मेरी पसंद
कस्तूर
लाल तागरा
‘स्त्री कुछ
नहीं करती’ लेखक अशोक भटिया एवं ‘ मुन्ने की
समझ ‘ लेखक चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथाओं के अलावा भी दर्जनों ऐसी लघुकथाएँ हैं , जो
मुझे पसन्द हैं । यहाँ अपनी पसंद की उक्त दो लघुकथाओं को विश्लेषित कर रहा हूँ ।
स्त्री
कुछ नहीं करती :
इस लघुकथा
में मुझे वह स्त्री दिखाई देती है, जो स्वभाव से कर्मठ है। परिवार को अपने आँचल की
छाँव देती है। दायित्व समझ कर पति की हर प्रकार से देख भाल करती है । लेकिन वह घर और
समाज में उचित रूप से मूल्यांकित नहीं की जाती। सदियों से उस पर परम्पराओं और संस्कारों
के नाम पर सैंकड़ों काम थोप दिये गए हैं । वह उन्हें बखूबी निभाती है, फिर भी उपेक्षित
और दोयम दर्जे की सदस्य गिनी जाती है ।
रचना में सीधे-सीधे कथा नही है । स्त्री की दिनचर्या के माध्यम से लेखक ने कुशलता से
दृथ्य खींचा है कि गाँव की स्त्री दिन-भर किन-किन विकट स्थितियों का सामना सहजता से
करती है। काम से भागने की प्रवृत्ति उसमें नहीं हैं । घर के सभी सदस्यों के लिए वह
मशीन है , जिसे न आराम की जरूरत है , न सम्मान की। परिवार के लिए अपने को खपा कर भी प्रशंसा के दो शब्द
की हकदार नही बन पाती, जबकि उसके कन्धों पर ही सारा घर टिका होता है किन्तु किसी को
दिखता नहीं ।
पुरुष प्रधान समाज की अवधारणा है कि स्त्री घर में रहती है । और घर पर ख़ास काम ही क्या
होते हैं? काम तो पुरुष करते हैं । लेखक ने पुरुष और महिला के काम की तुलना नहीं की
है , केवल स्त्री की सहनशीलता और अनथक कामों को दिनचर्या के माध्यम से गिनवा कर उसकी
महत्ता स्थापित की है । स्त्री के योगदान को रेखांकित करने में लेखक पूर्णतः सफल रहा
है ।
स्त्री को क्या क्या सहना पड़ता है , इसकी एक बानगी देखिए-‘फिर चौपाल में ताश के बाद
पीकर आ धमके डगमगाते पति को सँभाला, उसकी गालियाँ सुनीं , उसे खाना खिलाया , उसका बलात्कार
सहकर उसे चैन की नींद सुलाया।’ यहाँ लेखक ने भाषायी सलीके से विवाह के नाम पर पुरुष
के सेक्स के तथाकथित अधिकार को अत्याचार की श्रेणी में खड़ा किया है । पुरुष को अपने
काम से मतलब है । स्त्री की थकान और इच्छा का उसके लिए कोई मोल नहीं है । वह सेक्स
को असीमित और अबाधित अधिकार समझता है ।
लघुकथा में ‘फिर’ शब्द का प्रयोग उन्नीस बार हुआ है । आम तौर पर बार-बार एक ही
शब्द का दोहराव भाषा के सौंदर्य को बिगाड़ता है और लेखक के शब्द सामर्थ्य पर भी प्रश्न
चिह्न खड़ा करता है; लेकिन ‘स्त्री कुछ नहीं
करती’ में अनेक बार ‘फिर’ का आना अखरता नही;
बल्कि वह लघुकथा को रवानगी देने में सहायक बनता है । इससे यह लघुकथा उठान ही लेती है
। यह लेखक का कौशल है कि नकारात्मक प्रभाव और कमजोरी को उसने विशेषता में बदल दिया
है ।
शहरी नई युवा पीढ़ी ‘जंगल-पानी जाने’ के मुहावरे को नहीं समझती । लेखक ने शौच
या बाथरूम इत्यादि न लिखकर ‘जंगल-पानी गई’ का प्रयोग किया है, जो गाँव की शब्दावली में आम है ।
लेखक ने परिवेश के अनुसार मुहावरे में बात कह कर रचना को व्यावहारिक रूप दिया है ।
भैंस दुहना , उपले पाथना , दही बिलोना जैसे क्रिया शब्दों का प्रयोग भी उस वातावरण
