
लघुकथा विधा में विशिष्ट स्थान रखने वाले भगीरथ परिहार का प्रथम लघुकथा संग्रह ‘पेट सबके हैं’ (1996) के बाद दूसरा लघुकथा संग्रह‘ बैसाखियों के पैर’ इक्कीस वर्ष बाद प्रकाशित हुआ। इतने अन्तराल के बाद लघुकथा संग्रह आना लेखक के धैर्य, परिश्रम, साधना का परिचय करवाता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण इस संग्रह की महता स्वतः ही बढ़ जाती है।
धर्मनिरपेक्ष देश में साम्प्रदायिकता कब हिंसक रूप धारण कर लेती है, कुछ कहा नहीं जा सकता। एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए बड़ी उलझन की स्थिति बन जाती है। धर्म का काम जोड़ना है, मानवता की राह दिखाना है पर यहाँ तो इसकी आड़ मे दूसरा ही खेल खेला जा रहा है।
नानक जी ने कहा था ‘धर्म को पकड़ो और धर्म को छोड़ दो’। उनके ऐसा कहने के पीछे लोगों द्वारा धर्म का अंधानुकण ही रहा होगा। आज भी हम वहीं खड़े हैं, धर्म की आड़ में फतवे जारी होते हैं। धर्म का सहारा लेकर हिंसा और आतंक फैलाया जाता है। लघुकथा ‘डर’ में दो लड़कियों पर तेजाब इसलिए फेंका जाता है कि वे बुरके में नहीं थी। विचारणीय विषय यह है कि सभ्यता के विकास के बावजूद हम उसी मध्यकाल में क्यों रहना चाहते हैं, जिसे इतिहास का अंधकार युग कहा जाता है।
‘धार्मिक होने की घोषणा’ लघुकथा में भी लगता है जब तक तथाकथित धर्म के लोग हिंसक कार्य नहीं करते तब तक उनको धार्मिक होने का प्रमाण पत्र नही मिलता। लघुकथा आम आदमी से भी प्रश्न करती है कि हम कहा खड़े हैं। क्या हम प्रेम की ऐसी बौछारें कर पाते हैं ,जिससे इस नफरत की आग को बुझाया जा सके।
लघुकथा ‘आदमी की मौत’ में भी धर्म का मर्म समझे बिना अंधानुकरण करने वालों की आँखें खोलती है। ‘आदमी की मौत’ संवेदनहीन होते समाज का जीवंत चित्रण है। कितने दुख की बात है कि रामायण का पाठ सुनने को तो समय हैं लेकिन ठंड एवं भूख से दम तोड़ते आदमी को बचाने का नही। वाह रे आदमी फिर क्या सीखा धार्मिक ग्रंथ रामायण से। दूसरा, हम असहायों की सहायता स्वयं न करके ‘मदर टैरेसा’ की ओर देखते हैं। लघुकथा की विशेषता यह है कि उसमें ठंड से एक आदमी की मौत होती दिखाई देती है बल्कि मौत हमारी इंसानियत की होती है। कथ्य को कथानक कैसे बनाया जाता है हमें यहाँ से सीखने की आवश्यकता है।
मनुष्य पता नहीं बंधन से इतना क्यों डरता है। जबकि बंधन का अपना महत्व है। नदी भी तभी बह पाती है जब उसके दो किनारे होते हैं। लघुकथा ‘ असीम आकाश’ में पात्र जो विवाह को बंधन मानता तो वहीं पिता उस बंधन की कितनी सुन्दर व्याख्या करता है-विवाह होना जीवन की महत्वपूर्ण और सुखद घटना है। सृष्टि के नियमों का पालन करना मजबूरी नहीं, आनंद प्रदान करता है। विचारों से ओतप्रोत वाक्य गागर में सागर भरते प्रतीत होते हैं। लघुकथा के समाप्त होते ही पाठक के सोचने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। महत्त्वाकाक्षाएँ मन का चैन छीन लेती है।वास्तविक सुख से वंचित कर देती है।
