यह दरवाजा कई बरसों से उनकी नजर में था । दादाजी की हवेली से खोला गया था । नक्काशीदार चौखट, मजबूत किंवाड़, किंवाड़ों पर दिलकश मांडणे । देखते तो उनका हिया जुड़ा जाता । सोचते, जब भी नवनिर्माण होगा खास कमरे में यह खास दरवाजा जरूर लगवायेंगे । दादाजी की धरोहर के रूप में ।
वे तो कुछ विशेष नहीं कर पाये । हाँ, बेटा कमाऊ निकला । पैसा सहेजना जानता है । अब मन माफिक बंगला बनवा रहा है । वे भी बहुत खुश हैं । खास तौर से यह सोचकर कि अब दादाजी वाले दरवाजे के दिन फिरने को हैं । बरसों बाद उनके मन की मुराद पूरी होने वाली है ।
मकान इस स्तर तक पहुँच गया था कि चौखटें फिट की जा सके । उन्होंने एक कमरे में वह बहुप्रतीक्षित दरवाजा लगवा ही दिया ।
उस दिन बेटा कहीं बाहर था । आकर देखा तो माथा भन्ना गया । उसने कारीगर की तरफ रोषपूर्ण दृष्टि फेंकी और जरा तेज स्वर में पूछा कि यह बाबा आदम के जमाने का दरवाजा यहाँ क्यों लगाया है ?
“बाबूजी ने कहा था ।”
बेटे ने किया ‘हुंह’ और कारीगर को डपटा, “हटाओ इस भंगार को अभी का अभी । मैंने नई फैशन के दरवाजे बनवा लिए हैं, समझे ।”
कारीगर ने अपने ‘सेठजी’ की आज्ञा का पालन करते हुए दरवाजा खोलकर दूर एकांत कोने में ले जाकर खड़ा कर दिया ।
बाबूजी देखते रह गए । उन्हें लगा कि वहाँ पुराना दरवाजा नहीं बल्कि वे स्वयं खड़े हैं । अडोल ।
लघुकथा.com
अगस्त 2026
देशपुराना दरवाजा Posted: March 1, 2015
© Copyright Infirmation Goes Here. All Rights Reserved.
Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine