मानसिकता/ नरेंद्र कौर छाबड़ा
पंद्रह वर्षों के पश्चात अचानक अपने छात्र जीवन के सहपाठी जितेन को अपने घर आया देख दिनेश क्षण भर के लिए विस्मित रह गया. कुशल क्षेम के बाद पूछा – “इतने वर्षों बाद आज अचानक कैसे याद आ गई? कैसी कट रही है जिंदगी? इतने साल कहाँ थे? क्या कर रहे हो आजकल…?”
“भाई, तुमने तो सवालों की बौछार ही कर डाली. खैर, तुमने तो काफी तरक्की कर ली है। इतना भव्य मकान , बड़ी फैक्टरी, सुख सुविधाएँ सभी को जुटा लिया है पर दोस्त सबका भाग्य एक जैसा कहाँ होता है। स्नातक होने के बाद मैंने नौकरी के लिए बहुत धक्के खाए। आखिर एक छोटी -सी नौकरी हाथ लगी जो कुछ समय बाद ही छूट गई। कुछ वक्त बेरोजगारी से गुजरने के बाद एक फैक्टरी में अच्छी नौकरी लग गई। तनख्वाह भी अच्छी थी पर पिछले दिनों वह फैक्टरी बंद हो गई। बहुत घाटे में चल रही थी और कर्ज से दबी हुई थी। अब फिर बेकार हूँ ….”
दिनेश का मस्तिष्क तेजी से दौड़ने लगा-“बस , अब जितेन या तो उससे पैसे माँगेगा या उसकी फैक्टरी में नौकरी. अगर इसे पैसे दिए तो डूबते खाते में जाएँगे और मेरी फैक्टरी में तो अभी कोई रिक्त स्थान है ही नहीं. इसे कैसे टालकर यहाँ से चलता करूँ …”
अभी वह इन विचारों के द्वंद्व में उलझा था कि उसका सात वर्षीय बेटा आया। जितेन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए ₹100 का नोट उसे थमाया और दिनेश से बोला- “अच्छा यार अब चलता हूँ। कॉलेज की ग्रुप फोटो आज अचानक देखी, तो सोचा अभी खाली हूँ सारे दोस्तों से मिल आता हूँ ।कितना लंबा वक्त हो गया था मुलाकात को…..।”
उसके जाने के बाद हक्के- बक्के रह गए दिनेश को शर्म और ग्लानि महसूस होने लगी कि उसने दोस्त को चाय पानी तक नहीं पूछा।