अनुवाद:गढ़वाली -डॉ. कविता भट्ट

आज रात देर कुछ ज्यादा इ ह्वे गे छै, रामदीन चौक माँ बैठी की सामणी की हवेली देखि कि जळणु छौ, वा वे का घौर से भौत बड़ी छै और वीं की पाळी बि ऊँच्ची अर पक्की छै। इतगा देरम हवेली क भैर एक कार ऐकि रुकी, वीं मन हवेली की मालकिन लंग्ड़ादी लंगड़ादु, अस्त-व्यस्त झुल्लौ माँ भैर निकली, कार वीं भैर ई छोड़ीक अग्नै चली गे।
यु देखिक रामदीन हल्कु- सी चौंकी पर , वे तैं अब अपड़ा घौरै की कच्ची पाळी जादा मज़बूत अर ऊँच्ची दिखेण लगी गे छै।
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