को सृजित करने में सहायक रहा है, जो इस लघुकथा में अपेक्षित है ।
इस पंक्ति पर ध्यान दीजिए –‘फिर सन्नाटे में बचा-खुचा खाया और थकान के साथ सो गई।’
लेखक ने यहाँ सन्नाटे , बचे-खुचे को खाने की
स्त्री की नियति और थककर सो जाने का ज़िक्र करके स्त्री की निरीह स्थिति की इतनी विशद
व्याख्या कर दी , जितनी एक बड़े आलेख या निबब्ध को लिख कर भी शायद ही संभव हो पाये ।
अंतिम पंक्ति में लघुकथा का समापन इन शब्दों से किया गया है- ‘फिर सवेरे सबसे पहले
पाँच बजे उठी।’ यह वाक्य एक सूचना के रूप में कहा गया है । लेकिन इसका जबरदस्त प्रभाव
‘पंच’ की तरह पाठक पर पड़ता है । लघुकथा विधा में धमाकेदार पंच तो अक्सर प्रयोग किए
जाते है; लेकिन ‘सौम्य पंच’ के रूप में यहाँ इसका प्रयोग अद्भुत प्रभाव छोड़ता
है । वह इस लघुकथा का नाभि वाक्य है ।
सौम्य पंच का इस प्रकार उपयोग लघुकथा विधा को नई पहचान देने में सहायक हो सकता है ।
इससे वह ‘झम्म से उतरता जादू’ और अधिक समझाने की कोशिश के आरोप से बाहर निकल सकती है
। अनेक लघुकथाकारों की लघुकथाओं में इस प्रकार की सहजता से प्रभावी समापन देखने को
मिलता है । यह ढंग लघुकथा को गंभीर विधा बनाने में योगदान करता है ।
‘ स्त्री कुछ नहीं करती’ लघुकथा के गठन , प्रस्तुति , सहज भाषा , शब्द संख्या
, प्रभाव , विषय और कलात्मकता की दृष्टि से मेरे मतानुसार अशोक भाटिया की यह लघुकथा
, मानक लघुकथा के किनारों को छूती है ।
मुन्ने की समझ
वैसे तो बाल मनोविज्ञान पर बहुत-सी लघुकथाएँ उपलब्ध हैं; किन्तु चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथा ‘मुन्ने की समझ’
सामान्य मनोविज्ञान को भी समेटते हुए चलती है । इसे बाल-मन और सामान्य मनोविज्ञान का
सम्मुचय कह सकते हैं ।
अक्सर ‘मैं’ पात्र अर्थात प्रथम पुरुष के माध्यम से लिखी गई लघुकथाओं की आलोचना इस
तर्क के साथ की जाती है कि इससे लघुकथा , संस्मरण के नजदीक पहुँच जाती है । किन्तु
मुन्ने की समझ को लेखक चैतन्य त्रिवेदी ने इस तरह से बुना है कि
यह प्रथम पुरुष विधा में लिखी गई बेहतरीन लघुकथा की श्रेणी में गिनी जाने योग्य बन
गई है । इससे सिद्ध होता है कि प्रथम पुरुष में लघुकथा लिखना भी एक सशक्त शैली है ।
उसमें भी उतनी ही संभावनाएं और व्यापकता है , जितनी प्रचलित शैलियों में हैं ।
यह लघुकथा स्थापित करती है कि हमेशा छोटे बच्चे ही गलत नही होते , बल्कि अभिभावक भी
गलत व्यवहार के दोषी होते हैं । मुन्ने की खिलौना लेने की स्वाभाविक जिद्द पर उसके
पापा यानि लघुकथा में मैं पात्र अपना आपा खो बैठता है । देखिए-घर लौट कर
मैंने उसे बुरी तरह पीट दिया , जिस तरह अपराधी पीटे जाते हैं । किन्तु
उसके बाद पिता और पुत्र के बीच गहरे आत्मिक लगाव को भी रेखांकित करती है यह लघुकथा
– मैं ग्लानि महसूस कर रहा था । मुझे उसे इस तरह नहीं पीटना चाहिए था … बच्चे
जिद्द तो करेंगे ही खिलौना देख कर … … मैं पशोपेश में था , कैसे मनाऊँ उसे । कैसे
उसके पास जाऊँ ।
यहाँ पिता मानसिक रूप से अपने बच्चे का सामना करने की हिम्मत नही जुटा पाता । अधैर्य
और झुंझलाहट में बच्चे पर हाथ छोड़ने के बाद वह भीतर-भीतर गलती स्वीकार करता है; लेकिन
