जून 2026

देशपीछा करती दृष्टि     Posted: December 1, 2020

सर्द हवा को चीरती हुई सी नाइट सुपर बस भागी जा रही थी। एक वह समय था, जब गुवाहाटी से शिलचर के लिए अनगिनत बसों की लाइन लगी रहती थी। शाम होने के साथ सभी बसें अपने गंतव्य की ओर चल देती थीं। मगर जब से गुवाहाटी-शिलचर रेलवे लाइन, मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिणत हुआ है, इन बसों को ब्रेक सा लग गया है, क्योंकि अब अनेक ट्रेनें सीधे-सीधे चलने लगी हैं। ऐसे में अब इक्का-दुक्का बस ही इस रूट पर चलती हैं। अब बस में वही लोग सवार होते हैं, जिन्हें ट्रेन में आरक्षण नहीं होने के वजह से आना-जाना जरूरी होता है।

            मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। मुझे एक आवश्यक कार्य से दिल्ली जाना पड़ गया था। वापसी का आरक्षण टिकट बमुश्किल गुवाहाटी तक ही मिला था। और अगले दिन हर हाल में मुझे ड्यूटी पकड़नी थी, ताकि छुट्टियॉं नियमित हो सकें। और इसलिए शाम को ट्रेन से उतरते ही नाईट सुपर बस पकड़ ली थी, ताकि अगले दिन सुबह तक शिलचर पहुंचकर ड्यूटी ज्वाइन कर लूँ।

            बस गुवाहाटी से शिलंग पहुँच चुकी थी। और अब शिलंग से आगे बढ़कर घने जंगलों से आच्छादित पर्वतों की चढ़ाई चढ़ रही थी। स्वाभाविक ही बस की गति धीमी थी। जबकि उसका इंजन तेज आवाज में गुर्राते हुए रात की नीरवता भंग कर रहा था। हम सभी यात्री अपनी-अपनी सीटों पर गर्म कपड़ों में मुँह छुपाए ऊँघ रहे थे।

            अचानक एक झटके के साथ बस रूकी तो मेरी नींद खुल गई।

            खिड़की के बाहर झाँका, तो कलेजा मुँह को आ गया। सड़क के दूसरी तरफ एक बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। और उसमें से निकले खून से लथपथ यात्री सहायता की याचना कर रहे थे।

            “अरे नहीं ड्राइवर” एक यात्री चिल्लाया- “एक्सीडेंट का मामला है। थाना-पुलिस और हॉस्पिटल का चक्कर चलेगा, तो हमें देर हो जाएगी। पूछताछ में परेशान हो जाएँगे हम। चुपचाप बस बढ़ाओ आगे।”

            मेरे मन में भी यही बात आ-जा रही थी। छुट्टी का मामला ठहरा। विद्यालय का प्राचार्य ठहरा कानूनची। बात समझेगा नहीं और छुट्टी रद्द कर देगा। फिर हम देर क्यों करें? बस में हाँ-ना की आवाज आती रही। घायल यात्री बस का दरवाजा पीटते रहे। अंततः ड्राइवर ने बस आगे बढ़ा दी।

            मेरी सीट खिड़की के पास ही थी। बाहर खून से लथपथ एक युवक अपनी घायल बच्ची को गोद में लिये मुझसे गिड़गिड़ा रहा था- “सर, बड़ी कृपा होगी। हमें बस में ले लीजिए। यहाँ जंगल में मेरी बेटी मर जायेगी। वह बुरी तरह से जख्मी है।”

            “हम निकटवर्ती शहर में पुलिस को खबर कर देंगे ।” मेरे बगलवाली सीट पर बैठा यात्री चिल्लाया- “अरे बस को आगे बढ़ाओ भाई! देखा नहीं ज रहा यह सबकुछ!”

            बस रेंगते हुए आगे बढ़ने लगी थी। उस घायल बच्ची की बेधती दृष्टि मुझे घूर रही थी। उसमें मुझे अपनी बेटी का अक्स दिख रहा था।

            हमने अगले पहुंचने वाले शहर में खबर कर अपने कार्य की इतिश्री कर दी।

            हम शिलचर पहुँच गए। मैंने उसी दिन अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर अपनी छुट्टी नियमित करा ली। मगर उस बच्ची की बेधती दृष्टि मेरा पीछा सी कर रही थीं।

            वह दृष्टि आजतक मेरा पीछा कर रही हैं।

                                                                                         

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine