अब्दुल गनी कुछ दिनों से कहीं आते-जाते नही। कई दिनों से खेत की तरफ भी नही गए। सत्तर के आसपास उम्र हो गयी है। पहली बार उनमें यह परिवर्तन दिख रहा था। कुछ दिन पहले तक वे मिट्ठू के चाय की दुकान पर बहुत समय बिताते थे। जब तक अखबार का एक-एक लाइन चाट न लें, खिसकते नही थे। तब रशीदा बेगम उनकी कायदे से खबर लेती थी। जैसे ही घर आते तो शुरू हो जाती – रास्ता भटक गये क्या…एक दो रात वहीं बिता लेते…घर आने की क्या जरूरत थी….। उसकी बज्र जैसी आवाज से भी वे नही हिलते। मुँह घुमाकर ही-ही करते हुए चुपचाप एक ओर खिसक जाते; लेकिन अगले दिन फिर उसी दिनचर्या में डूब जाते।
परन्तु उनका यह बदलाव अब उससे देखा नहीं जा रहा था। इस उम्र में वह उनकी नजर भी नही उतरवा सकती थी। रोज उनसे कहती- थोड़ा घूम टहल लो…चौराहे पर चाय ही पी आओ… अच्छा अपने दोस्त लक्ष्मी नारायण से ही मिल आओ। वे चूँ भी नही करते। जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।
बेटा असलम और बहू भी कई दिनों से कह रहे थे कि कहीं घूम फिर लो। एक जगह जमे मत रहो। पर उनपर असर नही हुआ। वे खुद सबको बाहर जाने से मना करने लगे। बेटा असलम सवेरे काम पर जाता और शाम को लौटता था। वे कई दिनों से असलम को लेकर परेशान रहने लगे। जैसे ही उसे आने में देर होती, अँधेरा होने लगता तो पूछने लगते -“असलम आया क्या…..अब तक क्यों नही आया?…..जल्दी घर आना चाहिए….।” वे एक तरफ बड़बड़ाते रहते। पर उनकी कोई नही सुनता। कहीं भी जरा- सी आवाज होती तो चौंक जाते। कोई बाहर से आवाज देता तो सन्न रह जाते। चेहरे पर हवाइयाँ उडने लगती। धीरे-धीरे सबको लगा कि उमर का असर है। शायद दिमाग ठीक से काम नही कर रहा। लेकिन रशीदा को यकीन नही था। एक दिन अकेले में लगी उन्हें कोंचने लगी। बहुत देर तक वे सूनी आँखों से उसे देखते रहे। रशीदा भी पीछे पड़ी रही। जब नही रहा गया तो वे बोले -“बंग्लादेश में हालात अच्छे नही हैं…।”
“हाय अल्लाह!” रशीदा चीख पड़ी। उसका मन हुआ कि उन्हें झंझोड़ दे,”बंग्लादेश से हमको क्या? हम तो हिंदुस्तान में हैं।”
अब्दुल गनी फिर उसे घूरते रहे। रशीदा फिर से उन्हें कोंचने लगी -“इस जेहन में बांग्लादेश कहाँ से घुसा?” उसने उनके सर को हिलाया।
” “
“बोलते क्यों नही?”
“वहाँ दंगा हुआ है न…. ।” वे धीरे से बोले।
“तो….।” रशीदा शेरनी की तरह दहाड़ी।
“इधर का बादल उधर बरसता है….उधर का इधर….,” अब्दुल गनी फुसफुसाए।
रशीदा ने उनके दोनों हाथों को अपने हाथों ले लिया। फिर दोनों एक दूसरे को सूनी नजरों से बहुत देर तक देखते रहे।
-0-