लघुकथा हिंदी साहित्य की वह विधा है, जो कम शब्दों में अधिक अर्थ का संप्रेषण करती है। यह न केवल घटनाओं का संक्षिप्त आख्यान होती है, बल्कि मानव-मन, समाज और संवेदना के जटिल प्रसंगों को तीव्र और प्रभावशाली ढंग से उजागर करती है। लघुकथा का प्रभाव उसके संकेतों, प्रतीकों, और अंतर्ध्वनि में निहित होता है। लघुकथा आकार में बहुत बड़ी नहीं होती, लेकिन पाठक को अंदर तक प्रभावित कर जाती है।
मेरी पसंद की पहली लघुकथा है सुकेश साहनी की ‘फेस टाइम’। सुकेश साहनी की यह लघुकथा आज के डिजिटल युग में रिश्तों की विडंबनाओं और ‘फेसबुक जीवन’ बनाम ‘वास्तविक जीवन’ के टकराव को गहरे व्यंग्य और यथार्थ के साथ उजागर करती है। लघुकथा एक पुरुष पात्र की दृष्टि से चलती है, जो सोशल मीडिया की सतहों पर भावनाएँ बाँटता है, ‘लाइक’ करता है, इमोजी भेजता है, और उसी माध्यम पर दूसरों के प्रति भावनाओं से बंधा प्रतीत होता है लेकिन जब पत्नी उसी संसार में डूबी होती है, तो उसके भीतर असुरक्षा, शक और पितृसत्तात्मक अधिकारबोध पनपता है।
इस लघुकथा में लेखक ने तकनीक, आधुनिक संबंधों, और आत्मकेंद्रित मनोवृत्तियों के सहसंबंध को गहन प्रतीकात्मकता के साथ उकेरा है।
लघुकथा का आरंभ फेसबुक पोस्टों की श्रृंखला से होता है एक मृत्यु, एक पुरानी तस्वीर, एक मोहक प्रोफाइल फोटो- यह कोई साधारण अनुक्रम नहीं, बल्कि मनुष्य की भावनात्मक अनास्था और आत्ममुग्धता का क्रमिक चित्रण है। लघुकथा का हर दृश्य जैसे मनुष्य की एक परत खोलता है:
शोक में डूबा हुआ मन भी तुरंत एक ‘लाइक’ और ‘इमोजी’ के ज़रिए हल्का हो जाता है।स्मृतियों का रस, एक मुस्कराहट बनकर स्क्रीन पर बह जाता है। फिर सौंदर्य की झलक जिसे देख मनुष्य स्वयं को खो देता है, मगर उसी भाव की प्रतिध्वनि जब पत्नी में दिखाई देती है, तो वह असहनीय बन जाती है।
‘फ़ेस टाइम’ शीर्षक मात्र तकनीकी शब्द नहीं है यह सांस्कृतिक संक्रमण का प्रतीक है। यहाँ ‘फेस’ केवल वह चेहरा नहीं जो वीडियो कॉल पर दिखता है, वह एक मुखौटा है,और ‘टाइम’ केवल वर्तमान का नहीं, बीते समय का आभास भी है, जो स्मृतियों के रूप में उभरता है,लेकिन अब सबकुछ आभासी है।
लेखक बड़ी कुशलता से आधुनिक सामाजिक संरचना में स्त्री-पुरुष की भूमिकाओं पर भी प्रश्नचिन्ह उठाते हैं।
पति की अपनी व्यस्तताएँ, मित्रों से संवाद, स्त्रियों की तस्वीरों पर प्रतिक्रियाएँ यह सब ‘सामान्य’ है।
लेकिन जैसे ही पत्नी उसी स्पेस में सक्रिय होती है
वह ‘असभ्यता’, ‘लत’, ‘शंका’ और ‘दुराचार’ बन जाती है।
यहाँ लेखक बिना किसी भाषणबाज़ी के, मात्र दृश्यांकन और संवाद से पितृसत्तात्मक सोच के द्वैध को उद्घाटित करते हैं।
लघुकथा की भाषा बेहद संयमित, सहज और व्यंग्यात्मक रूप में पैनी है। संवादों में सहजता है, परंतु वे किसी नाटक के जैसे भावनाओं को परत-दर-परत उघाड़ते हैं।
कहानी का शिल्प इस बात का प्रमाण है कि कम शब्दों में अधिक अर्थ और टकराव कैसे रचा जा सकता है।
यथा
“तो क्या……? इसका मतलब…..।”
“जरूर उसका चक्कर किसी से चल रहा है…..”
