जून 2026

देशप्रतीक्षा     Posted: June 1, 2024

एक तरफ़ जहाँ उन्नति सम्पन्नता पीठ पर लादे दौड़ रही थी। वहीं सड़क किनारे ग़रीबी लाचारी में लिप्त पेड़ की छाँव में बैठी उन्नति से हाथ मिलाने की चाह में तड़प रही थी। गाँव से हाइवे का फ़ासला ज़्यादा नहीं था; परंतु अंतर बहुत था। हाइवे पर जहाँ आलीशान गाड़ियाँ दौड़ रही थी, वहीं गाँव में ऊँट-गाड़ियों की मद्धिम चाल डग भर रही थी। हाइवे से इतर उन्नति गाँव में फैलना चाहती थी, जैसे ही ऊँट-गाड़ियाँ गाँव की तरफ़ रुख़ करतीं, उन्नति उन पर सवार हो जाती। ऊँट की थकान बन गिरती, तो कभी ऊँट को हाँकने की ख़ुशी बनकर दौड़ लगाती। कभी-कभी ऊँट का आक्रोश बन आग बबूला हो जाती, अगर जगह न भी मिले तब वह चिपक जाती थी। ऊँट-गाड़ियों के टायर से मिट्टी की गठान बनकर, कभी-कभी थक-हारकर वहीं पेड़ की छाँव में बैठ जाती। हाइवे को देखती! देखती! जड़ता में लीन ज़िंदगियों की रफ़्तार। ढलते सूरज का आसरा लिये कुछ क़दम बढ़ाती, गाँव की उन औरतों के साथ, जो अभी-अभी उतरी थीं। उन तेज़ रफ़्तार से चलने वाली गाड़ियों से, उन्नति सवार होती उनकी हँसी की खनक पर, सुर्ख़ रंग के चूड़े के सुर्ख़ रंग पर, क़दमों की गति पर, कभी झाँकती ओढ़नी के झीनेपन से, जिसे उन औरतों ने छिपाया था थैले में सबकी निगाह से सबसे नीचे, कभी-कभी सवार होती वह, उन औरतों के हृदय पर विद्रोही बन जैसे ही गाँव में प्रवेश करती वे औरतें उसे छिटक देतीं स्वयं से परे मिट्टी के उस टीले पर,पेड़ों के उस झुरमुट में, कई सदियाँ बीत गईं, उन्नति प्रतीक्षा में है। एक विद्रोही स्त्री के जिसके सहारे वह पा सके स्थान उस गाँव में।

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