इन दिनों मेरे पड़ोस में रहने वाली अठारह साल की मिनी आंखों में ढेर सारे सपने लिए घूमती रहती है, कुछ पूछने पर झट कहती, “देखना इस बार मेरी मेहनत रंग लाएगी”।
बारहवीं पास करने के बाद मेडिकल की तैयारी में जुटी हुई मिनी ने दिन-रात खुद को किताबों में झोंक दिया था, दुर्भाग्य वश आशा के मुताबिक परिणाम नहीं आने पर निराश हो गयी। उसके लिए मानों सब कुछ बुझ सा गया। बिल्कुल खामोश हो गई थी। एक दिन तो उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया। उसे खोलने के प्रयास में हमें दरवाजे तुड़वाने पड़े। उसकी मम्मी – पापा और मैं सबने मिलकर उसे समझाने का प्रयास किया,
“मिनी क्या हुआ कि मनचाहे मार्क्स नहीं आए क्या यही अंत है बिटिया ?”
” लेकिन क्यों नहीं मिले, मैं तो किसी से आंखें मिलाकर बात ही नहीं कर पाती हूँ ? जी करता है सब छोड़कर कहीं …”
” बस…बस करो मिनी! हमें हमेशा मनचाहे और अनचाहे में संतुलन बना कर चलना चाहिए। यह नहीं कि मनचाहा मिल गया तो पाँव जमीन पर नहीं और अनचाहे को “दुर्भाग्य” मान कर निराशा के गर्त में चले गए। तुम्हें अनचाहे को बदकिस्मती नहीं चुनौती मान कर स्वीकार करना होगा।”
“मगर मैं ने जी-तोड़ मेहनत की थी आप सबने देखा था मैंने कहीं कोई कसर छोड़ी थी ?”
“बस यही सबसे बड़ी बाधा है मिनी,जैसे तुमने यह मान लिया कि “तुमने अपना हन्ड्रेड परसेंट दे दिया,तब आगे के रास्ते बंद हो जाते हैं, तुम सोचने और देखने का नजरिया बदल लो नई सम्भावना दिखाई देने लगेगी”
वो मुझे पकड़ फफक कर रोने लगी।
“अब आगे क्या करूं ? मैं तो किसी योग्य भी नहीं रही “
“बस यही सोचने वाली बात है, ध्यान रहे मिनी अनुकूल परिणाम तुम्हें खुश कर सकते थे पर जो हासिल नहीं उसका क्यूं सोचना। प्रतिकूल परिस्थितियां तुम्हारी कमियों को निखार कर इससे बेहतर गढ़ने को तैयार करेंगी थोड़ा और जोर लगाना पड़ेगा”
हम सब ने उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वह चुप हो गई। लेकिन एक दिन खामोशी में उसे अपनी ही आवाज सुनाई दी होगी।
“क्या सच में यही अंत है? नहीं नहीं ना!”
वो खुद को समेट कर आगे बढ़ी। शायद समझ गई थी। जिसे अंत समझ कर वो हार समझ बैठी है, वह महज शुरुआत है। इस तरह शुरू हुआ उसका उसे खुद को पाने का सफर। आज उसका दाखिला सर्वश्रेष्ठ मेडिकल कॉलेज में हो चुका है। क्योंकि मनचाहा हमें सिर उठाकर चलना सिखाता है,पर अनचाहा हमें गिरकर भी सँभलना सिखा देता है।
-0- नोएडा