लघुकथाएँ तो बहुत पढ़ी। कुछ अच्छी लगी, याद भी रहीं परन्तु समय के साथ वह ध्यान से निकल गईं। प्रश्न जब मेरी पसंद की दो लघुकथाओं का आया, तो पहले ही झटके में जो दो याद आईं, वे थीं- धर्मपाल साहिल की लघुकथा ‘चूड़े वाली बाँह’ और दूसरी कनु भारती की ‘हिसाब’
ये दोनों लघुकथाएं 1999और 2000 के बीच में पढ़ी थीं; परन्तु यह आज भी दिमाग से निकल नही पाई हैं । कारण समझ में नहीं आया परन्तु यह भी सच है, जो इतने वर्षों के पश्चात् भी आसानी से याद आई वह मेरी पसंद की ही होगी। ‘हिसाब’ बरोह के लघुकथा विशेषांक में पढ़ी थी; परन्तु दु:ख इस बात का है कि यह लघुकथा प्रस्तुत करने के लिए मिल नही पाई। दूसरी लघुकथा धर्मपाल साहिल की ‘चूड़े वाली बाँह’ है। जो आज भी दिमाग के किसी कोने में अपनी पहचान बनाए हुए है। यह गांव की नवविवाहिता, जो ब्याह के बाद चण्डीगढ़ के आधुनिक परिवेश में अपने पति के साथ रहने के लिए आती है। और वह शादी की पंरपरा के मुताबिक चूड़ा पहन कर शादी के सजावटी कपड़ों में कैफे हाउस में जाती है और वहाँ का खुला वातावरण लड़कियों का हंसना। उनकी बातें उनको आधुनिक लिबास में देख कर पहले तो उसे अजीब सा लगता है; परंतु बाद में उसे अपने लिबास में घुटन सी महसूस होने लगती है। उसे लगता है वह किसी चिड़ियाघर में नुमाइश के लिए कैद की हुई वस्तु है और जल्दी से वह उस वातावरण से अपने को बाहर निकालना चाहती है। कैफे हाउस से बाहर निकल कर उसका शोरूम में लगे आधुनिक पहनावे को देखकर आकर्षित होना और अपनी ‘चूड़े वाली बाँह’ को दुपट्टे से छिपाने का प्रयास करना । लड़की की सोच में आये परिवर्तन को( लघुकथा के माध्यम से ) और ब्याही लड़की के मानसिक उतार-चढ़ाव का चित्रण आज तक दिमाग से निकाल नहीं पाया हूँ।यह लघुकथा अपनी सरल भाषा से पाठक के मन में अपनी जगह बना लेती है। इस बीच कुछ और लघुकथाएँ भी है, जिनके कथानक दिमाग से भूलते नही है; परन्तु वे लघुकथाएँ ढूँढ नहीं पाया ।
मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा, जो हाल ही में क्षितिज के अंक को पढ़ते हुए मुझे याद रही वह है ‘पीड़ा’, लेखिका बरखा शुक्ला की यह लघुकथा औरत की मानसिक पीड़ा को दर्शाती है । खुद उसे एक पागल व्यक्ति से ब्याह दिया जाता है और किस्मत से उसका बेटा भी पागल ही होता है। जब सास उसके लिए पंडित जी को लड़की बताने के लिए कहती है, तो वह मना कर देती है; क्योंकि जिस पीड़ा से उसने ज़िन्दगी जी होती है वह नहीं चाहती की किसी दूसरी लड़की को भी इस पीड़ा से जीना पड़े और उसकी जिंदगी बर्बाद हो।
1-चूड़े वाली बाँह/ धर्मपाल साहिल
राजधानी के सत्रह सैक्टर में एक सुहावनी शाम के समय हाई -फाई लोगों की भीड़ में एक नव-विवाहित जोड़ा भी शामिल हो गया। पहली बार चण्डीगढ़ आई …सिर से पाँव तक पंजाबी ड्रेस में सजी-सँवरी नवविवाहिता… चूड़े वाली बाँह द्वारा सतरंगी दुपट्टे से सिर को बार-बार ढाँपने की कोशिश कर रही थी। पति के साथ कैफे हाऊस में प्रवेश करते समय वहाँ उपस्थित औरतों का बनाव -शृंगार एवं पहनावा उसकी हैरानी में वृद्धि कर रहा था।
