जून 2026

दस्तावेज़मेरी लघुकथा- यात्रा: मधुदीप     Posted: January 1, 2025

चार दशक की लघुकथा-यात्रा को कुछ ही पृष्ठों में समेटना असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य है। मेरी यह यात्रा दो भागों में बँटी हुई है। इसका पहला भाग 1995 में मेरे लघुकथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ की भूमिका में ‘रूबरू’ के रूप में लिखा गया था और दूसरा भाग 20 वर्ष बाद अब लिखा जा रहा है।

 पाठक रचनाओं के माध्यम से ही रचनाकार से परिचित होता है, मगर रचनाओं के अतिरिक्त वह रचनाकार की कथा-यात्रा, लेखन-प्रक्रिया एवं उसके दूसरे पहलुओं को भी जानना-समझना चाहता है। ऐसा एहसास मुझे कई बार स्वयं भी हुआ है और मित्र पाठकों द्वारा भी करवाया गया है।

 यह शायद सन् 1976 की बात है। भाई गौरीनन्दन सिंघल, महावीर प्रसाद जैन, नरेशचन्द्र जैन, राजा नरेन्द्र (अब कुमार नरेन्द्र) और हरिशंकर शर्मा के साथ ‘प्रतिभा’ पत्रिका निकालने की योजना धीरे-धीरे, मगर पूरी गम्भीरता के साथ मूर्त रूप लेने जा रही थी। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का प्रश्न उन दिनों पूरी शिद्दत के साथ हवा में था। अभी-अभी इमरजेन्सी समाप्त हुई थी। पहले रोटी या पहले अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता-यह उन दिनों बुद्धिजीवियों में चर्चा का प्रमुख विषय था। अन्य पढ़ने-लिखनेवालों की तरह गौरीनन्दन सिंघल इस मुद्दे को लेकर बहुत गम्भीर थे कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को समाप्त करके रोटी प्रदान करने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हम सभी साथियों का उनकी इस बात से पूरा इत्तफाक था और इसी कारण से हम एक मंच पर एकत्रित हुए थे और ‘प्रतिभा’ त्रैमासिकी के प्रकाशन का निर्णय लिया गया था, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के विचार को ऊर्जावान स्वर प्रदान किया जा सके। पत्रिका के प्रवेशांक में ही इस विषय पर गम्भीर चर्चा प्रारम्भ करके विचार आमन्त्रित किए गए थे।

 …यही वह समय था, जबकि मैं पहली बार ‘लघुकथा-एक स्वतन्त्र विधा’ के विचार से अवगत थे। उनकी एक रचना थी ‘घुटन’ । वे इस रचना को लघुकथा का नाम दिया करते थे। यह और बात है कि उन्होंने उस रचना को कहानी के रूप में भी काशित करवाया था और एक उलझन पैदा कर दी थी। ‘घुटन’ को देख-पढ़कर मैं मात्र इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि लघुकथा छोटी कहानी को कहते हैं, लेकिन मेरा यह निष्कर्ष कतई गलत था। बाद में जैसे-जैसे मैं इस विधा की गहराई में जाता गया, मैंने यह जाना कि लघुकथा तो अलग तरह की ही रचना है और इसकी संरचना का गद्य साहित्य में कहानी से इतर एक अलग अस्तित्व है। दरअसल उन्हीं दिनों लघुकहानी और लघुकथा का विवाद भी हवा में था और यह विवाद किसी भी उस रचनाकार को भटका सकता था, जो कि एक प्रशिक्षु की भाँति नया-नया इस विधा से परिचित हो रहा था। सारिका में प्रकाशित लघुकथाओं को पढ़कर एवं प्रतिभा प्रेस में महावीर प्रसाद जैन, जगदीश कश्यप, मोहन राजेश एवं अन्य वरिष्ठ साथियों के साथ हुई चर्चा-परिचर्चाओं से मेरे मस्तिष्क में भी यह विधा रूपाकार ग्रहण करने लगी थी। उन्हीं दिनों पृथ्वीराज अरोड़ा, सिमर सदोष, रमेश बतरा, भगीरथ, कृष्ण कमलेश, बलराम, भगवान प्रियभाषी, कमलेश भारतीय, राजकुमार गौतम, बलराम अग्रवाल, विक्रम सोनी, शकुन्तला किरण व अनेक और लघुकथाकार इस विधा को स्थापित करने के लिए महती प्रयास कर रहे थे। इन्दौर से प्रकाशित वीणा पत्रिका के माध्यम से भाई सतीश दुबे और श्यामसुन्दर व्यास इस विधा के लिए स्वयं को समर्पित किए हुए थे। अम्बाला छावनी (हरियाणा) से डॉ. महाराजकृष्ण जैन, ‘तारिका’ के माध्यम से नए-नए लघुकथाकारों को सामने ला रहे थे।

