पूर्वभ्यास/ आनंद
वह एक साधारण–सा एढाबाहोता, जिसकी कोने की मेज पर हम अकसर शाम को चाय पीते थे। चाय आने पर वह नमक नकी माँग करती। चुटकी भर नमक चाय में मिलाती और पीने लगती। मैं पूछता, ‘‘चाय में नमक किस लिए?’’
वह हँस देती, ‘‘चीनी मुझे हमेशा नहीं मिलती। कभी मंहगी इतनी होती है कि में खरीद नहीं पाती। कभी पड़ोस के दुकानदार के यहां होती ही नहीं। नमक, लेकिन कहीं भी,किसी से भी मिल सकता है। बिल्क्ुल मुफ्त भी। चीनी के साथ थोड़ा नमक लेने की आदत अगर शुरू में ही डाल दी जाए तो उन दिनों में, जब चीनी नहीं होती, सिफर् नमक की चाय ज्यादा बुरी नहीं लगती। आसानी से चल जाती है।’’
वह प्यार का समय होता और वह अचानक मेरे किसी कहे का, मेरी कल्पना में भी जो नहीं होता वैसा कोई अप्रिय अर्थ निकालने लगती और फिर मुझ से झगड़ने लगती। मेरी सफाई बेअसर होती और मैं खीझ उठता, ‘‘अजीब हो तुम, प्यार के समय भी झगड़ने लगती हो!’’
भेद भरे स्वर में वह रहस्य प्रकट करती, ‘‘नफरत और अलगाववादी ताकतों के इस युग में किसी का प्यारा–सा साथ दुलर्भ होता जा रहा है। मगर किसी से झगड़ा और अलगांव कभी भी हो सकता है। अचानक और अनचाहे भी। सैनिक शांति के समय भी युद्ध का पूर्वाभ्यास करते रहते हैं। हमें चाहिए कि साथ होने के दिनों में भी थोड़ा–बहुत लड़ते–झगड़ते रहें। बाद में इससे फायदा रहता है।’’
बाद में तबादलों के एक मनहूस मौसम में उसका दूर के एक शहर में तबादला हो गया था, जबकि मैं वहीं,जहां अब तक हम दोनों होते थे, अकेला रहने को था। उस शहर में हम दोनों के एक साथ होने की वह आखिरी रात, तारों भरी, मगर बिना चांद की रात थी और मैं वहां था, जहां पहले पहुँचने वाले को बाद में आने वाले की प्रतीक्षा करनी होती थी। उसका देर से आने का समय भी गुजर चुका तो मैं आशंकित और बदहवास–सा उसके कमरे की तरफ भागा। मेरे लिए यह एक और सदमा था कि मुझ से मिले वगैर ही वह शहर छोड़ चुकी थी।
यकीनन वह एक बेमुरव्वत और दगाबाज लड़की थी; लेकिन हैरत मुझे खुद पर थी कि सरासर बेवफाई करने पर भी वह मुझे बेवफा नहीं लग रही थी।
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