ब्वायकट हेयर स्टाइल…चमड़ी से चिपकी हुई टाइट जींस में लड़कियाँ उसे लड़कों का भ्रम दे रही थी। टेनिस व हाकी की खिलाड़िनों की भाँति जाँघों को ढकने से परहेज़ करती मिनी स्कर्ट तथा स्लीवलैस टाप्स में उनके जिस्म शीशे की तरह चमक रहे थे।
“देखो तो इनके पहनावे से पता ही नही चलता कि कौन लड़की है और कौन लड़का। कौन कुँवारी है और कौन शादीशुदा .. ” पत्नी ने हैरानी से पूछा।
“अरे यहाँ तो बिना शादी के ही इकट्ठे रहने का फैशन चल पड़ा है और जो शादी -शुदा है वे भी अपनेआपको अनब्याही शो करती फिरती है ऐसी ड्रेस पहनकर” कुछ वर्षों से चण्डीगढ़ में नौकरी कर रहे पति ने पत्नी के ज्ञान में वृद्धि करने के आशय से कहा।
कैफे हाउस में बैठे बैठे पत्नी को लगने लगा जैसे वह किसी चिड़ियाघर में कैद कोई जंगली जानवर है। वहाँ हरेक ऑंख उसका मजाक उड़ा रही है। अपने पहरावे में उसका दम सा घुटने लगा। उसका वहाँ बैठना कठिन हो गया। झटपट काफी पीकर वह पति के साथ कैफे हाऊस से बाहर निकली। अब वह नंगे सिर की परवाह किए बिना नजदीक की दुकान के शोकेस में टँगी जीन व टाप को हसरत भरी निगाहों से देखने लगी तथा अपने इन्द्र धनुषी दुपट्टे से चूड़े वाली बाहों को ढकने का प्रयास कर रही थी
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2-पीड़ा /बरखा शुक्ला
सावित्री के घर कथा समाप्ति के बाद रिश्तेदार महिलाएं आपस में बातें करने लगी, उसकी चाची सास बोली -“सावित्री को मानना पड़ेगा, पागल पति के साथ इतने साल बड़े धैर्य से बिताए।”
“पर ईश्वर ने अच्छा नहीं किया उसके साथ, बेटा भी पागल दे दिया।” ताई सास बोली।
तभी सावित्री की सास पंडित जी से बोली -“पंडित जी मेरे पोते के लिए कोई अच्छी लड़की बताइए।”
” अम्मा जी बुरा न मानें, पर कोई मजबूरी में ही अपनी लड़की देने को तैयार होगा।” पंडित जी बोले।
” हमारे घर किस बात की कमी है, राज करेगी लड़की ।” सावित्री की सास बोली ।
तभी सावित्री बोली -” नहीं पंडित जी, मुझे मेरे बेटे की शादी नही करनी है।”
” कैसी बात कर रही हो बहू, तुम्हें बहू का चाव नही ?” सावित्री की सास ने पूछा।
” क्यों नहीं है माँ जी, पर मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करना चाहती। मैं नही चाहती कोई लड़की जीवन भर वो पीड़ा सहे जो मैंने सही है।” सावित्री बोली।
“पर बहू”- सास ने कुछ कहना चाहा।
” नही माँ जी बेटे की शादी तो मैं नहीं करूँगी, पति यदि लायक हो तो पत्नी झोपड़ी में भी राज करती है, नहीं तो महल भी बेमानी है।”सावित्री सास को बीच में रोककर बोली।
इतने सालों की पीड़ा सावित्री की आँखों से आँसू बन बह पड़ी।
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