 अपने से वरिष्ठ लघुकथाकारों की लघुकथाएँ एवं इस विधा पर उनके बहस-मुबाहिसे सुनकर जो पहली लघुकथा मैंने लिखी, वह थी – ‘अन्तर’ । तदुपरान्त ‘अस्तित्वहीन नहीं’, ‘हिस्से का दूध’, ‘इज्जत के लिए’ और ‘ट्यूशन’ लघुकथाएँ भी उसी दौरान लिखी गईं। इस समय तक मैं इतना तो समझ पाया था कि ये रचनाएँ उस समय तक के मान्य शिल्प के अनुसार लघुकथाएँ ही हैं, मगर जैसा कि हर दौर में होता है, गुटबन्दी और मेरे इस विधा में नया होने के कारण इनको पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया था। मैं लघुकथा के मैदान में नौसिखिया घुड़सवार था; हालाँकि इससे पूर्व मेरे तीन उपन्यास प्रकाशित हो चुके थे और कुछेक कहानियाँ भी। बहरहाल, संयोगवश मैंने अपनी दो-तीन लघुकथाएँ वीणा में प्रकाशन के लिए भिजवा दीं। शायद इन्दौर में गुटबन्दी इतनी भयानक नहीं थी, या फिर यह भाई सतीश दुबे का अतिरिक्त स्नेह था कि उन्होंने न केवल मेरी लघुकथाओं को सराहा; उन्हें वीणा में प्रकाशित किया अपितु मुझे और लघुकथाएँ लिखने के लिए भी प्रोत्साहित किया। मैं निःसंकोच स्वीकार करता हूँ कि मुझे इस विधा से परिचित कराने का श्रेय जहाँ महावीर प्रसाद को है, वहीं मुझे इस क्षेत्र में लाने का पूरा श्रेय भाई सतीश दुबे को ही जाता है। जहाँ वे स्वयं समर्थ लघुकथाकार हैं, वहीं उन्होंने वीणा के माध्यम से अनेक समर्थ लघुकथाकारों को पाठकों की अदालत में प्रस्तुत किया है।

 इसी मध्य इन्दौर के ही अपने एक और पुराने साथी राजेन्द्रकुमार शर्मा (स्व.) की याद आ रही है। शायद सन् 1978 की बात है, उन्होंने किसी अखबार के दीपावली-विशेषांक के लिए लघुकथा विधा पर लेखकों के विचार आमन्त्रित किए थे। उन्होंने मुझे भी प्रश्नावली भिजवाई थी, मगर उसमें यह स्पष्ट नहीं था कि वे उन प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर चाहते थे या विस्तृत । बहरहाल, मैंने उन प्रश्नों के आधार पर एक विस्तृत लेख ‘लघुकथा : एक विहंगम दृष्टि’ लिखा, जोकि अपने संक्षिप्त रूप में उस समय प्रकाशित हुआ। उनके प्रश्न इतने सटीक और इस विधा के सभी आयामों को छूते हुए थे कि उस समय उनके आधार पर जो लेख मैंने लिखा, वह आज भी सन्तुष्टि प्रदान करता है। यह लेख उस सबका निचोड़ था, जो मैंने उस समय तक लघुकथा के बारे में पढ़ा एवं समझा था।

सन् 1978 में ही लघुकथा के लिए जो महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ-वह था पंकज प्रकाशन के श्री सुभाष मल्होत्रा द्वारा ‘छोटी-बड़ी बातें’ का प्रकाशन। भाई महावीर प्रसाद जैन और जगदीश कश्यप ने इस संकलन को तैयार करने में बहुत ही निष्ठा से कार्य किया था। यह संग्रह मील का पत्थर साबित हुआ और इस संग्रह ने लघुकथा को एक स्वतन्त्र विधा के रूप में मान्यता प्रदान करवाने के लिए ठोस जमीन तैयार की। इस संकलन में उस समय के सभी पुरोधा लघुकथाकार संकलित थे। यह और बात है कि उस समय तक मुझे या मेरी लघुकथाओं को इस गुट द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था। यह वही समय था जबकि प्रतिभा प्रेस की बैठकों में लघुकथा को लेकर लम्बी-लम्बी बहसें हुआ करती थीं। ये सभी बहसें लघुकथा को लेकर मेरी समझ को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही थीं। भाई मोहन राजेश, जो उस समय इस विधा के एक सशक्त हस्ताक्षर थे, के योगदान को ‘छोटी-बड़ी बातें’ के सम्पादन के लिए स्वीकार किया जाना बहुत ही आवश्यक है। इसी बीच मैं भाई जगदीश प्रसाद सुपारीवाला (स्व.) को भी नहीं भुला पा रहा हूँ, जोकि हमारे बहस-मुबाहिसों के मध्य एकमात्र श्रोता हुआ करते थे और बहुत प्रसन्नता से हमारे खाने-पीने का प्रबन्ध बिना कहे ही कर दिया करते थे।

