अगस्त 2026

देशपोर्टर     Posted: December 1, 2025

कसोल छूट गया है बारिश हो रही है. पहाड़ से सौंधी गंध आ रही है। चीड़, हिमालयन ओक, रोडोडेंड्रोन सब धुल रहे हैं। आधे लकड़ी आधे पत्थर के कॉटेज भी घुल रहे हैं। हमें सार-पास जाना है। रेनशीट से मेरा रुकसैक छितरा गया है

मैंने जोर से पुकारा, “भारत!”

वह मुस्कराकर बोला, “क्या वजन लग रहा है?”

“हाँ लग तो रहा है।” सहमते हुए मैंने कहा।

पोर्टर कर लो” और कुछ बुदबुदाता हुआ आगे बढ़ गया

ट्रैकर की लंबी लाइन धीमी गति से चढ़ती जा रही है। मैं चाहकर भी सबसे आगे नहीं निकल सका और अपनी धीमी गति के कारण लाइन के पीछे-पीछे चढ़ता गया, मानो उनका अनुयायी बन गया होऊँ। बारिश रुकी तो गाइड ने भी रुकने का इशारा किया। पोर्टर ने भी मेरा रुकसैक पहाड़ की पीठ पर रखकर अपने हाथ खोले, ताकि उन्हें विश्राम मिले। तब मेरा ध्यान उसकी काया और अवस्था पर गया। वह कमजोर-सा वृद्ध था, परंतु उसके चेहरे पर संतोष का तेज विद्यमान था। उसकी मांसपेशियों से बहता पसीना मुझ में अपराध बोध-सा भर रहा था। पहाड़ कोहरे का लिहाफ ओढ़े कभी-कभी मुँह दिखा रहे थे। मैंने कुछ अटपटा सोचा।

मैं तेज कदम उठाकर पोर्टर तक पहुँचा और अपना रुकसैक उठा लिया। उसके चेहरे पर तनाव के भाव उभर आए; लेकिन मैं हल्का महसूस करने लगा। थोड़ी देर उसने मेरे साथ-साथ चलने का उपक्रम किया। मैंने उसके द्वारा तय पाँच सौ रुपये दिए, तो वह अगले ही मोड़ से मुड़ गया, और प्रत्युत्तर में मुस्कुराते हुए उसने हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिए।

सनसनाते चीड़ों ने भी कोई राग अलाप दिया।

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