
घटनास्थल पर रिपोर्टर जिला कलेक्टर से सवाल करते हुए-“दिनदहाड़े बीच बाजार में एक नवयुवक ने पेट्रोल डालकर अपने आप को आग लगा लिया। आग लगाने से पहले उसने एक घंटे तक सरकार और कानून व्यवस्था के प्रति काफी रोष प्रकट किया था। इतना वक्त काफी था उसे जान देने से रोकने के लिए । कितनी लचर व्यवस्था है आपकी। एक युवक को बचा नहीं सके। आखिर जिले की कानून व्यवस्था और शांति बनाए रखना आप की ही जिम्मेदारी है।”
रिपोर्टर ने जिला कलेक्टर पर प्रश्नों और आरोपों की बौछार कर दी।
“मैं उस वक्त एक मीटिंग में था। इसकी सूचना मुझे बाद में मिली। मैंने जाँच के आदेश दे दिए हैं कि यह सब, कब और कैसे हुआ? इसके पीछे किसी शरारती तत्व का हाथ तो नहीं था? उस युवक ने आग स्वयं लगाई या किसी और ने…” कलेक्टर ने उत्तर दिया।
“वह युवक स्वयं ही पेट्रोल और माचिस लेकर आया था। सरकार के प्रति नाराजगी प्रकट करने के बाद उसने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा लिया। मेरे पास इसका वीडियो है। मैं आपको वीडियो दिखा सकता हूँ।” रिपोर्टर ने सीना चौड़ा करते हुए कहा।
“यह वीडियो आपको कहाँ से मिला?” कलेक्टर ने पूछा।
“यह वीडियो मैंने खुद रिकाॅर्ड किया है।” रिपोर्टर ने गर्व से कहा।
“तो इसका मतलब आप इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी हैं।”
“जी हाँ, बिल्कुल। मैं आपको शुरू से अंत तक एक-एक बात विस्तारपूर्वक बता सकता हूँ। मेरे अलावा सैकड़ों की भीड़ भी वहाँ उपस्थित थी। मेरे वीडियो की सत्यता की पुष्टि भी आप करवा सकते हैं।” रिपोर्टर ने आत्मविश्वास से भरकर उत्तर दिया।
” उस वक्त आप सभी की इंसानियत कहाँ थी?” कलेक्टर साहब ने कुछ व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा।
“जी… क्या मतलब…?”
“मतलब यही कि अगर उस नवयुवक की जगह आपका भाई या बेटा होता तब भी क्या आप मूकदर्शक बने वीडियो रिकॉर्ड कर रहे होते?” फिर भीड़ की ओर मुखातिब होकर कहा, “जाहिर सी बात है कि वह आपमें से भी किसी का रिश्तेदार नहीं था।”
“इस घटना का मुझे बेहद अफसोस है। लेकिन इस घटना के बारे में, जिसके आप सभी प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, मुझसे सवाल करने से पहले एक बार स्वयं से भी सवाल करें। क्या आपका कोई दायित्व नहीं था?”
कड़े शब्दों में कलेक्टर साहब द्वारा पूछे गए सवाल को सुनकर अब चारों ओर सन्नाटा था। रिपोर्टर को मानो साँप सूँघ गया।
नमिता सिंह ‘आराधना’, अहमदाबाद