 सन् 1979 के मध्य तक आते-आते लघुकथाकार-मित्रों के मध्य मेरे परिचय का दायरा बढ़ता जा रहा था। राजा नरेन्द्र (कुमार नरेन्द्र) के साथ ही अब त्रिनगर में भाई रघुनन्दन शर्मा, अशोक जैन, सुरेन्द्र गोयल और कमल चोपड़ा के साथ लघुकथा पर चर्चा होने लगी थी। भाई अशोक जैन के कमरे में, छोटे-छोटे गिलासोंबेहतरीन चाय की चुस्कियाँ लेते हुए देर रात तक सार्थक और निरर्थक भी, में बाजियाँ हुआ करती थीं। उन्हीं दिनों भाई भगीरथ का भी दिल्ली आना होता रहता था और उनसे चर्चा करके हम बहुत कुछ जानने-समझने की कोशिना होता रहते थे। भगीरथ के माध्यम से ही मैंने सीखा कि बाण की तरह पैनापन होना लघुकथा में कितना अनिवार्य है और किस तरह लघुकथा विधा को सामाजिक अपचाय के विरुद्ध लड़ाई में हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

 पूरे देश के लघुकथाकारों से सम्पर्क बढ़ता जा रहा था। डॉ. स्वर्ण किरण, सुखवीर विश्वकर्मा, आनन्द दीवान, संजीव, राजकुमार गौतम, मनीषराय यादव (स्व); पुष्पलता कश्यप, जगवीर सिंह वर्मा, कुलदीप जैन, बलराम अग्रवाल, अशोककुमार खन्ना, मधुकान्त, प्रेम सिंह बरनालवी, सुनील कौशिश (स्व.), विकेश निझावन, सुरेन्द्र मन्थन, कृष्णशंकर भटनागर, गुलशन बालानी, विक्रम सोनी (स्व.), मालती महावर, निशा व्यास, अंजना अनिल, अर्चना अर्ची, हरनाम शर्मा, आजाद रामपुरी, सूर्यकान्त नागर, प्रभाकर आर्य, पारस दासोत, अशोक लव, सुकेश साहनी, रूप सिंह चन्देल, धीरेन्द्र शर्मा, हुमायूँ निसार, किशोर काबरा, श्रीराम मीना, हीरालाल नागर, सुभाष नीरव, फजल इमाम मलिक, जसबीर चावला व अनेक दूसरे मित्रों से लघुकथा के माध्यम से ही परिचय हुआ। भाई अशोक वर्मा मेरे साथ ही कार्यालय में कार्य करते थे और हम दोनों ही कार्यालय के समय को भी लघुकथा को लेकर बहसों में इस्तेमाल किया करते थे। वरिष्ठ रचनाकार शंकर पुणताम्बेकर की व्यंग्यधर्मी लघुकथाएँ भी उन दिनों खासी चर्चा में थीं, हालाँकि मैं लघुकथा में व्यंग्य की अनिवार्यता का कभी भी हामी नहीं रहा, मगर उनकी लघुकथाएँ प्रभावित तो करती ही थीं। भाई एस.एन. भार्गव ‘प्रतिबिम्ब’ के माध्यम से लघुकथा को पोष रहे थे और बाद में उन्होंने प्रतिबिम्ब का लघुकथा-विशेषांक भी दिया।

