जून 2026

मेरी पसन्दबड़ी बात को कम शब्दों में कहना     Posted: November 1, 2021

लघुकथा की बात करूँ तो मुझे याद है कि घर में साहित्यिक वातावरण हमेशा से था। अखंड ज्योति, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान,धर्मयुग जैसी पत्रिकाऐं आती थीं । अखंड ज्योति की जो छोटी-छोटी कथाएँ होती थीं, वह मुझे आकर्षित करती थीं, मैंने उन्हें पढ़ना शुरू किया। इसके साथ ही चंदामामा, पराग, नंदन जैसी पत्रिकाएँ और पंचतंत्र जैसी बोध कथाएँ बाबूजी हमेशा खरीद कर देते थे।
सारिका में उन दिनों लघुकथाएँ छपना शुरू हो गई थी। तो एक अलग तरह का आकर्षण लघुकथाओं की ओर मैंने महसूस किया। लेकिन लघुकथाएँ जब अखबारों में छपने लगीं , तो लेखकों, पाठकों की बहुत ही उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ मिलीं।
शाबाशी मिलती है तो निश्चित रूप से प्रोत्साहन भी मिलता है। और बस… इस तरह लघुकथा लेखन की यात्रा शुरू हो गई।
इस बीच अध्ययन तो चलता ही रहा जिसमें सभी कुछ पढ़ती रही। इंदौर के साहित्यकारों को भी खूब पढ़ा, जिनमे सतीश दुबे सर का नाम सबसे ऊपर है।
लघुकथा की बहुत बड़ी खासियत है, संक्षिप्त फलक पर, बड़ी बात को कम शब्दों में कहना। यह लघुकथा की माँग होती है, धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी। मेरा रुझान लघुकथा लेखन की ओर बढ़ता गया।सभी विधाओं मे लिखने के बावजूद लघुकथा मेरी प्रिय विधा है…। आज लघुकथा एक नई ऊँचाई पर जा रही है। लघु कथाओं पर अधिवेशन होने लगे हैं… लघु कथाओं पर चिंतन, मनन, गहरी बातें होने लगी हैं।
मैं जब अपनी पसंद की लघुकथा की बात करती हूँ तो उसकी सूची तो बहुत लम्बी है, लेकिन इसमें मेरे जेहन में सबसे पहले सतीश दुबे सर ही आते हैं। उनकी दो लघुकथाएँ मेरे दिमाग पर बिल्कुल टैटू की तरह अंकित है। जिनमें से एक है ‘संस्कार” । संस्कार लघुकथा बहुत छोटी सी है और बहुत बड़ी बात कह जाती है। उसमें बस चार लाइनों में आप पूरी कथा को समझ सकते हैं कि देह व्यापार में लिप्त महिला अपने ग्राहक से एक मिनट ठहरने को कहती है और सामने दीवार पर जो उपदेशी मुद्रा में भगवान की तस्वीर लगी रहती है, उसके चेहरे पर कपड़ा डाल देती है। इतने कम शब्दों में इतनी गहरी बात कही गई है.कि किस परिस्थितिवश वह स्त्री अपनी देह का सौदा करने को मजबूर हैऔर क्योंकि ग्राहक से पैसे लिए हैं, उसके प्रति भी उसका दायित्व है, इसलिए मुस्कुराकर उसके साथ पेश आती है। लेकिन कहीं ना कहीं उसके संस्कार उससे उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर के चेहरे पर कपड़ा डालने को मजबूर कर देते हैं।
अपनी पसंद की एक और लघुकथा जो कि मेरे मानस पटल पर चस्पा है.. वह है चित्रा जी मुद्गल की लघुकथा ‘दूध’। लैंगिक असमानता हम बरसों से सुनते आ रहे हैं.. समाज में देखते भी हैं या कई लोग महसूस भी करते होंगे। एक गिलास गर्म दूध के माध्यम से चित्रा जी ने लघुकथा को इस तरह प्रस्तुत किया है कि उस दूध की गर्माहट.. उसकी सोंधी खुशबू.. इन सब पर वह लैंगिक असमानता भारी पड़ गई है।
लघुकथा में शुरुआत ही इस लाइन से है कि दूध घर के मर्द पीते हैं.. क्योंकि वह मर्द हैं।
एक रोज माँ और दादी घर पर नहीं होती और बिटिया झटपट अपने लिए दूध का गिलास भरने लगती है। उसके होठों तक गिलास पहुंचने से पहले ही माँ आ जाती है और दूध का गिलास हाथ से छूट कर बिखर जाता है। उस बच्ची का जीवन भी उस दूधहड़ी की माटी की तरह बिखरा लगता है। वह डरती है और काँपती हुई माफी माँगने के लिए मैं.. मैं… कहती है। और माँ कहती है दूध पी रही थी कमीनी… माँग नहीं सकती थी..?