ये वाक्य पाठक को बहुत दूर तक ले जाते हैं -एक शक, एक टूटन, एक घुटन।
लघुकथा का अंतिम दृश्य, एक स्थिर चित्र की तरह पाठक की चेतना में ठहर जाता है।
अँधेरे कमरे में पत्नी का मुस्कराता चेहरा, स्क्रीन की हल्की रोशनी में दमकता हुआ,वह मुस्कान जो कभी प्रेम की थी, अब किसी और के साथ साझा हो रही है या शायद नहीं।
शंका और असुरक्षा की यह जो गूँज है, वह पाठक के भीतर देर तक बजती रहती है।और एक सवाल छोड़ जाती है-
“जब चेहरों की जगह स्क्रीनें आ जाएँ, तो विश्वास कहाँ ठहरता है?”
यह लघुकथा केवल एक रचना नहीं,बल्कि आधुनिक दांपत्य संबंधों की बदलती प्रकृति, सामाजिक वर्चस्व की टूटती दीवारें, और तकनीक से बने कृत्रिम संबंधों की त्रासदी का संवेदनशील दस्तावेज़ है।
‘फ़ेस टाइम’ एक समकालीन ‘सांस्कृतिक ट्रेजेडी’ है जहाँ भावनाएँ वर्चुअल हो गई हैं, और सच्चे रिश्ते ‘सीन ‘ और ‘इमोजी ‘ में तब्दील होकर कहीं खो गए हैं। यह लघुकथा हमें चेताती है कि वास्तविक संबंधों को स्क्रीन के पीछे न ढूँढा जाए क्योंकि वहाँ जो दिखता है, वह चेहरा नहीं,बस एक प्रकाशमान मुखौटा है।
लघुकथा का शीर्षक ‘फ़ेस टाइम’ एक बहुस्तरीय प्रतीक है,
फेसबुक की दुनिया,व्यक्ति के ‘चेहरे’ (या मुखौटे),और वास्तविक जीवन में आमने-सामने के संबंधों की अनुपस्थिति।
लेखक ने बड़े ही बारीक तरीके से यह दिखाया है कि हम सोशल मीडिया पर ‘भावुक’, ‘नॉस्टालजिक ’ या ‘रोमांटिक ’ हो सकते हैं, लेकिन असल जीवन में हमारे रिश्ते कितने कुरूप और असहज हो सकते हैं।
‘फ़ेस टाइम’ एक सशक्त, समयसापेक्ष और मनोवैज्ञानिक रूप से गूढ़ लघुकथा है, जो आधुनिक युग के डिजिटल संबंधों की नब्ज पर हाथ रखती है। सुकेश साहनी ने बहुत ही कम शब्दों में एक घरेलू, सामाजिक, और तकनीकी त्रिकोण खड़ा किया है जहाँ रिश्ते, शक, अहंकार और डिजिटल व्यसन एक साथ टकराते हैं।
मेरी पसंद की दूसरी लघुकथा है डॉ. उपमा शर्मा की लघुकथा ‘ख़ूबसूरती’।-‘ख़ूबसूरती’ इस विधा का एक सशक्त उदाहरण है जहाँ घटनाएँ नहीं, अनुभूतियाँ कथा का मेरुदंड हैं; जहाँ कथानक नहीं, संवेदना कथा को आगे ले जाती है। यह कथा न केवल लघु आकार में जीवन के एक निर्णायक क्षण को पकड़ती है, बल्कि उसे पाठक के आत्मबोध में परिवर्तित कर देती है।
‘ख़ूबसूरती’ लघुकथा मूलतः स्त्री-स्वर की वह गूँज है, जिसे सदियों से बाह्य सौंदर्य, समाजिक स्वीकृति और पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण के आईने में परखा जाता रहा है। यह कथा एक ऐसे क्षण की पड़ताल करती है जब स्त्री नारीत्व के शिखर ‘मातृत्व’ पर पहुँचती है, किंतु भीतर ही भीतर एक अदृश्य विछोह से गुजर रही होती है। सौंदर्य की पारंपरिक परिभाषाओं और मातृत्व की अनुभूति के मध्य झूलती यह लघुकथा स्त्री-अस्तित्व की मार्मिक गाथा है। ‘ख़ूबसूरती’ केवल एक शारीरिक अनुभव का आख्यान नहीं, बल्कि वह आंतरिक यात्रा है जिसमें एक स्त्री समाज द्वारा लादी गई सुंदरता की सीमाओं को तोड़ते हुए स्वयं की पुनर्खोज करती है। काजल की पीड़ा, केवल उसके पेट पर लगे टाँकों की नहीं है, बल्कि उन सामाजिक घावों की है जो वर्षों से उसके भीतर यह बिठाते आए हैं कि उसका मूल्य उसकी छवि और पेशेवर ऊँचाइयों से तय होता है।