 ‘छोटी-बड़ी बातें’ के बाद मित्रों के कहे अनुसार यह आवश्यकता महसूस की जा रही थी कि चुनी हुई लघुकथाओं का एक और संकलन प्रकाशित करवाया जाए, ताकि जो जमीन पूर्व संकलन ने तैयार की थी उसका सही उपयोग किया जा सके। भाई प्रभाकर आर्य ‘युगदाह’ की तैयारी कर रहे थे और भाई सतीश दुबे ‘आठवें दशक की लघुकथाएँ’ की। इसी मध्य ‘तनी हुई मुट्ठियाँ’ का सम्पादन भाई मधुकान्त के साथ करने का सुयोग मुझे मिला। मेरा मन था कि उस संकलन में एक सौ लघुकथाकारों की दो-दो चर्चित लघुकथाएँ ली जा सकें। मगर इस संकलन में मात्र पचास लघुकथाकार ही लिए जा सके। कुछ वरिष्ठ साथियों से रचनात्मक सहयोग नहीं मिला और कुछ की विशेष शर्तें थीं कि इसे लिया जाए तो उसे नहीं और उसे लिया जाए तो इसे नहीं। मैं शर्तों पर काम करने में यकीन नहीं रखता था। नतीजा यह हुआ कि ‘तनी हुई मुट्ठियाँ’ नाम का जो लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुआ वह मेरी निगाहों में ही आधा-अधूरा था। कुछ करने का सन्तोष तो था, मगर मन-माफिक न किए जा सकने का अफसोस भी था। सन् 1980 के प्रारम्भ में जब यह संकलन प्रकाशित होकर लघुकथाकारों के समक्ष गया, तो इसकी प्रतिक्रिया चकित कर देनेवाली थी। रचनाकारों, सुधी पाठकों एवं समीक्षकों ने उसे हाथोंहाथ लिया था। मेरी आशा के विपरीत इस संकलन का भरपूर स्वागत हो रहा था। आज जब मैं पूरी गम्भीरता से सोचता हूँ तो मुझे उस भरपूर स्वागत का एक कारण समझ में आता है कि उस समय लघुकथा के संकलनों के प्रकाशित होने की महती आवश्यकता थी, ताकि इस विधा के आन्दोलन को बल मिल सके। यह वही समय था जबकि लघुकथाकार बन्धु लघुकथा को एक स्वतन्त्र विधा के रूप में स्थापित करवाने के लिए जी-जान से लगे हुए थे। लघुकथा और लघुकहानी का विवाद धुँधलाता जा रहा था। भाई बलराम ने स्वयं को इस विवाद से हटा लिया था। सभी साथी एकजुट होकर लघुकथा का शिल्प, उसकी भाषा और उसके तेवर तराशने में लगे हुए थे। उस समय जबकि लघुकथा के संकलन का प्रकाशन किया जाना प्रकाशक बन्धु लाभप्रद नहीं मानते थे, तब श्री मदनलाल शर्मा (स्व.) इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन ने ‘तनी हुई मुट्ठियाँ’ का प्रकाशन करके सराहनीय कार्य किया था।

सन् 1980 में जब राजा नरेन्द्र (कुमार नरेन्द्र) के साथ दिशा प्रकाशन प्रारम्भ करने की योजना बन रही थी, उस समय मेरे मन में एक बात बिलकुल साफ थी कि इस प्रकाशन में लघुकथा की पुस्तकों को प्रकाशित करने को तरजीह दी जाएगी। दिशा प्रकाशन से चार पुस्तकों का जो पहला सैट प्रकाशित किया गया, उसमें राजा नरेन्द्र द्वारा सम्पादित लघुकथा-संकलन ‘बोलते हाशिए’ भी था। इस संकलन में सत्रह लघुकथाकारों की पिचासी लघुकथाएँ तो थीं ही, साथ ही प्रत्येक लघुकथाकार का इस विधा पर एक महत्त्वपूर्ण वक्तव्य भी था। इस संकलन के तुरन्त बाद ही सुशील राजेश के सम्पादन में हरियाणा के चर्चित लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संकलन ‘अक्षरों का विद्रोह’ प्रकाशित किया गया। इसी संकलन के माध्यम से मेरा परिचय अशोक भाटिया से हुआ, जोकि एक समर्थ लघुकथाकार तो हैं ही, इन्होंने लघुकथा के विचार-पक्ष पर भी निरन्तर लिखकर उसे मजबूती प्रदान की है। ‘श्रेष्ठ पंजाबी लघुकथाएँ’ का सम्पादन करके उन्होंने दूसरी भाषा की सशक्त लघुकथाओं से भी हिन्दी के पाठकों को अवगत करवाया है।

