जून 2026

देशपुरखों की धरती     Posted: February 1, 2019

दिवाकर राय

            ‘‘अजी सुनते हैं, बहू का फिर फ़ोन आया था। बोल रही थी, अब आप दोनों लोग गाँव छोड़कर यहीं चले आइए, शहर में।’’

‘‘तो चले जाओ।’’

‘‘आप नहीं जाएँगे क्या?’’

‘‘नहीं, मैं बार-बार कह चुका हूँ। मैं अपने पुरखों की धरती छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।’’

‘‘और जब खटिया पकड़ लेंगे तब?’’

‘‘तब क्या? एक दिन तो सबको मरना ही है।’’

‘‘लेकिन आप अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे?’’

‘‘यह जिद नहीं है पगली, जन्मधरती से प्यार है।’’

‘‘क्या ख़ाक प्यार है? इस मिट्टी को लेकर परलोक जाएँगे क्या?’’

‘‘इसी मिट्टी ने मुझको मेरी पहचान दी है। अब मैं इस मिट्टी के लिए कुछ करना चाहता हूँ।’’

‘‘इस बुढ़ापा में आप से होगा क्या?’’

‘‘गाँव के बच्चों को शिक्षा दूँगा। सभी बेसहारा लोगों को अपने घर में आसरा दूँगा।’’

‘‘इससे क्या होगा, धन और श्रम की बर्बादी के सिवा?’’

‘‘हमारे जीने का उद्देश्य मिल जाएगा ।’’

‘‘अर्थात्….?’’

‘‘बेटा-बहू की कमी नहीं खलेगी और पुरखों की धरती गुलज़ार रहेगी।’’

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