सहेलियों की टिप्पणियाँ स्त्री-स्त्री के मध्य पितृसत्तात्मक सोच की अंतर्ध्वनि बनकर उभरती हैं वे स्वयं भी एक सुंदरता की पूर्वनिर्धारित परिभाषा में बंधी हुई हैं। कथा में डॉक्टर की भूमिका एक करुणा-प्रस्तावना है चिकित्सा केवल शरीर की नहीं, मन की भी। जब वह बच्चा काजल के सीने पर लिटाया जाता है, वह क्षण मेटाफोरिक पुनर्जन्म का है अब वह केवल मॉडल काजल नहीं, एक माँ है, एक सम्पूर्ण स्त्री, जिसे अपनी धड़कनों में सौंदर्य का नया अर्थ सुनाई देता है।
शिल्प की दृष्टि से लघुकथा दृश्यात्मक और आत्मीय संवादों से युक्त है। भाषा सरल होते हुए भी गहन साहित्यिक बोध से परिपूर्ण है। संवादों की सहजता कथा को यथार्थ की ज़मीन देती है, जबकि भीतर चलती द्वंद्वात्मक अनुभूति इसे काव्यात्मक गहराई प्रदान करती है। लेखिका ने शल्य क्रिया की पृष्ठभूमि में नारी मन के सूक्ष्म कंपनों को बड़ी कुशलता से अभिव्यक्त किया है।
“बच्चा काजल के सीने पर लिटा दिया गया” यह वाक्य ‘परिवर्तन’ का प्रतीक है। यह वह क्षण है जब स्त्री अपने स्त्रीत्व को नई पहचान में ढालती है जहाँ सुंदरता अब आईने की देन नहीं, बल्कि दिल की धड़कनों की अनुभूति है।
अंतिम पंक्ति में प्रयुक्त कथ्य “वो खुद को दुनिया की अब सबसे खूबसूरत औरत लगी कथा के पूरे वैचारिक फलक को समेटकर पाठक के हृदय में स्थायी प्रभाव छोड़ जाती है। यह वाक्य नारीत्व की ‘अंतःसौंदर्य’ की उद्घोषणा बनकर उभरता है।
यह लघुकथा नारीत्व की गरिमा को उसकी सम्पूर्णता में देखने की कथा है और यही इसकी सबसे सुंदर उपलब्धि है।
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1.फ़ेस टाइम / सुकेश साहनी
फेसबुक खोलते ही वह धक से रह गया, उसके प्रिय युवा रंगकर्मी मित्र की ‘हार्ट अटैक’ से मृत्यु हो गई थी। पोस्ट को पढ़ते हुए उसकी आँखें डबडबा आईं। उसने कमेंट लिखा, ‘‘बहुत ही दुःखद, नमन!’’
अगली ही पोस्ट पर उसके बाल सखा ने एक फोटो शेयर की थी, जिसमें वे तीनों जिगरी दोस्त एक नुमाइश मैदान में एक दूसरे के गले में बाहें डाले खड़े थे। अपने लड़कपन की फोटो को वह मंत्रमुग्ध-सा देखता रह गया, होठों पर बारीक मुस्कान तैर गई, उसने ‘लाइक’ करते हुए लिखा, ‘‘तीन तिलंगे’’ जवाब में मित्र ने अट्टहास करता ‘ईमोजी’ भेजी, जिसे देखकर उसे हँसी आ गई।
आगे बढ़ा तो उसकी नजरें अपनी महिला मित्र की बहुत ही उत्तेजक प्रोफाइल पिक्चर पर पड़ीं। वह बड़ी देर तक उसे बड़ा करके देखता रहा, बहुत सोचने विचारने के बाद उसने कमेंट में ‘धाँसू’ का संकेत करता ‘ईमोजी’ पोस्ट कर दी।
फोन ‘लो-बैट्री’ का संकेत करने लगा, तो वह बैठक से बैडरूम में आ गया। यहाँ पत्नी भी अपने फोन पर व्यस्त थी।
‘‘अब बस भी करो,’’ फोन को चार्जिंग में लगाते हुए उसने कहा, ‘‘दिन-रात इसी में लगी रहती हो।’’
पत्नी ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, मुस्कराते हुए कुछ टाइप करने लगी। यह देखकर उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
‘‘मैंने तुमसे कुछ कहा? सुनाई नहीं देता!’’ वह चिल्लाया, ‘‘फोन रखो। मुझे सोना है।’’
‘‘तुम्हें मना किसने किया है, सो जाओ। मुझे अभी देर लगेगी, ‘‘पत्नी ने रुखाई से कहा, ‘‘तुम खुद दिन रात फोन से चिपके रहते हो, मैंने कभी कुछ कहा?!’’
