‘मुखौटा’ लघुकथा का पाठ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था। पढ़ी गई लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथा लेखकों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक)के रूप में प्रकाशित किया गया था। लगभग 29 वर्ष बाद लघुकथा और उसपर विद्वान् साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-
मुखौटा
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दुकान में गए।दुकानदार ने भालू,शेर, भेड़िया, साधु, संन्यासी के मुखौटे उनके चेहरे पर लगाकर देखें। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दुकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दुकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनाव क्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतार कर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठे-वह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।
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1-डॉ. स्वर्ण किरण
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की ‘मुखौटा’। इसमें आज की व्यवस्था पर गहरी चोट की गई है। आज के नेता लोग सही अर्थ में नेता नहीं हैं। नेता ‘येन केन प्रकारेण’ चुनाव जीत जाते हैं और अपने हानि-लाभ को अधिक महत्त्व देते हैं जनता के हानि-लाभ से उनको कोई लेना देना नहीं है। किसी प्रकार से चुनाव जीतना है, यही एक मात्र उद्देश्य रहता है। करारा व्यंग्य है। नेता को कैसा होना चाहिए इस पर ही विचार करने के लिए बाध्य होते हैं हम इस लघुकथा के द्वारा।
2-डॉ.सतीशराज पुष्करणा
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमाशु’ की लघुकथा ‘मुखौटा’ एक व्यंग्यपरक रचना है जो कि आज की व्यवस्था पर जबरदस्त चोट करती है। कि आज हमारे यहाँ क्या व्यवस्था है, चुनाव का क्या महत्त्व है और चुनाव किस तरह से जीते जाते हैं, इसका बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण हुआ।
3-गम्भीर सिंह पालनी
पुष्करणा जी की लघुकथा ‘बोफोर्स कांड’ एवं ‘हिमाशु’ जी की ‘मुखौटा’ राजनीतिक लघुकथाएँ हैं और दोनों ही आज की स्थितियों पर अच्छा व्यंग्य करती है।
4-जगदीश कश्यप
‘मुखौटा’ में एक व्यंग्य….जिसमें आज की राजनीति पर दस्यु संस्कृति कितनी हावी है, इसका सीधे-सीधे सम्प्रेषण श्री ‘हिमाशु’ के द्वारा किया गया है।
5-डॉ. शंकर पुणतांबेकर
लघुकथा के स्वरूप को या उस स्वरूप पर विचार करने की दृष्टि से यह कहना चाहूँगा कि लघुकथा में सम्प्रेषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ‘हिमाशु’ जी की ‘मुखौटा’ का उल्लेख करना चाहूँगा। जीत के बाद जब वह मुखौटा देखता है ,तो जो यह डाकू का मुखौटा है, इससे जो बात बनती है ,वह आज हमारी पूरी व्यवस्था को नंगा कर देती है तो मूल बात सम्प्रेषण की हैं। लघुकथा में बहुत कुछ एक घने रूप में….बहुत ही काम्पेक्ट रूप में….बहुत ही साहसिक रूप में आपको अपनी बात कहनी होती है और उसके लिए उतने ही काम्पेक्ट प्रतीक का चयन करना होता है।
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