सितम्बर 2026

पाठकीयप्रेम जनमेजय की लघुकथा पर एक टिप्पणी     Posted: September 1, 2026

हाल ही में साहित्य अकादमी से एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है-‘हिन्दी लघुकथा संचयन’। संपादक हैं प्रतिष्ठित लघुकथाकार अशोक भाटिया जी। वहाँ एक लघुकथा संगृहीत है-‘देश-भक्ति’। लेखक हैं-प्रेम जनमेजय। लघुकथा इस तरह लिखी गई है:

देशभक्त पुत्र ने अपने पुलिस पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं आपकी तरह पुलिस में भर्ती होऊँगा, कानून की रक्षा करूँगा।

‘‘नहीं हो सकता बेटे, पुलिस में तुम्हें करवाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है!’’

‘‘क्यों पिताजी?’’

‘‘दस हज़ार चाहिए… और अभी तुम्हारी दोनों बहनों की शादी होनी है।’’

‘‘दस हज़ार! बड़ा करप्शन है आपके डिपार्टमेंट में! आप मुझे एंटी करप्शन में करवा दें। मैं एक-एक को देख लूँगा!।’’ पुत्र ने आक्रोश में कहा।

‘‘वहाँ नौकरी के लिए बेटे, बीस हज़ार रुपये चाहिए। तू देश-भक्ति का खयाल छोड़ दे तो मैं कोशिश करूँ।।’’ पिता ने कहा।

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लघुकथा का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह अपने आकार से बड़ी हो जाती है।

प्रेम जनमेजय की ‘देश-भक्ति’ ऐसी ही लघुकथा है। यह पढ़ते समय एक सहज पारिवारिक संवाद लगती है, लेकिन समाप्त होते-होते पाठक के सामने पूरा प्रशासनिक, नैतिक और सामाजिक तंत्र खड़ा कर देती है। कहानी कहीं बाहर नहीं घटती; वह हमारे भीतर घटती है।

कथानक अत्यंत साधारण है—एक पुत्र पुलिस में भर्ती होकर कानून की रक्षा करना चाहता है। पिता उसे बताता है कि भर्ती के लिए रिश्वत चाहिए। पुत्र का नैतिक आक्रोश उसे भ्रष्टाचार-निरोधक विभाग की ओर मोड़ता है। लेकिन वहीं सबसे बड़ा व्यंग्य उसका इंतज़ार कर रहा है—एंटी करप्शन विभाग में नौकरी के लिए रिश्वत की राशि और अधिक है। कथा यहीं समाप्त हो जाती है, पर उसका अर्थ यहीं से शुरू होता है।

प्रेम जनमेजय की विशेषता यह है कि वे भ्रष्टाचार पर भाषण नहीं देते, उसे एक घरेलू बातचीत में बदल देते हैं। पिता कोई खलनायक नहीं है। वह व्यवस्था का एक थका हुआ कर्मचारी है, जिसने आदर्शों से पहले अपनी बेटियों की शादी की चिंता सीख ली है। उसकी विवशता में नैतिक पतन भी है और सामाजिक यथार्थ भी। दूसरी ओर पुत्र अभी उस उम्र में है जहाँ ‘देशभक्ति’ एक स्वच्छ शब्द है। कथा इन दोनों के बीच किसी का पक्ष नहीं लेती; केवल यह दिखाती है कि व्यवस्था आदर्शों को किस तरह धीरे-धीरे व्यावहारिक सलाह में बदल देती है।

लघुकथा का सबसे सशक्त उपकरण उसका संवाद है। एक भी वाक्य अनावश्यक नहीं। प्रत्येक संवाद अगले संवाद को जन्म देता है। अंत का वाक्य—’‘तू देश-भक्ति का खयाल छोड़ दे…।’’ पूरी कथा का सबसे तीखा व्यंग्य है। यहाँ देशभक्ति किसी राष्ट्रगीत या नारे का नाम नहीं, बल्कि एक भोले युवक की नैतिक आकांक्षा है, जिसे व्यवस्था नौकरी मिलने से पहले ही त्याग देने की सलाह देती है।

भाषा अत्यंत सहज है। इसमें कोई अलंकारिक चमत्कार नहीं, कोई बौद्धिक प्रदर्शन नहीं। यही उसकी शक्ति है। वह पाठक को चौंकाती नहीं, धीरे-धीरे उसके भीतर एक असुविधा पैदा करती है। अच्छी लघुकथा अक्सर वहीं समाप्त होती है जहाँ पाठक की बेचैनी शुरू होती है।

कला की दृष्टि से देखें तो कथा में संक्षेप का अनुशासन उल्लेखनीय है। पात्र केवल दो हैं, स्थान एक है, समय कुछ मिनटों का है, लेकिन संकेतों में पूरा तंत्र उपस्थित हो जाता है। यही लघुकथा की सफलता है—वह एक कमरे में खड़ी होकर पूरे देश की खिड़की खोल देती है।

यथार्थ की दृष्टि से यह कथा विश्वसनीय है। यह किसी एक विभाग की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि उस मानसिकता का दस्तावेज़ बन जाती है जहाँ भ्रष्टाचार केवल आर्थिक लेन-देन नहीं, व्यवस्था की स्वीकृत भाषा बन जाता है। इसीलिए कथा समय के साथ पुरानी नहीं पड़ती। रिश्वत की राशि बदल सकती है, संवाद का सत्य नहीं।

