जून 2026

दस्तावेज़भिखारी का धर्म     Posted: June 1, 2019

‘‘अल्लाह के नाम पर कुछ मिल जाए बेटा! मालिक तेरा घर रोशन और आबाद रखेंगे! खुदा तुम्हें बरक़तें देगा बेटा! इस भूखे पर भी रहम खा।’’

            भिखारी की आवाज जब काफी देर तक गूँजती रही तो झुंझलाता हुआ घर का नौकर बाहर निकला और डपटते हुए बोला, ‘‘ये हिन्दू का घर है बाबा! यहाँ अल्लाह के नाम से कुछ निकलने वाला नहीं।’’

            ‘‘बेटा! बड़ी जोरों से भूख लगी है। पाँच दरवाज़ों पर दस्तकें दे चुका हूँ, पर कोई नहीं सुनता। अगर ‘भगवान’ के नाम पर ही कुछ मिल जाए ,तो ले आओ। बड़ी मेहरबानी होगी।’’

            ‘‘अच्छा बाबा! तुम यहीं ठहरो, मैं अन्दर जाकर मालकिन को बोलता हूँ।’’

            नौकर के अन्दर जाते ही भिखारी बुदबुदाया, ‘‘भला भिखारी का भी कोई धर्म होता है? ये सब तो पैसे वालों के चोंचलें हैं।’’ इसके साथ ही वह भिखारी वहीं फर्श पर बैठ गया और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, मानो अपने ऊपर से कोई बहुत बड़ा बोझ उतार फेंका हो उसने।

पड़ताल:राधिका रमण अभिलाषी

शीर्षक: ज्ञानात्मक अर्थ-बोधक।

कथ्य: सीमित और साधारण। रूपात्मक।

चरित्र: नाटकीय परिदृश्य की यथावत् अनुकृति।

रंजन-संघंर्ष: अन्तर्द्वन्द्व की अपनी सीमा, अपनी भूमिका। मूल्यनिष्ठित व्यंग्य का विनियोग देशकाल के अनुसार। वातावरण-जन्य कहानी का गूढ़ शब्द-विचार।

भाषा-शैली: व्यक्तिकृत मूल्य-विधान का सहोदर है जिससे कथा-यात्रा में बहुकोणीय दृष्टि से सार्थक शब्द-योजना, वाक्य-विन्यास, भाषा-प्रवाह आदि से सुनियोजित वातावरण-निर्माण होता है। यहाँ चरित्र (भिखारी) की गम्भीरतम संवेदनाओं की सफल अभिव्यक्ति हुई है। इस वातावरण में अथवा कथ्य-आवेष्टन में सम्बद्ध चरित्र के अन्तर्मन की, बल्कि स्पष्ट है कि कथाकार के अन्तर्मन की अभिव्यक्ति हुई है। इसी से यहाँ एक वायुमंडल प्रस्तुत हो गया है जिससे इस शब्दविचार मंे शील-निरूपण अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली बन गया है।

लेखकीय उद्दिष्ट विधान साम्प्रदायिक भावना का विखंडन करता है तथा सर्वधर्म समन्वय की स्थापना। द्वन्द्व में पारम्परिक संकीर्णता का पर्दाफाश। चरम-बिन्दु के तहत-‘‘भिखारी का भी कोई धर्म होता है।’’ मानवीय संदेश का प्रकाश। यह लघुकथा साम्प्रदायिक संकीर्णता का विखंडन करती है, यही इसका मूल उद्देश्य भी है।

            यह इसके शल्य-परीक्षण से स्पष्ट होता है।

(सन्दर्भ: डॉ. सतीशराज पुष्करणा द्वारा संपादित वृहद् लघुकथा-संकलन ‘कथादेश’ से)

वृहद लघुकथा-संकलन: सम्पादक डॉ सतीशराज पुष्करणा; अयन प्रकाशन,1/20, महरौली, नई दिल्ली 110030,प्रथम संस्करण 1990,मूल्य 300/-, पृष्ठ:700

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