
संदीप ने नीचे आकर स्कूटर स्टार्ट किया, मीता पीछे-पीछे आई और खाने का डिब्बा हाथ थमा दिया। लगभग रोज़ ऐसा ही होता था। मीता संदीप को सड़क तक जाते देखती, हाथ हिलाकर बाय-बाय करती फिर आ जाती ऊपर। संकरी सी गली में बहुत छोटे-छोटे दो-दो कमरों के डब्बेनुमा घर थे।
महीने में 15 दिन ऐसे होते कि सामने वाली खूसट पड़ोसन की नज़र मीता पर पड़ जाती और वो शुरू हो जाती- “आज फिर सुबह सुबह बाँझ के दर्शन हो गए। पूरा दिन खराब जाएगा। यहाँ तो रहने का ही धर्म नहीं है। कलयुग है घोर कलयुग।” एक बार बोलना शुरू होती तो बन्द ही नहीं होती।
संदीप ने मीता से कहा- “अपने फैसले पर एक बार फिर सोच लो, अभी बूढ़ी नहीं हुई हो तुम”
“संदीप एक बार सोच लिया तो सोच लिया रोहन का भविष्य ही अब हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है। इतनी महँगाई में हम एक और बच्चे की स्तरीय देखभाल नहीं कर पाएंगे। रोहन के मन मे यह भी नहीं आएगा कि सौतेली माँ है तो भेदभाव कर रही है। हमें लोगों की नहीं, अपने बच्चे की सोचनी चाहिए। अब बोर्ड के एग्जाम आ रहे हैं, ट्यूशन का खर्चा भी होगा। फिर बड़ी क्लासों के अलग खर्चे।”
“पर मुझे अच्छा नहीं लगता कि ये लोग तुम्हें रोज़ रोज़ यह कहें….”
“इन बाँझ सोच वालों की परवाह करके अपनी सोच बदल लूँ क्या, संदीप तुम इनकी कब से सुनने लगे।” मीता ने हेलमेट पर प्यार से थपकी मारी। हवा में दोनों की मुस्कान तैर गई।