 दिशा प्रकाशन के माध्यम से ही सन् 1982 में वरिष्ठ कथाकार श्री विष्णु प्रभाकर की चुनिन्दा लघुकथाओं का संग्रह ‘आपकी कृपा है’ प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक में ‘दो शब्द’ के बहाने से वरिष्ठ कथाकार ने इस विधा के बारे में बहुत ही गम्भीर बातें कही हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जिस तरह एकांकी को लेकर विरोध धीरे-धीरे समाप्त हुआ, उसी तरह लघुकथा को एक स्वतन्त्र विधा के रूप यालाल मिश्र प्रभाकर (स्व.) की लघुकथाओं का संग्रह दिशा प्रकाशन से छापने का मेरा बहुत मन था, मगर उसे क्रियान्वित न किया जा सका। श्री रावी की परे कागुरु का कहना है’ में प्रकाशित रचनाओं को लघुकथाएँ माना जाए या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है, मगर खलील जिब्रान की विचार-प्रधान रचनाओं की तरह ही उनकी रचनाओं ने भी लघुकथा के लिए ठोस जमीन तो तैयार की ही है। इन वरिष्ठ कथाकारों की पुस्तकें भी दिशा प्रकाशन में छापने का मेरा मन रहा है। अपने साथी लघुकथाकारों के एकल लघुकथा-संग्रह जो दिशा ने प्रकाशित किए, उनमें ‘मेरी सौ लघुकथाएँ’ (प्रबोधकुमार गोविल), ‘बहुत बड़ा सवाल’ (प्रेम सिंह बरनालवी), ‘भीड़ में खोया आदमी’ तथा ‘राजा भी लाचार है’ (सतीश दुबे) तथा ‘खाते बोलते हैं’ (अशोक वर्मा) उल्लेखनीय हैं। पुरस्कृत लघुकथाओं का लघुकथा-संकलन ‘संघर्ष’ महेन्द्र सिंह महलान और अंजना अनिल के सम्पादन में प्रकाशित किया गया। दिशा प्रकाशन में ही मैंने दो पुस्तकें ‘दूसरी आत्महत्या’ (राजकुमार गौतम) और ‘हिस्से का दूध’ (मधुदीप) भी प्रकाशित कीं, जिनमें लघुकथाएँ और कहानियाँ साथ-साथ दी गईं ताकि पाठक दोनों विधाओं की रचनाओं को एक साथ पढ़ते हुए उनकी भाषा, शिल्प, कथानक व रचना-प्रक्रिया के अन्तर को जान सकें, महसूस कर सकें।

नौवें दशक का पूर्वार्द्ध समाप्त हो रहा था। लघुकथा पर छाए संशय के बादल छँट रहे थे। राजस्थान से शकुन्तला ‘किरण’ ने इस विधा पर 1981 में सर्वप्रथम शोधकार्य प्रस्तुत करके पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त कर ली थी। नौजवान लघुकथाकारों के अथक प्रयासों ने इस विधा के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार करवा लिया था। 1982 में शमीम शर्मा ‘हस्ताक्षर’ लघुकथा-संकलन का सम्पादन कर महत्त्वपूर्ण कार्य कर चुकी थीं। इस संकलन में छह सौ बीस लघुकथाकारों के नाम व पते भी संकलित थे। लघुकथाकारों के लिए आपस में सम्पर्क करना उसके माध्यम से आसान हो गया था। भाई सतीशराज पुष्करणा ने 1983 में ‘लघुकथा : बहस के चौराहे पर’ के माध्यम से इस विधा के विचार-पक्ष पर अब तक लिखे गए लेखों को एक साथ देकर महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। हाँ, 1984 में ही मेरे साथी लघुकथाकार भाई मधुकान्त का एकल लघुकथा-संग्रह ‘तरकश’ भी आया था। अब तो भाई बलराम के सम्पादन में ‘हिन्दी लघुकथा कोश’ और ‘भारतीय लघुकथा कोश’ के साथ ही ‘विश्व लघुकथा कोश’ भी आ चुका है। भाई बलराम ने जो अथक प्रयास इस विधा को स्थापित करने के लिए किए, वे कभी भुलाए नहीं जा सकेंगे। ‘विश्व लघुकथा कोश’ के प्रकाशन के उपरान्त अब यह प्रश्न कि लघुकथा एक स्वतन्त्र विधा है या नहीं, और उससे जुड़ी बहसें कतई निरर्थक हो चुकी हैं। लघुकथा को झुठलाना ठीक उसी तरह होगा, जैसे कि कोई उदित हो चुके सूर्य के अस्तित्व को ही नकार दे।