‘बैसाखियों के पैर’ लघुकथा प्रतीकात्मक रूप में लिखी एक कालजयी रचना जान पड़ती है। यह बोध करवाती है कि बैसाखियां भले ही मनोकामना पूरी कर देे पर उसमें स्वाभिमान नहीं रहता। यदि हमें स्वाभिमान से जीना है तो बैसाखियों का सहारा छोड़ना होगा.. स्वाभालंभी बनना होगा। अपनी टांगों पर भरोसा रखना होगा, और वह भरोसा अपने गुणों ,आत्मविश्वास, दुढ़इच्छाशक्ति से आयेगा। संदेशात्मक लघुकथा।
लघुकथा ‘ब्ंादी जीवन’ में यह भाव निकल आता है कि प्रेम बोया नहीं जाता स्वयं अंकुरित होता है। प्रेम पर उम्र का कोई बंधन नहीं होता विवाह में भी प्रेेम है। लेखक इस धारणा को तोड़ता है कि प्रेम केवल युवावस्था में प्रेमी- प्रेमिका के बीच ही होता है। प्रेम मन के निश्छल भाव है और ये भाव कभी भी प्रकट किए जा सकते हैं।
अति हर चीज की बुरी होती है। जहाँ प्रेम रिसे वहाँ रिश्ते होते हैं। और जहाँ प्रेम नहीं वहाँ रिश्तेदार अतिथि बन जाते हैं। रिश्तेदार की अपेक्षा अतिथि के प्रति अपनत्व की भावना कम होती है। लघुकथा ‘अतिथि’ में यह भाव महसूस किया जा सकता है।
गरीबी एक अभिशाप है। गरीबी मनुष्य को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा देती है कि उसे जिंदगी और मौत में कोई फर्क नजर नहीं आता। वह अपने घर की बदतर हालात को देखकर यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि यदि कोई मेरी मौत के बदले मेरी परिवार का पालन पोषण करने की गारंटी दे तो मैं मौत को गले लगा सकता हूं। लघुकथा ‘बलिदान’ मे अनेक व्यंग्य तीर निकलते हैं- राजा निर्दयी है,दरबारी चाटुकार है। उनमें यह सोचने की शक्ति नहीं कि एक मां अपने बेटे की बलि से कैसे खुश होगी।
यह कैसी विडम्बना है कि कहने को सब इंसान बराबर। लेकिन एक इंसान दूसरे इंसान का मैला अपने सिर पर ढोने को मजबूर । यहाँ देश के विकास के नारे खोखले नजर आते हैं लघुकथा‘ चम्पा’ में।
एक जगह काशीनाथ सिहं लिखते हैं- ‘मशाल जलाने से पहले माचिस की तीली जलानी पड़ती है।’ यह उक्ति लघुकथा ‘चुनौती’ में चरितार्थ होती दिखती है। यह बात शोषण की चक्की में पिसते दलितों को समझ आने लगी है। दलित कोई जाति विशेष के लोग नहीं बल्कि जिनका शोषण होता है वे सब दलित ही हैं। लघुकथा यह भी संकेत करती है अन्याय करने वाला जितना दोषी है उतना ही दोषी अन्याय सहने वाला भी होता है। पात्र के मुख से यह कहलवाना ‘बिना लड़े तो इनके अभिमान श्रेष्ठता और उच्चता की गांठे टूटेगी भी नहीं। सम्मान पाना है तो लड़ना होगा।’ दलितों के पक्ष में खडी एक बेहतरीन लघुकथा है।
साहित्य अपने समय का दस्तावेज होता है। दलित अब विकास की राह पर कदम बढ़ा रहे हैं लेकिन सवर्णों की आँखें उनके विकास को सहन नहीं कर पा रही है। लघुकथा‘ घणा मान सू बुलाया में ऐसे ही सवर्णों का मनोविश्लेषण करती है। लघुकथाकार को अपनी बोली प्यारी लगती है वह उसका मोह नहीं छोड़ पाए।
