अग्रवाल साहब अपने नए बने भवन को घर में बदलने के लिए इंटीरियर डेकोरेटर को अपनी पसंद- नापसंद, आवश्यकताएँ एवं प्राथमिकताएँ समझा रहे थे –
” देखिए, यह कमरा बच्चों का होगा, सो इसकी रंग योजना जरा शोख रंगो की होनी चाहिए, पीला रंग तो जरूर हो और… बच्चों की स्टडी टेबल खिलौनों के लिए क्या व्यवस्था करनी है ,ये तो आप बेहतर अब इधर देखिए, ये …लॉन में खुलने वाला कमरा हमारी माँ के लिए है। इसकी कलर स्कीम सोबर और अलमारियाँ नीची होनी चाहिए।”
“सर! बुरा न माने तो एक बात कहूँ? ये तो घर का सबसे बड़ा कमरा है, इसे तो…मास्टर बैडरूम होना चाहिए।”
“बिलकुल ठीक कहा, मेरी माँ हमारी मास्टरनी ही तो है। हा हा! दुग्गल जी मेरी माँ बड़ी उम्र के कारण ज्यादा चलने फिरने में असमर्थ हैं, इसलिए घर में आने वाले मेहमानों को उनके कमरे में आके ही मिलना होता है और नज़दीकी मित्र और रिश्तेदार तो चाय नाश्ता भी उन्ही के कमरे में करते हैं। उनके कमरे में ही पूजाघर भी बनेगा, तो वार-त्योहार पर पूजा पाठ वगैरह भी यही संपन्न हुआ करेंगे।
दुग्गल जी वयोवृद्धा माँ मेज पर खाना खाने नहीं आ पातीं, इसलिए रात का खाना पूरा परिवार उन्ही के कमरे में टीवी देखते हुए खाता है और हाँ… लॉन की ताजी हवा, हरियाली और रंग बिरंगे फूलों की सुंदरता की घर में सबसे ज्यादा ज़रूरत भी तो माँ के स्वास्थ्य को ही है।”
इंटीरियर डेकोरेटर की शर्मिंदा आँखों में घर के सबसे छोटे, सीलन भरे कमरे में अकेली पड़ी अपनी वृद्धा माँ की छवि घूम रही थी।
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