 सन् 1987 में जब ‘पड़ाव और पड़ताल’ संकलन की रूपरेखा तैयार की जा रही थी, तो मन में एक विचार था कि अब वह समय आ गया है जबकि लघुकथाकारों को थोड़ा ठहरकर गम्भीरतापूर्वक यह विचार करना होगा कि वे किस दिशा में जा रहे हैं। जो कुछ लिखा जा चुका था या लिखा जा रहा था, उसकी पड़ताल आवश्यक थी। मेरा मानना था कि इस पड़ताल से लघुकथा का स्वरूप, विकास और भावी दिशा बिलकुल स्पष्ट होकर सामने आ सकेंगे। ‘पड़ाव और पड़ताल’ एक शृंखलाबद्ध किया जानेवाला कार्य था, मगर इसकी एक कड़ी के बाद इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका। साधनों के अभाव के साथ ही दूसरे भी बहुत-से कारण इसके पीछे रहे। ‘पड़ाव और पड़ताल’ में छह लघुकथाकारों (अशोक वर्मा, कमल चोपड़ा, कुमार नरेन्द, मधुकान्त, मधुदीप, विक्रम सोनी) की ग्यारह-ग्यारह लघुकथाएँ ली गईं और उन लघुकथाओं पर प्रो. सुरेशचन्द्र गुप्त, डॉ. स्वर्ण किरण, डॉ. विनय विश्वास, प्रो. रूप देवगुण, भगीरथ और डॉ. सतीश दुबे द्वारा अलग-अलग पड़ताल प्रस्तुत की गई। डॉ. सुलेखचन्द्र शर्मा ने संकलन में संकलित सभी लघुकथाओं की बेबाक पड़ताल की थी। इस संकलन को तैयार करने के मूल में एक और इच्छा भी थी-कुछ वरिष्ठ समीक्षकों को इस विधा पर गौर करने के लिए तैयार करना। इसमें हमें उल्लेखनीय सफलता मिली। वरिष्ठ आलोचक एवं प्रेमचन्द साहित्य के आधिकारिक विद्वान श्री कमलकिशोर गोयनका को हमने पहली बार इस विधा पर गम्भीरता से चिन्तन करने के लिए मना लिया। गहन चिन्तन, अध्ययन के बाद जो लेख ‘लघुकथा कुछ विचारणीय प्रश्न’ सामने आया, वह बहुत ही सार्थक था। यह लेख लम्बे समय तक चर्चा का विषय रहा और जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात हुई वह थी श्री गोयनका का पूरी तरह इस विधा से जुड़ जाना। ‘लघुकथा का व्याकरण’ उनके इस विधा से पूरी तरह जुड़ने का ही परिणाम है। बाद में डॉ. चन्द्रप्रकाश गुप्त ने ‘पड़ाव और पड़ताल’ को केन्द्र में रखकर लघु-शोधप्रबन्ध भी लिखा। डॉ. सुरेशचन्द्र गुप्त जब दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे, तो उन्होंने लघुकथा को विश्वविद्यालय में पूर्ण मान्यता दिलवाने के लिए अथक प्रयास किए और सन् 1992 में दिल्ली विश्वविद्यालय ने कु. कमलजीत कौर और कु. शुभम् सिन्हा द्वारा लघुकथा पर लिखे लघु-शोधप्रबन्धों को मान्यता प्रदान की।

 1995 में भाई कुमार नरेन्द्र के अनुरोध पर और उनके सप्रयास से मेरे पहले लघुकथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ का प्रकाशन हुआ। उस संग्रह में मेरी लघुकथाओं पर वरिष्ठ लघुकथाकार सतीश दुबे तथा भगीरथ के महत्त्वपूर्ण आलेखों के साथ ही मेरी अब तक की लघुकथा-यात्रा ‘रूबरू’ शीर्षक से प्रकाशित हुई।

 सन् 1995 से 2013, हाँ, सचमुच ही मैं इतने लम्बे समय तक लेखन से विलग रहा। इसके पीछे कुछ तो कार्यालयीन कारण थे और कुछ घरेलू। उन सबको व्यक्त करना न तो मैं उचित समझता हूँ और न आवश्यक। इसी बीच 30 अप्रैल, 2010 को मैं अपनी कार्यालयीन सेवा से मुक्त हो गया और उपरोक्त में से एक कारण समाप्त हो गया। घरेलू स्थितियाँ भी धीरे-धीरे अनुकूल होती जा रही थीं और अब तक आवश्यक दायित्व भी बहुत हद तक पूरे हो गए थे।

 यह वह समय था जब मैं पुनः लेखन में लौटना चाह रहा था। अब मेरे सामने न लिखने का न तो कोई विशेष कारण बचा था और न ही कोई बहाना जिसका आवरण मैं अपनी निष्क्रियता पर डाल सकूँ। आज मैं आपसे कुछ भी छुपाना नहीं चाहता। शायद मैं पुनः लेखन शुरू करने के लिए आत्मविश्वास खो चुका था। मुझे नहीं लगता था कि मैं अब कभी भी कुछ लिख सकूँगा। इसी सब में तीन वर्ष कैसे बीत गए, पता ही न चला।