‘‘मेरी बराबरी मत करो, मेरा तो ऑफिस का सर्किल है, दूसरे सौ झमेले हैं। तुम्हारी तरह खाली बैठे पलंग नहीं तोड़ता। नारी मुक्ति के नाम पर न जाने कैसे- कैसे ग्रुपों में घुसी रहती हो। बिगाड़ कर रख दिया है इस लत ने तुम्हें। बोलने की तमी़ज तक तो रही नहीं।’’
इस बार पत्नी ने कोई जवाब नहीं दिया और मैसेंजर पर कुछ टाइप करने लगी।
गुस्से में तमतमाते हुए उसने कमरे की लाइट बंद कर दी और पत्नी की ओर पीठ कर लेट गया। मैसेंजर पर चल रही चैटिंग की हल्की आवाज उसके कान में पिघले सीसे-सी पड़ रही थी। बहुत देर तक पत्नी ने फोन नहीं रखा ,तो उसने करवट बदलकर देखा, पत्नी ‘फेसटाइम’ वीडियो पर थी। स्क्रीन की लाइट में पत्नी का चेहरा चमक रहा था। उसके चेहरे पर बहुत ही मोहक मुस्कान थी। उसे याद आया ऐसी मुस्कान तो पत्नी के होंठों पर तब होती थी, जब लवमैरिज से पहले वे डेटिंग पर जाते थे। तो क्या……? इसका मतलब…..। जरूर उसका चक्कर किसी से चल रहा है…..
वह अंगारों पर लोटने लगा।
2.ख़ूबसूरती/ डॉ. उपमा शर्मा
ऑपरेशन थियेटर में चिकित्सक की आवाज कानों में पड़ने पर काजल ने धीरे से आँखें खोलीं। चिकित्सक का हाथ उसके पेट पर था।वो टांके लगा रही थी।साथ ही परिचारिका को कुछ हिदायत देती जा रही थी।
दर्द की तीव्र लहर से काजल की आँखों में आँसू आ रहे थे।उसे समझ नहीं आ रहा था कौन सा दर्द ज़यादा है ?शरीर पर लगे कट का या अपनी खूबसूरती खत्म होने का।सहेलियों की बातें रह -रहकर याद आ रहीं थीं।
“अब तेरे पेट पर बर्थ मार्क बन जायेंगे।”
” तू अब सुंदर नहीं रही।”
देख तो मोटापे से सारी खूबसूरती का सत्यानाश कर लिया। “
“यामिनी तेरे सामने कहीं नहीं ठहरती थी।अब तेरे सारे प्रपोजल उसके पास हैं।तूने ख़ुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है।
“बैडोल शरीर ,बढ़े हुए पेट के साथ कौन तुझसे मॉडलिंग करायेगा।अरी मूर्ख बच्चा ही चाहिए था सरोगेसी से कर लेती। “
“शीर्ष पर आ सब कुछ छूटने का दर्द तुझे बाद में समझ आयेगा काजल।”
“देखना सुंदर मॉडल देखकर एक दिन राज भी तुझे भूल जायेगा।”
काजल की आँखों के आँसू कुछ दर्द की शिद्दत और कुछ सहेलियों के आने वाले दिनों के खाके से और तेज़ हो गये।बच्चा तेज़ आवाज में रो रहा था।
“क्या हुआ काजल?दर्द बहुत ज़्यादा हो रहा है? अभी तुझे पेन किलर के इंजेक्शन लगवाती हूँ।”
“डॉक्टर! क्या मैं अब सुंदर नहीं रही।”काजल के आँसू रूक ही नहीं रहे थे।
“किसने कहा? “
काजल के आँसुओं में और तेजी आ गई। डॉक्टर ने स्टिच लगाना छोड़ उस नर्स को इशारा किया जो बच्चे को चुप कराने की कोशिश में थी।नर्स ने मुस्कुरा कर बच्चे को काजल के सीने पर लिटा दिया।
बच्चा पहचानी हुई धड़कनों को सुन चुप हो गया।
अपने बच्चे को अपने सीने से लगाये वो ख़ुद को दुनिया की अब सबसे खूबसूरत औरत लग
-0- Ritesh Bhardwaj , Dy General manager HR, NTPC Ltd. D-18, NTPC- Township, Vidyut Nagar, Dadri, 201008