“बताइए शिवराज, बाबू, क्या आदेश है? आपने कहलवा भेजा तो मैं मिलने आ गया।” रंजीत सिंह ने मुस्कराते हुए पूछा।
सुनते ही शिवराज बाबू की बाँछे खिल गईं। दिल के सारे अरमान जो उन्होंने अपने बेटे के विवाह के लिए वर्षो से संजोए थे, एक-एक करके उन्हें सुना डाला।
रंजीत सिंह ने भी मन मसोस कर आखिर उनकी सभी माँगों को चाय के अंतिम घूँट के साथ स्वीकार कर ही लिया। बेटी बड़े पदाधिकारी के घर में जा रही है, एक बाप को भला और क्या चाहिए। चाय का प्याला मेज पर रखते हुए उन्होंने आहिस्ते से कहा- “मुझे सब मंजूर है लेकिन मेरी भी एक शर्त है।”
“कौन सी शर्त……? बोलिए समधी जी।” सुनते ही शिवराज बाबू की भौंहें चढ़ गईं।
“यही कि मेरी बेटी आप लोगों से बात करेगी, अगर बेटी को आप लोगों का बात-व्यवहार पसंद आ गया तो रिश्ता पक्का ही समझिए।”
“अरे…..! बेटे वाले हम हैं और निर्णय आपकी बेटी करे? बहुत अटपटा लग रहा है। आपको तो सब पता है, बेटे वालों का पलड़ा हमेशा से भारी होता है, फिर यह शर्त……?”
“मैंने आपकी सारी माँगें स्वीकार कर ली हैं। बावजूद इसके मेरी छोटी- सी बात को आप तिल का ताड़ बना रहे है।” रंजीत सिंह ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“नहीं- नहीं ….। यह बात स्वीकार नहीं है, बेटी जात को भी इतना मन नहीं बढ़ाना चाहिए।” शिवराज बाबू ने कड़े स्वर में जवाब दिया।
“सुनिए, मैं यहाँ इंजीनियर बेटी का रिश्ता तय करने आया हूँ, गाय बाँधने नहीं …..।” कहते हुए रंजीत सिंह दरवाजे से बाहर निकल गए।
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