हर गुजरते स्टेशन पर यात्रियों का चढ़ना-उतरना ‘ई एम यू’ की अपनी ख़ासियत है, जो अनजाने में एक कमी का अहसास भी दिलाती है और इसी कमी का फ़ायदा अक़्सर मेरे जैसे लोग उठाते हैं। आज भी पिछले कई स्टेशन से सीट के नीचे पड़े एक ब्रीफ़केस पर मेरी नज़रें लगी हुई थीं। भीड़ ज़्यादा नहीं, तो इतनी कम भी नहीं थी कि आसपास के यात्रियों पर ध्यान रखा जाए। हालाँकि यह पक्का नहीं था कि ब्रीफ़केस का मालिक डिब्बे में ही है, या भूल से अपना सामान छोड़ कहीं उतर गया है। बहरहाल ट्रेन आख़िरी स्टेशन की ओर बढ़ रही थी और मेरा दिमाग़ अपनी प्लानिंग पूरी कर चुका था।
आख़िरी स्टेशन आते-आते ट्रेन की स्पीड धीरे हो गई। मैंने ब्रीफ़केस उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया, कि ठीक उसी समय दरवाजे के पास खड़े मेरे हम-उम्र सहयात्री ने मुझे पुकारा-“भाई तुम्हारी सीट के नीचे मेरा ब्रीफ़केस पड़ा है, जरा उठाकर मेरी ओर बढ़ा दोगे।”
एक ही पल में मेरी योजना धराशायी हो गई। मायूस होकर मैंने उसकी अमानत उसे देने के लिए ब्रीफ़केस को उठाया ही था कि अनायास ही मेरे दिमाग़ में एक बात कौंध गई और मैं कुछ तेज आवाज़ में बोल उठा- “लेकिन भाई तुम तो पीछे ओखला स्टेशन से ही चढ़े हो न, फिर ये ब्रीफ़केस तुम्हारा कैसे हो सकता है?”
मेरी आवाज़ के उत्तर में ही पास ही खड़े एक और यात्री की तेज आवाज़ डिब्बे में गूँज गई- “चोर है साला, ऐसे ही दूसरों का सामान ले जाते हैं ये लोग। पकड़ो इसे।”
उसके इतना कहते ही, एक साथ दो बातें हुई। पहली, दरवाज़े के पास खड़ा वह यात्री धीरे होती ट्रेन से कूदकर भाग निकला। और दूसरी, जाने कहाँ से डिब्बे की भीड़ में से ब्रीफ़केस का असली मालिक निकलकर सामने आ खड़ा हुआ और. . . “आज तो तुमने बचा लिया मेरा सामान भाई, वरना मैं तो लुट जाता। मेहरबानी भाई, तुम जैसे भले आदमियों से ही ये दुनिया चल रही है.” कहते हुए वह ब्रीफ़केस लेकर यात्रियों के बीच उतर गया; और पीछे ख़ाली डिब्बे में खड़ा रह गया मैं अकेला. . . भला आदमी।
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