बच्चे के सामने व्यक्त नहीं करता। आम जीवन में ऐसा व्यवहार बहुत से पिता करते है। उसी
को लेखक ने लेखन में उतारा है ।
उसकी माँ ने मुझ से कोई बात नहीं की । इस वाक्यांश को
लिखकर लेखक ने बताया है कि प्रायः परिवारों में पत्नी अपने पति के गलत व्यवहार और दृष्टिकोण
पर इस प्रकार की सांकेतिक विधि से भी विरोध दर्ज़ करती हैं । यदि लेखक इस लघुकथा में
पत्नी के मनोभाव को न दर्शाता, तो पाठकों को कहीं कोई कमी अवश्य खटकती रहती और रचना
का स्तर और प्रभाव शायद कुछ कम पड जाता ।
इस लघुकथा में कथ्य को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है । वह आम जीवन में बहुत से अभिभावकों
को अपनी कमजोरियों और सोच पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है ।
लघुकथा का समापन अद्भुत ढंग से किया गया है । न कोई सीधा सन्देश , न ही निष्कर्ष । बस , एक ओपन एंड पर छोड़ दिया गया है , जो पाठकों को बहुत-सी दिशाओं
में सोचने के अवसर देता है । अन्त पर पहुँचाकर रचना को सुखद या दुखद होने से भी बचाया
गया है । लघुकथा साहित्य में बहुत कम रचनाएँ ऐसी मिलेंगी जो इस प्रकृति की हैं ।
पिता नहीं , मुन्ना सुलह का रास्ता निकालता है , कम्पास के डिब्बों से अपनी खिलौना
ट्रेन बनाकर । वह खेल भी रहा है उससे , किन्तु उसके चेहरे पर उदासी से भरी मुस्कराहट
है, जो पाठक को स्तब्ध नहीं; बल्कि सोचने का स्पेस देती है । लेखक ने इसी चरमोत्कर्ष
पर कथा का समापन इस पंक्ति से किया है – …
… सीटी बजाता हुआ रुक गया मेरे पास , उदासी से भरी मुस्कराहट लिये । यह
एक परिपक्व समापन वाक्य है ।
यहाँ मुन्ना मनोवैज्ञानिक रूप से विजेता की भूमिका में दिखाई पड़ता है; लेकिन उसकी उदासी साफ कहती है कि उसकी माँग ( जिद्द
) को क्यों नहीं स्वीकारा गया और उसे मनाया क्यों नहीं पापा ने ।
अन्त पर पिता और मां की मन:स्थिति का उल्लेख न करके लेखक
ने पाठकों के सोचने के लिए मैदान खुला छोड़ दिया है । लघुकथा विधा में इस प्रकार का
बहु आयामी अन्त प्रभावशाली समापन की श्रेणी में गिना जाता है । इधर अब भारतीय फिल्मों
में भी बहु आयामी अन्त ( ओपन एंड ) का प्रयोग शुरू हुआ है ।
चैतन्य त्रिवेदी लीक से हट कर सघन वैचारिक लघुकथा लिखने वाले हमारे समय के महत्वपूर्ण
रचनाकार हैं । उन्होंने अपने समय से आगे की शैली में भी लघुकथाएँ रची हैं । एक विशेष
पाठक वर्ग उन्हें बहुत पसन्द करता है । तो एक वर्ग को उनकी लघुकथाएँ गरिष्ठ लगती हैं
। कुछ आलोचक उनकी बहुत-सी रचनाओं को लघुकथा के फॉर्मेट के बाहर मानते हैं ।
चैतन्य त्रिवेदी प्रचलित शैली के भी अद्भुत लेखक हैं। मुन्ने की समझ उसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने ऐसी बहुत सी
अच्छी लघुकथाऐं लिखी हैं ।
विवेच्य मुन्ने की समझ लघुकथा में भरपूर कथातत्त्व के साथ एक जटिल विषय
को बहुत ही सहज ढंग से सरल भाषा में रखने में लेखक सफल रहा हैं । इस रचना का गठन ,
प्रवाह और प्रभाव इसे अति विशिष्ठ लघुकथा की श्रेणी ला खड़ा करता है ।
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1-स्त्री कुछ नहीं करती!