बच्ची कहती है माँगने पर तो दिया नहीं…
और तब लैंगिक असमानता पर एक और प्रश्नचिन्ह लगता है। हमारे समाज में सदियों से चली आ रही कन्या पूजन की परंपरा को बहुत बड़ा धता दिखाते हुए माँ जब कहती है कि नहीं दिया तो तुझे कौन सा लठैत बनना है…?
और तब.. आँसू भीगे स्वर का अचानक ढीठ होकर पूछना कि जब मेरे जन्म पर तुम्हारे छातियों में दूध उतरा तो क्या मेरे हिस्से का दूध भी तुमने घर के मर्दों को पिला दिया था…?
लघुकथा पूरे समाज में व्याप्त इस भेदभाव के भयानक चेहरे को उजागर करती है।
(1) *संस्कार*
(
डॉ.सतीश दुबे)
अपने अधोवस्त्र निकालकर वह ग्राहक से मुस्कुरा कर बोली,..एक मिनट ठहरो…!
और उसने सामने की दीवाल पर उपदेशी मुद्रा में विराजमान भगवान के चेहरे पर कपड़ा डाल दिया।
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(2) *दूध*
(
चित्रा मुद्गल)
दूध घर के मर्द पीते हैं।
क्योंकि वे मर्द हैं।
उसका काम है- दूध के गुनगुने गिलास को सावधानीपूर्वक उन तक पहुंचाना। पहुंचाते हुए हर रोज दूध के सोंधे गिलास को सूंघती है। पके दूध की गंध उसे बौरा देती है।
एक रोज मां और दादी घर पर नहीं होतीं तो वह चटपट कोठरी खोलकर दूधहड़ी से अपने लिए दूध का गिलास भरती है और घूंट भरने को जैसे ही गिलास होठों के पास तक ले आती है– घर के उघड़े किवाड़ भड़ाक से खुल उठते हैं। उसके होठों तक पहुंचा गिलास हाथ से छूट जाता है और दूधहड़ी पर जा गिरता है। मिट्टी की दूधहड़ी के दो टुकड़े हो जाते हैं। कोठरी की गोबर लिपी कच्ची फर्श पर गुलाबी दूध चारों ओर फैल जाता है।निकट आई भौंचक मां को देख वह थर-थर कांपती पश्चाताप व्यक्त करती माफी मांगती सी कहती हैं– मैं… मैं…”
” दूध पी रही थी कमीनी..?”
“हाँ…”
” माँग नहीं सकती थी..?”
” मांगा था, तुमने कभी दिया नहीं…”
” नहीं दिया तो कौन तुझे लठैत बनना है, जो लाठी को तेल पिलाऊं…?”
” एक बात पूछूं माँ…? आंसू भीगी उसकी आवाज अचानक ढीठ हो आई।
” पूछ…”
” मैं जन्मी तो दूध उतरा था तुम्हारी छातियों में…?”
” हां… खूब। पर.. पर तू कहना क्या चाहती है…?”
” तो मेरे हिस्से की छातियों का दूध भी क्या तुमने घर के मर्दों को पिला दिया था…?
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