‘गुफाएँ प्रतीकात्मक शैली में लिखी बड़ी ही प्रेरणादायक लघुकथा है। यदि सपनों को पंख लगाने हैं, उन्हें साकार रूप देना है तो रहस्य और अंधेरे को बेपर्दा करना होगा। जीवन में दो ही रास्ते मिलते हैं एक बना बनाया और दूसरों निर्मित करना पड़ता है लेकिन उसके निर्माण में त्याग एवं समर्पण का होना आवश्यक है। उसके बाद जो आन्ंद मिलेगा,वह अकथनीय होगा। लघुकथा में स्पष्ट है कि हमें गुफाओं को पार करना होगा। पार करने में जो खतरे आयेंगे उनका जौखिम तो उठाना पड़ेगा। अर्थात मंजिल पाने के लिए संघर्ष करना होगा । ऐसा करने पर कृपा करते भगवान शिव मिलेंगे, प्रेम के रंगों से सजी अजंता अलोरा के चित्र मिलेंगे। यानि कष्टों के बाद सुख मिलेगा।
आज लड़कियां अपना दीपक स्वयं बन रही है, इसलिए हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है। वे रूढ़िवादी परम्पराओं की जंजीरे को अपने विवेक, आत्मविश्वास, दृढ़ इरादों से तोड़ रही है। इसका सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती है लघुकथा‘सुनीता’। बालविवाह के मोड़ पर खड़ी हर लड़की की प्रेरणास्रोत बनती है सुनीता।
‘मेरी कहानी’ लघुकथा महिला सशक्तीकरण की सशक्त लघुकथा है। लघुकथा भारतीय समाज का यथार्थ चित्रण करती है- ‘यूँ तो भारतीय परिवार मां को पूजनीय मानते हैं लेकिन एकल मां को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी वे हकदार है।’ इसके बावजूद औरत पति के साथ न होने पर भी अपनी बेटियों तथा स्वयं को विकट परिस्थितियों से लड़ना सिखाती है।
देश में बेरोजगारी की समस्या इतनी भयंकर है कि युवको को अपने शौक दफन करने पड़ रहे हैं। लघुकथा ‘प्रतिभा का विकास’ ऐसे ही युवकों के सपनों के दफन हाने की कथा है।
‘चीखें’ लघुकथा एक अलग तरह की लघुकथा जान पड़ती है। हम स्त्री के जिंदा जलने को गर्व का विषय कैसे बना सकते हैं। उसे इतिहास में महिमामंडित कैसे कर सकते हैं। कितने दुख की बात है कि हमें जलती हुई स्त्री की चीखें सुनाई नहीं देती। लघुकथा अतीत को वर्तमान से जोड़ देती है और आज भी स्त्रियों के साथ वही दुर्व्यवहार। मेरे देश की संसद चुप हो जाती है। बहुत कुछ चिंतन मनन के लिए बाध्य करती हैं लघुकथा।
इन लघुकथाएँ के साथ-साथ ‘सपने में मां’ वात्सल्यी माँ के दर्शन होते हैं,‘स्पर्टाकस का जन्म’ में कथा के अन्दर कथा का अदभुत रूप देखने को मिलेगा, ‘सुपारी’ लघुकथा पढ़कर दंग रह जायेंगे कि दूसरा का न्याय करने वाले न्यायाधीश गुंडों को सुपारी देकर न्याय पाता है। सभी लघुकथाएँ एक से बढकर एक।
इन लघुकथाओं में भाषा शैली
के अन्तर्गत सुन्दर उपमाएँ, बिम्ब, भावानुरूप
शब्दावली सोने पे सुहागा बन जाती है। मुझे ये अनुभव की आँच पर पकी लघुकथाएँ लगती
है क्योंकि इतने अंतराल के बाद लघुकथा संग्रह आना इस बात की गारंटी देता है। मैं दावे से कह सकता हूं जो भी इन लघुकथाओं को
पढ़ेगा वह बार-बार पढ़ेगा। मेरा विश्वास है यह संग्रह साहित्य जगत में विशेष ख्याति
अर्जित करेगा इसी आशा के साथ लेखक को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
बैसाखियों के पैर( लघुकथा-सग्रह): भगीरथ परिहार, पृष्ठ: 162 , मूल्य: 280 ( पेपर बैक), प्रकाशक: एजूक्रिएशन पब्लिशिंग , आर-ज़ेड, सेक्टर-6, द्वारका , नई दिल्ली-110075