्षक का अर्थ यही होता है कि कहानी भर में प्राप्त होने वाली घटना को एक-दो शब्दों में गुम्फित कर दिया जाए और इसका उद्देश्य पाठक के लिए उन एक दो शब्दों में कहानी की रूपरेखा उपस्थित कर देना होता है।’ पहले इसका शीर्षक ‘पानी’ रखा। पानी पारदर्शी होता है, जिसके आर- पार आसानी से देखा जा सकता है। लघुकथा के केन्द्रीय पात्र ‘वह’ का निश्छल स्वभाव भी पानी जैसा पारदर्शी है, जिसे किसी के साथ कोई ईर्ष्या द्वेष नहीं है। पानी में जीवनदायी गुण होते हैं, जिनके अभाव में जीना संभव ही नहीं है। जैसे कि लघुकथा के केन्द्रीय भाव ‘प्यार’ अथवा ‘स्नेह’ के अभाव में जीवन व्यतीत करना भी दुष्कर है। शीर्षक के संदर्भ में कुछ चिंतन-मंथन फिर से किया। जिसके परिणतिस्वरूप शीर्षक ‘कुकनूस’ का आविर्भाव हुआ। ‘कुकनूस’ जिसे हिन्दी में ‘अमरपक्षी’ और अंग्रेजी में ‘फ्रीनिक्स’ कहा जाता है एक मिथक पक्षी है, जिसका उल्लेख प्राचीन यूनानी ग्रंथों में मिलता है। इस पक्षी की विशेषता है कि यह मरने के बाद अपनी राख से पुनः जीवन प्राप्त कर लेता है। इसका रोना तक शुभ माना जाता है और इसके आँसू से नासूर तक ठीक हो जाते हैं। ‘प्यार’ सरीखी पवित्र भावना भी कभी नहीं मरती है और इसमें किसी भी ज़ख़्म को ठीक करने की शक्ति होती है। इस प्रकार ‘कुकनूस’ शीर्षक का आकर्ष्ण जहाँ लघुकथा के अंत तक बना रहता है, और इसकी सिद्धि भी लघुकथा के अंत में जाकर होती है।
( लघुकथा कलश जुलाई -दिसम्बर 2019 से साभार)