शाम को बेटा जैसे ही लौटा, घर आम की खुशबू से महक उठा। कमला जी ने झट पूछा- ” दशहरी ले आए क्या ?” तो बेटे की ” अं… आं…” को काटकर बहू तपाक से बोली ” नहीं तो अम्मा !”
पर उन्होंने बहू को झट-से झोला लेकर अंदर जाते देख लिया था। उनका दिल जैसे दो फाँक हो गया। देर तक वे अपने सामने रखे बेस्वाद खाने को देखती रहीं। फिर धीरे-धीरे लाचारी में बुझा उनका मन.. गुस्से से सुलगने लगा।
क्या वो जानती नहीं थी परसों खीर बनी थी और उससे 2 दिनों पहले हलुआ ? पर उन्हें मिला क्या ? वही लौकी-तरोई और पतली-सी दाल ! ठीक है, माना कि शुगर ज्यादा है उनकी, पर सारी दवाएँ तो ले ही रही हैं न ! चलती-फ़िरती हैं, घर के छोटे-मोटे काम भी कर देती हैं। और- ” अम्माजी ज़रा साग साफ़ कर दीजिए…मुन्ने की मालिश तो और कोई कर ही नहीं सकता…आपके हाथ वाला मिर्च का अचार खाने का मन है” ये सब फरमाइशें करते, न ध्यान आता किसी को उनकी सेहत का ! फ़िर ज़रा-जा मीठा देते क्यों जान निकली जाती है?
सुलगता हुआ मन जब भभकने लगा, तो वो उठीं, और अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ने लगीं। बरामदा पार करते हुए अचानक उनकी नज़र कोने में पड़ी कबाड़ से ढकी…बेंत की आरामकुर्सी पर पड़ी,तो वे ठिठक गईं। सुन्न होते शरीर से…बस उसे देखती ही रह गईं।
फिर घिसटते कदमों से वे लौट पड़ीं। अब उनकी आँखों मे नमी तैर रही थी, और यादों में एक धीमी घिघियाती आवाज़- ” ज़रा-सा दे दो बहूरानी…बस एक फाँक..”