देवीलाल पार्क के लंबे चौड़े ‘वाकिंग ट्रैक’ के सात चक्कर लगा कर थककर बेला बेंच पर बैठी ही थी कि उसकी नज़रों को बाँध लिया सामने से चली आ रही एक वृद्ध जोड़ी ने। ‘ट्रैक सूट’ पहने वृद्ध सज्जन एक हाथ में छड़ी थामें थे और दूसरे में अपनी सुदर्शना वृद्धा पत्नी का हाथ,जिनके गोरे माथे पर सूरज सी बिंदिया दमक रही थी और सफ़ेद बालों के बीच माँग में सिंदूरी रेखा खिंची हुई थी। वे आहिस्ता–आहिस्ता क़दम रखकर चलते हुए आकर बेला की बग़ल वाली बेंच पर बैठ गए। पति ने जेब से रूमाल निकाल कर पत्नी के माथे का पसीना पोंछा और पानी की छोटी सी बोतल का ढक्कन खोलकर उनके हाथ में थमा दी। फिर वे ‘आस्था चैनल’ पर देखे किसी आध्यात्मिक प्रसंग पर चर्चा करने लगे कि अचानक वृद्ध सज्जन खाँसने लगे। पत्नी ने झट पर्स से निकाल कर कोई गोली…शायद विक्स की ,उन्हें थमाई और उठकर उनकी पीठ सहलाने लगी और मिठास से फटकारने लगी,‘मना किया था न कि चाट–गोलगप्पे ना खाओ , पर आप हैं कि….‘उनकी खाँसी थम गई और वह मुस्कुराए,‘तुम्हारी क़सम अब नहीं खाएँगे ।’
बेला की आँखें भर आईं। वह समझ गई कि ये वो बूढ़े पाखी हैं ; जिनके चुरुगन पंखों में प्राण पड़ते ही इन्हें इनके हाल पर छोड़कर दूर कहीं उड़ गए और ये सौम्य–सरल पति–पत्नी एक–दूजे के दिल में जीने का उत्साह और उमंग जगाते हुए बड़े प्रेम से जी रहे हैं…..एक–दूसरे का सहारा बन कर….एक–दूजे के लिए।
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अगस्त 2026
देशबूढ़े पाखी Posted: February 1, 2015
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