नीता जबसे मायके आई है, उसकी बेटी प्रज्ञा नानी से ही बतियाती जा रही है। उसकी तोतली बोली सुन नानी शहद-शहद हुई जा रही है। नानी-नातिन दोनों सहेलियाँ बनी एक-दूजे में ही खोई हुई हैं। नीता से बात करने की फ़ुरसत न बेटी को है, न माँ को।
उन दोनों को गलबहियाँ डाले बातें करते सुन नीता को बीते पाँच साल कैमरे की रील जैसे दिखने लगे हैं। जात-समुदाय से बाहर जैन समाज के लड़के से प्रेम-विवाह क्या किया कि नीता के मॉं और मायका सब छूट गए। समाज के दबाव में माँ अजनबी और पत्थर दिल बन गई। उसे नई-नई गृहस्थी में माँ से मिलने वाले सहारे की कितनी अधिक ज़रूरत थी। साल भर में ही प्रज्ञा गोद में आ गई। प्यार-प्रेम के बीच जिम्मेदारियाँ भी अपनी जड़ें पसार रही थी। छोटी बच्ची, ऑफ़िस, पति का ऑफ़िस सबके बीच वह कितनी उलझ कर रह गई थी।
लेकिन समय की चोट से माँ की नाराज़गी की चट्टान धीरे-धीरे टूट ही गई।
आज प्रज्ञा का जन्मदिन है। सही अवसर देख नीता बेटी को लेकर आ गई। नानी ने प्रज्ञा को पूरे घर की सैर करवा दी। जन्मदिन की ख़ुशी में नानी हलवा बनाकर पूजाघर में भगवान को भोग लगा रही थी। पीछे-पीछे प्रज्ञा भी पहुँच गई। आश्चर्यचकित होकर कहने लगी “नानी आपके भगवान कपड़े पहनते हैं? हमारे भगवान तो ऐसे ही रहते हैं।”
नानी की हँसी का झरना अब रुकने का नाम नहीं ले रहा था। हँसते-हँसते नानी की आँखें भर आई। नातिन को गले लगाते हुए बोली “अब तुमसे कभी दूर नहीं रहूँगी, भगवान कपड़े पहनें या ऐसे ही रहें, मेरी भगवान तो तुम हो” कोमल हथेलियों से प्रज्ञा ने नानी की आँखें पोंछ दी।
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