डिपार्टमेंट में वह छह ही काम करते थे । सुबह आठ बजे से शाम पाँच बजे तक । एक से दो के बीच लंच टाइम होता था जिसमें वह खाना खाकर आराम भी कर लेते थे और हँसी- मजाक भी । अपने काम को भी वह मिल बाँटकर कर लेते थे और बीच-बीच में हंसी -ठिठोली भी कर लेते थे परन्तु भीतर से सब उदास ही होते थे। यह बात अलग थी कि वह चेहरे पर परेशानी झलकने नहीं देते थे। रोज की तरह आज भी कंता कंटीन में जा कर बारह रोटियों के साथ दाल प्लास्टिक के मगे मे ढलवाकर ले आया है । और भजन (हरभजन) ठण्ठे पानी का जग भर लाया है । सब हाथ धोकर खाना खाने लगे कुलवंत ने बाशे ( सुभाष) को कहा- “आज यार वह गाना सुना दे …मन बहुत उदास है।”
” कौन सा …”
“वहीं पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय “
“अच्छा पहले यह रोटी खा लो ।”
और सुबह से तन्दूर में बनी सूख गई रोटियों को पतली दाल में भीगोकर सब मजे से खाने लगे। रोटी खाकर वहीं फर्श पर लेट गए ।
“सुना दे भाई वहीं गाना ..”
बाशा दीवार का सहारा ले कर गाने लगा। सब ख़ामोश हो गए । कुलवंत न जाने क्यों अपने को रोक नहीं सका। वह भी उस गाने के शब्दों को बन्द आवाज में भीतर ही भीतर गा रहा है। एक खामोशी है। कोई छत को देखते हुए … कोई दरवाजे के बाहर देखते हुए… कोई आँख बंद करके उन शब्दों को जीने का प्रयास कर रहा है। लगता था वह सब उसी को जी रहे हो … और जैसे ही गाना खत्म हुआ …बाशा अपनी कमीज से ही आँखें पोंछने लगा क्योंकि गाते- गाते उसकी आवाज भारी हो गई थी और आँखें भर आईं थी सभी ने ताली बजाकर बाशे का उत्साह बढ़ाया ।
“हमारी जिंदगी भी तो उस पिंजरे के पंछी की तरह ही तो है । हाँ हम सब पिंजरे में कैद है ।”
‘‘अरे चलो उठो दो बज गए हैं । अभी बहुत काम बाकी है।’’ देखते ही देखते वह सब सामान्य होने लगे और अपने को हँसाते हुए काम में जुट गए। वह मजदूर जो थे। दूसरे शब्दों में कहें तो मजबूर जो थे।
-0-रमेश कुमार संतोष, सम्पर्क 9876750370
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सितम्बर 2026
देशमजदूर Posted: November 1, 2025
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