 फिर एक रात…हाँ, मेरी वह पूरी रात बहुत बेचैनी में गुजरी थी। आँखों में नींद भरी थी मगर मैं सो नहीं पा रहा था। मन व्यर्थताबोध के अवसाद में डूबता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं मृत्यु की ओर अग्रसर हूँ। मैं उस अँधेरे में बार-बार पलंग पर उठकर बैठ रहा था लेकिन लाइट जलाने का साहस मुझमें नहीं था। पत्नी मेरे बराबर में गहरी नींद में सो रही थी। उसे भी मैं जगा नहीं पा रहा था।

 यह 24 अगस्त, 2013 की रात थी। जैसे-तैसे वह रात बीती और सुबह हुई। आश्चर्य, सुबह उठते हुए मेरे शरीर में जो थकान और सुस्ती हमेशा रहती थी वह इस सुबह कतई नहीं थी, जबकि मैं रातभर करवटें ही बदलता रहा था। आज की इस सुबह मैं बिलकुल हल्का महसूस कर रहा था, जैसे हवा मैं तैर रहा हूँ। मुझे शायद कोई दिशा मिल गई थी।

 हाँ, यह बिलकुल सच है कि 25 अगस्त, 2013 को मुझे सचमुच ही एक दिशा मिल गई थी। मैं दृढ़ निश्चय करके कुर्सी पर बैठा था कि आज मुझे अपने आत्मकथात्मक उपन्यास की शुरुआत अवश्य ही करनी है। लेखनी कागज पर रेंगने लगी थी और मैं विचारों में डूबता-उतराता जा रहा था। समय गुजरता जा रहा था। अचानक मुझे लगा कि जो कुछ मैं लिखना चाह रहा था वह पूरा हो चुका है। देखा, तो मात्र एक पृष्ठ ही लिखा था। यह कैसे हो सकता है? आत्मकथात्मक उपन्यास मात्र एक पृष्ठ में कैसे सिमट सकता है? मैंने उसे पढ़ा, बार-बार पढ़ा। यह एक सम्पूर्ण रचना थी मगर यह उपन्यास नहीं था। हाँ, एक लघुकथा में सिमट गया था मेरा आत्मकथात्मक उपन्यास । यह लघुकथा थी ‘वजूद की तलाश’, मेरे दूसरे दौर लेखन की पहली लघुकथा। यह थी मेरे पुनः लेखन की शुरुआत। शायद यह के इशारा था कि नियति मुझे लघुकथा के क्षेत्र में लौटने को कह रही है! मैंने इस नियति को स्वीकार कर लिया और लघुकथाएँ, सिर्फ लघुकथाएँ लिखने लगा।

अपनी लघुकथा-यात्रा में मैं इससे पहले घटी एक और घटना का जिक्र करना भी जरूरी समझता हूँ। यह नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2013 की एक शाम थी। मैं अपने दिशा प्रकाशन के स्टॉल पर दोस्तों से गप्पबाजी में व्यस्त था कि तभी एक महिला मुझे तथा दिशा प्रकाशन को खोजती हुई वहाँ पहुँची। यह कविता सिंह थी जो लघुकथा में पी-एच.डी. कर रही थी और उसे 1988 में प्रकाशित लघुकथा-संग्रह ‘पड़ाव और पड़ताल’ की एक प्रति चाहिए थी। शायद उस दिन मेरे उस सपने ने फिर अँगड़ाई ले ली थी कि लघुकथा श्रृंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ को आगे बढ़ना चाहिए। मैंने जून 2013 में 1988 में प्रकाशित उसी खण्ड को पुनः प्रकाशित करने के लिए प्रेस में भिजवा दिया।

 यह शायद 13-14 सितम्बर, 2013 की बात है। ‘पड़ाव और पड़ताल’ का पुनर्मुद्रण हो गया था और कर्मचारी उसकी प्रतियाँ लाने प्रेस में गया हुआ था। इस मध्य भाई बलराम अग्रवाल से इस सबके बारे में बात होती रहती थी। संयोग देखिए, इस खण्ड की पुनर्मुद्रित प्रथम प्रति मेरे पास पहुँचने से पहले ही बलराम अग्रवाल तक पहुँच गई। उसे देखकर टेलीफोन पर उसकी पहली प्रतिक्रिया थी कि इसको दुबारा छापने की बजाय इसका दूसरा खण्ड प्रकाशित करना चाहिए था। मैंने भी जोश में कह दिया कि तुम दो महीने में इसका दूसरा खण्ड तैयार करो, मैं 2014 के विश्व पुस्तक मेले तक उसे प्रकाशित कर दूँगा। और उसने भी मेरी बात का सिरा कसकर पकड़ लिया तथा नवम्बर 2013 में इसका दूसरा खण्ड तैयार कर दिया।