यदि कोई प्रश्न उठता है, तो केवल इतना कि कथा का अंत अत्यंत प्रभावी होने के कारण कुछ पाठकों को वह पूर्वानुमेय लग सकता है। किंतु व्यंग्य साहित्य में कई बार पूर्वानुमेय सत्य ही सबसे अधिक मारक होता है, क्योंकि पाठक अंत आने से पहले ही जानता है कि व्यवस्था क्या उत्तर देने वाली है और यही ज्ञान उसकी असहायता को गहरा करता है।

इस लघुकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह भ्रष्टाचार की नहीं, आदर्श की पराजय की कथा है। यहाँ रिश्वत मुख्य पात्र नहीं है; मुख्य पात्र वह युवक है जिसकी देशभक्ति नौकरी की पहली सीढ़ी पर ही परीक्षा में बैठा दी जाती है।

मुझे विनोद कुमार शुक्ल की एक संवेदना याद आती है: मनुष्य की सबसे बड़ी हानि तब नहीं होती जब उससे उसकी वस्तु छिन जाए, बल्कि तब होती है जब उससे उसका विश्वास छिन जाए। प्रेम जनमेजय की यह लघुकथा उसी छिनते हुए विश्वास का सूक्ष्म आख्यान है। इसमें कोई शोर नहीं है, लेकिन इसकी चुप्पी देर तक सुनाई देती है। यही इसकी साहित्यिक सफलता है।

यह लघुकथा अपने समय में प्रभावी रही है, लेकिन यदि इसे लघुकथा के शिल्प, यथार्थ, व्यंजना और कलात्मकता के कठोर मानकों पर परखा जाए, तो कुछ सीमाएँ भी दिखाई देती हैं।

1.अंत अत्यधिक योजनाबद्ध (Contrived) है। पूरी कथा अंतिम पंचलाइन तक पहुँचने के लिए रची गई प्रतीत होती है। ‘‘एंटी करप्शन में नौकरी के लिए बीस हज़ार।’’ वाला वाक्य चौंकाता तो है, पर वह कथा की स्वाभाविक परिणति कम और व्यंग्य का पूर्वनिर्धारित लक्ष्य अधिक लगता है।

2.पात्र प्रतीक बन जाते हैं, मनुष्य नहीं। पिता और पुत्र दोनों विचारों के वाहक हैं। पिता व्यवस्था का प्रतीक है, पुत्र आदर्शवाद का। उनके व्यक्तित्व की जटिलता सामने नहीं आती। अच्छे व्यंग्य में पात्र पहले मनुष्य होते हैं, प्रतीक बाद में।

3.यथार्थ का सरलीकरण।

कथा यह संकेत देती है कि पूरा तंत्र एक ही रंग में रंगा हुआ है। साहित्य में तीखे व्यंग्य की छूट होती है, लेकिन यथार्थ अक्सर इससे अधिक जटिल होता है। एकरेखीय चित्रण से रचना की बहुस्तरीयता कुछ कम हो जाती है।

4.व्यंजना की जगह प्रत्यक्ष व्यंग्य। लघुकथा का श्रेष्ठ रूप वह होता है जहाँ अर्थ पाठक स्वयं खोजे। यहाँ अंतिम संवाद पूरा निष्कर्ष स्वयं कह देता है। पाठक के लिए अर्थ-निर्माण का अवकाश कम बचता है।

5. ‘देशभक्ति’ शीर्षक का विस्तार सीमित रह जाता है।

शीर्षक अत्यंत व्यापक है, जबकि कथा का फलक मुख्यतः भर्ती में भ्रष्टाचार तक सीमित है। शीर्षक जितनी बड़ी वैचारिक अपेक्षा जगाता है, कथा उतने व्यापक अर्थ-क्षेत्र में नहीं फैलती।

6.समय-विशेष से बँधा व्यंग्य।

‘‘दस हजार’’ और ‘‘बीस हजार।’’ जैसी राशियाँ कथा को उसके समय से जोड़ती हैं। आज पढ़ते समय ये संख्याएँ व्यंग्य की धार को कुछ कम कर देती हैं। यदि राशि का उल्लेख न होकर केवल ‘रिश्वत’ का संकेत होता, तो कथा अधिक कालजयी बन सकती थी।

7.कथात्मक तनाव का अभाव। संवाद के दूसरे-तीसरे आदान-प्रदान से ही पाठक अनुमान लगा लेता है कि अंत किस दिशा में जाएगा। आश्चर्य का तत्व अपेक्षाकृत कम हो जाता है।

मेरी दृष्टि में इस लघुकथा की सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह व्यवस्था का व्यंग्य तो रचती है;, लेकिन मनुष्य की त्रासदी को उतनी गहराई से नहीं छूती।

पढ़कर मुस्कान आती है, किंतु वह बेचैनी देर तक नहीं टिकती जो श्रेष्ठ लघुकथा का गुण होती है। यदि इसे प्रेमचंद, भीष्म साहनी या समकालीन किसी श्रेष्ठ लघुकथा की कसौटी पर देखें, तो कहा जा सकता है—

यह एक प्रभावशाली व्यंग्यात्मक लघुकथा है; लेकिन महान लघुकथा बनने के लिए इसमें व्यंग्य से अधिक व्यंजना, पंचलाइन से अधिक मौन और पात्रों में अधिक मानवीय जटिलता की आवश्यकता थी।

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