अशोक भाटिया
वह सवेरे सबसे पहले उठी, भैंस को चारा देकर जंगल-पानी गई, फिर आकर पति और सास-ससुर को चाय पिलाई, फिर भैंस को दुहने के बाद नहलाया, फिर उसका गोबर उठाकर उपले पाथने ले गई, फिर आकर आटा गूँथा, सब्जी-रोटी बनाई, फिर दोनों बच्चों को उठाया-नहलाया और खिला-पिलाकर स्कूल के लिए तैयार किया, फिर दही बिलोई, फिर सास-ससुर और पति को नाश्ता कराया, फिर सबके जूठे बर्तन किए, फिर खुद नाश्ता किया, फिर भैंस को चारा दिया, फिर घर में झाड़ू-पोंछा लगाया, फिर कपड़े धोने चली गई, फिर नहाकर दोपहर की रोटी बनाई और खिलाई, फिर खेत में गुड़ाई करने गई, वापसी में भैंस के लिए सिर पर चारा लेकर आई, आकर खाना बनाया और बच्चों व सास-ससुर को खिलाया, फिर से बर्तन साफ किए, फिर सबको गर्म दूध पिलाया, बच्चों को सुलाया, फिर चौपाल में ताश ख्ेालने के बाद शराब पीकर आ धमके डगमगाते पति को सँभाला, उसकी गालियाँ सुनीं, उसे खाना खिलाकर चैन की नींद सुलाया, फिर सन्नाटे में बचा-खुचा खाया और थकान के साथ सो गई…
फिर सवेरे सबसे पहले उठी…..
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2-मुन्ने की समझ
चैतन्य त्रिवेदी
अब वह किसी बात की जिद नहीं करता। बात उस दिन की है, जब वह बाजार में खिलौने वाली रेल के लिए जिद कर बैठा। वह मचल गया था। समझाने के बावजूद नहीं मान रहा था। घर लौटकर मैंने उसे बुरी तरह पीट दिया, जिस तरह अपराधी पीटे जाते हैं। उस दिन सारे दिन घर में खामोशी छाई रही। मुन्ने की आवाज खामोशी से परास्त हो गई, मानों चुप्पियाँ पूछ रही हों हमसे, ‘हँसता-बोलता-चिल्लाता मुन्ना किधर है?’
वह अपने कमरे में चुपचाप लेटा हुआ था। दरअसल उसके पास जाने की हिम्मत न मुझमें थी, न उसकी माँ के पास। उसकी माँ को डर था कि वह मुन्ना के पास जाएगी तो फफक पड़ेगी। मैं ग्लानि महसूस कर रहा था, मुझे उसे इस तरह नहीं पीटना चाहिए था। उसकी माँ ने मुझसे कोई बात नहीं की। आखि र वह खिलौने के लिए जिद कर रहा था। कितना महँगा खिलौना था। फिर भी, बच्चे जिद तो करेंगे ही खिलौने देखकर। खैर, मैं पसोपेश में था, कैसे मनाऊँ उसे। कैसे उसके पास जाऊँ। शाम को साढ़े पाँच, पौने छह का टाइम था। गिलहरी की आवाज सुनाई दे रही थी। तभी मुन्ना कमरे से रेल की सीटी की आवाज-सी करते हुए बाहर आया। रेल की सीटी की आवाज से घर की चुप्पी दरक गई। मैंने देखा, चार-पाँच पुराने रखे कंपास के छोटे-छोटे डिब्बों को एक के पीछे एक रस्सी से बाँध दिया है उसने और वह प्लेटफॉर्म पर ठहरती गाड़ी की तरह सीटी बजाता हुआ रुक गया मेरे पास, उदासी से भरी मुस्कुराहट लिये।
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