अचानक पिताजी ने जाने की घोषणा कर दी, फिर उन्होंने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया और एक छोटे बक्से में सामान सहेज–सहेजकर रखने लगे। ऐसा अक्सर ही होता है कि पिताजी एकाध माह रहकर जाने की अचानक घोषणा कर देते हैं। शुरू–शुरू में मैं चौंकता था; किन्तु अब कोई आश्चर्य नहीं होता। जब तक माँ थी, पिताजी ने गाँव नहीं छोड़ा था, किन्तु माँ के गुजर जाने के बाद वे तीनों बेटों के यहाँ कुछ–कुछ रहकर दिन बिताने लगे।
‘‘तो क्या आज ही निकल जाएँगे ?’’ मैने पूछा।
‘‘हाँ।’’ वे बोले।
‘‘एकाध दिन और रुक जाते।’’
‘‘नहीं, अब नहीं रुकूँगा…. जाऊँगा ही ….. काफी दिन रह लिया।’’
‘‘हाँ…. मँझला भी राह देख रहा होगा।’’ मैं कहता हूँ।
‘‘मँझले के यहां नहीं जाऊँगा…. सोचता हूँ कि अब गाँव निकल जाऊँ। वहीं रहूँ।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘अब जीवन के आखिरी दिनों में यह अच्छा नहीं लगता कि एकाध महीने रहकर तेरे यहाँ से मँझले के यहाँ….. मँझले के यहाँ से छोटे के यहाँ….. और फिर तेरे यहाँ….. जैसे कि एक पारी–सी बँधी हुई हो….’’ पिताजी कह रहे थे…. मैं चुपचाप था. एक सन्नाटा –सा खिंच आया था मेरे और पिताजी के मध्य…।
-0-