सितम्बर 2026

देशयादों का बैंक     Posted: September 1, 2026

शहर में एक नया बैंक खुला—’यादों का बैंक’। यहाँ लोग पैसे नहीं, अपनी यादें जमा करते थे। खुशियों की यादों पर अच्छा ब्याज मिलता था, जबकि दुखद यादें हटाने के लिए लोग फीस देते थे।

एक दिन पचपन वर्षीय अजित वहाँ पहुँचा। उसने अपनी सबसे प्रिय याद जमा करने का फ़ॉर्म भरा। कर्मचारी ने पूछा, “कौन-सी याद?”

अजित मुस्कुराया, “वह दिन, जब मेरा पाँच साल का बेटा पहली बार साइकिल चलाते हुए गिर पड़ा था। रोते-रोते फिर उठा और बोला—‘पापा, मैं हारूँगा नहीं।”

कर्मचारी चौंका, “इतनी प्यारी याद क्यों जमा करना चाहते हैं? इस पर तो आपको अच्छा लाभ मिलेगा।”

अजित ने धीमे स्वर में कहा, “इसीलिए। मेरा बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी याद हर दिन मुझे रुलाती है।”

याद बैंक की मशीन ने स्मृति को उसके मन से निकाल लिया। अजित हल्का महसूस करने लगा।

कुछ महीनों बाद वह फिर बैंक पहुँचा। इस बार उसके चेहरे पर बेचैनी थी।

“मुझे अपनी जमा की हुई याद वापस चाहिए,” उसने कहा।

“लेकिन क्यों? आपने तो दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसे जमा किया था।”

अजित की आँखें भर आईं।

“दर्द चला गया, पर उसके साथ मेरा बेटा भी चला गया। अब मैं रोता नहीं, लेकिन मुस्कुराता भी नहीं। समझ आया कि कुछ दुख बोझ नहीं होते, वे हमारे अपनों के आख़िरी निशान होते हैं।”

बैंक ने उसकी याद लौटा दी।

बाहर निकलते समय अजित की आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर मुस्कान भी। उसे पहली बार लगा कि हर घाव भर जाना ज़रूरी नहीं; कुछ घाव ही हमें इंसान बनाए रखते हैं।

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