और इस तरह लघुकथा की श्रृंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ आगे बढ़ी। 2014 के नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में इसके दो खण्ड उपलब्ध थे। मित्र लघुकथाकारों व समीक्षकों के साथ विश्व पुस्तक मेले के दौरान विचार-विमर्श हुआ और मैं इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने के अपने सपने को पूरा करने में तन-मन-धन से जुट गया। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2015 में दिशा प्रकाशन के स्टॉल पर इसके दस खण्ड लगे हुए थे और 2016 के विश्व पुस्तक मेले में इसके 19 खण्ड उपलब्ध रहेंगे। अभी भी यह श्रृंखला रुकी नहीं है और मेरे इस खण्ड के साथ इसके 19 खण्ड आ चुके हैं तथा 6 खण्ड तैयारी में हैं। दोस्तों का कहना है कि लघुकथा के क्षेत्र में यह अभूतपूर्व कार्य है। झूठ नहीं कहूँगा, दोस्तों की बात को सच मानकर कभी-कभी अपनी पीठ थपथपा लेने का मन भी करता है।

 बात मेरी लघुकथा-यात्रा की हो रही थी जो कि भटककर लघुकथा-श्रृंखला पड़ाव और पड़ताल’ पर चली गई। दोबारा उसी ट्रेक पर लौटता हूँ। 25 अगस्त, 2013 से मैंने जो लघुकथा लिखना शुरू किया वह अब तक निरन्तर जारी है। अपनी लिखी लघुकथाओं पर अशोक वर्मा, बलराम अग्रवाल, हरनाम शर्मा, मधुकान्त, अपनी नीरव व अन्य मित्रों से चर्चा करके में अपने विश्वास को लौटा रहा था। भाई सुभाष दुबे और भगीरथ से भी फोन पर चर्चा होती रहती थी। इस मध्य ‘पड़ाव और पड़ताला मैं चुनाव के लिए कई हजार लघुकथाओं में से गुजरा हूँ और सही-गलत लघुकथा मैं पहचान करना भी कुछ-कुछ सीखा है। इस बीच लघुकथाएँ लिखता रहा।

 इस मध्य 2014 में ‘नया ज्ञानोदय’ और ‘लोकमत समाचार’ के दिवाली विशेषांकों में ‘मुआवजा’, ‘शोक-उत्सव’ तथा ‘मुक्ति’ लघुकथाएँ प्रकाशित हुईं तथा ‘मधुमति’ में एक साथ तीन लघुकथाओं का प्रकाशन हुआ। फिर तो पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाओं का निरन्तर प्रकाशन शुरू हो गया। यह बात कहने में मुझे कतई भी संकोच नहीं है कि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ अपनी रचनाएँ भेजने के मामले में मैं सदा ही उदासीन रहा हूँ। जो कुछ इधर-उधर छपता है उसका श्रेय भाई बलराम अग्रवाल को ही देना होगा क्योंकि वे सदा मुझे इसके लिए टोकते रहते हैं। उन्हीं का पुरजोर आग्रह था जिसके होते नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2015 में दिशा प्रकाशन के स्टॉल पर मेरा निजी लघुकथा-संग्रह ‘समय का पहिया…’ लगा हुआ था। अगस्त 2013 से दोबारा प्रारम्भ हुई मेरी लघुकथा-यात्रा माँ सरस्वती की कृपा से निरन्तर आगे बढ़ रही है। इस खण्ड में प्रस्तुत अन्तिम 12 लघुकथाओं का चयन सम्पादक ने मेरी ‘समय का पहिया…’ के बाद जून 2015 तक लिखी गई लघुकथाओं में से किया है।  

एक बात और। न जाने क्यों, लघुकथा के विकास के लिए अब इस विधा में लगातार नए प्रयोग करने का मेरा मन रहा है। ‘समय का पहिया…’ में भी मैंने कुछ प्रयोग किए थे। आवश्यक नहीं है कि सभी प्रयोग सफल हों मगर असफलता के भय से नए प्रयोग करने बन्द तो नहीं किए जा सकते! मेरा पाठकों से अनुरोध है कि वे देखें, क्या उन्हें मेरी लघुकथाओं में कुछ नए प्रयोग देखने को मिलते हैं। यदि हाँ, तो यह बताएँ कि वे कितने सफल-असफल हैं। आप ही तो सही और गलत का उचित निर्णय कर सकते हैं। बस, अब अपनी अभी तक की लघुकथा-यात्रा को यहीं विराम देता हूँ। गाहे-बगाहे आपसे भेंट और चर्चा तो होती ही रहेगी। 

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